उत्तर भारत के लोग पिछले कई हफ्तों से जिस पल का इंतजार कर रहे थे, आखिरकार वो घड़ी आ गई है. दिल्ली-एनसीआर की दम घोंटने वाली उमस और चुभती गर्मी को बाय-बाय कहने का वक्त हो गया है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी आईएमडी (IMD) ने साफ कर दिया है कि मानसून पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है और अगले 5 दिनों के भीतर ये दिल्ली-एनसीआर को पूरी तरह से कवर कर लेगा.
दिल्ली की उमस का 'द एंड': 17 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट, जानिए आपके शहर में मानसून कब बरस रहा है
North India Monsoon Update: उत्तर भारत में मानसून की धमाकेदार एंट्री हो चुकी है. आईएमडी (IMD) ने दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) समेत 17 राज्यों के लिए भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है. जानिए इस बार अल-नीनो का क्या असर है और शहरों में क्यों आ जाती है बाढ़.


मौसम विभाग ने देश के 17 राज्यों के लिए भारी बारिश का ऑरेंज और येलो अलर्ट जारी किया है. इसका मतलब ये है कि अब उत्तर से लेकर मध्य भारत तक बादलों का तगड़ा डेरा रहने वाला है.
लेट एंट्री या नॉर्मल? पिछले 5 सालों का मानसून ट्रेंड
हर साल जब जून का महीना आता है, तो सबके मन में एक ही सवाल होता है कि इस बार मानसून टाइम पर आएगा या लेट होगा. अगर पिछले 5 सालों के पैटर्न को देखें, तो उत्तर भारत में मानसून की टाइमिंग काफी उतार-चढ़ाव वाली रही है. साल 2021 और 2022 में जहां मानसून ने जून के आखिरी हफ्ते में दिल्ली में एंट्री मारी थी, वहीं 2023 में ये थोड़ा पहले यानी 25 जून के आसपास ही पहुंच गया था. साल 2024 और 2025 में भी मानसून की रफ्तार ने जून के आखिरी दिनों में ही तेजी पकड़ी.
इस साल यानी 2026 में भी मानसून अपने तय समय के बेहद करीब है. इसे हम लेट एंट्री नहीं बल्कि 'नॉर्मल' या 'ऑन टाइम' अराइवल कहेंगे, जिसने जून खत्म होते-होते उत्तर भारत को अपनी आगोश में ले लिया है.

वेदर वॉच: 2026 का मानसून पैटर्न और अल-नीनो का चक्कर
मौसम की इस पूरी कहानी की तह तक जाना हो तो इसके दो हैवी वेट किरदारों से रूबरू होना पड़ेगा. पहला- अल नीनो (El Nino) और दूसरा- ला नीना (La Nina). इन दोनों किरदारों का रोल मौसम के मामले में बड़ा विचित्र है. ये जो अल नीनो हैं, ये बड़े गरम मिजाज हैं क्योंकि इन्हीं के गुस्से का प्रकोप झेलकर पेसिफिक ओशन (Pacific Ocean) यानी प्रशांत महासागर का पानी गर्म होकर उबलने लगता है. अब आप कहेंगे कि प्रशांत महासागर से हमें क्या, हमारे पास तो हिंद महासागर है. तो भइया, अल-नीनो की वजह से जब प्रशांत महासागर का पानी गर्म होता है, तभी भारत में मानसून कमजोर होता है. नतीजा कम बरसात, सूखा और गर्मी की लंबी इनिंग.
दूसरी तरफ ये जो 'ला-नीना' साहब हैं, उनका स्वभाव अल-नीनो से एकदम उलट है. बिल्कुल मिस्टर कूल टाइप. क्योंकि 'ला-नीना' के चलते सागर का पानी ठंडा होता है. जिसकी वजह से भारत में अच्छी और भारी बारिश होती है.
साल 2026 के इस मानसून सीजन में अच्छी बात ये है कि अल-नीनो का असर अब पूरी तरह खत्म हो चुका है. मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस समय 'ला-नीना' के हालात बन रहे हैं. जिसकी वजह से अबकी साल भारत के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य या उससे भी अधिक बारिश होने का अनुमान लगाया जा रहा है. शुरुआत में भले ही थोड़ी देरी दिखी हो, लेकिन अब मानसून जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसके पीछे यही ला-नीना फैक्टर काम कर रहा है.

खेती-किसानी पर असर: कहां वरदान और कहां आफत?
ये बारिश भारत के अन्नदाताओं के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है. कृषि मंत्राल की बुवाई एवं लक्ष्य रिपोर्ट 2026 के मुताबिक खास तौर पर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए ये मानसून वरदान बनकर आया है. ये वो इलाके हैं जहां धान की बुवाई (Paddy Sowing) और खरीफ फसलों (Kharif Crops) का काम इस समय जोरों पर चल रहा है. सही समय पर पानी मिलने से किसानों का डीजल का खर्च बचेगा और फसलों की ग्रोथ अच्छी होगी.
मगर इस कहानी का एक साइड और है. मौसम विभाग ने चेताया है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों और बिहार के कुछ हिस्सों में भारी बारिश के चलते बाढ़ का खतरा (Flood Risk) मंडरा रहा है. असम और उसके आसपास के इलाकों में नदियां उफान पर हैं, जिससे वहां के निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. यानी जहां एक तरफ ये बारिश फसलों को जीवन देगी, वहीं दूसरी तरफ कुछ इलाकों में ये आफत भी बन सकती है.
महानगरों का क्या होगा?
अब बात करते हैं दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों की, जहां बारिश का स्वागत लोग खुशी से कम और डर से ज्यादा करते हैं. जैसे ही पहली तेज बारिश होती है, दिल्ली की सड़कें स्विमिंग पूल में बदल जाती हैं. मिंटो ब्रिज हो या धौला कुआं, हर जगह गाड़ियां तैरती नजर आती हैं. इसे तकनीकी भाषा में 'अर्बन फ्लडिंग' (Urban Flooding) यानी शहरी बाढ़ कहते हैं.

आखिर हमारी सिविक बॉडीज (MCD, PWD) मानसून से पहले क्या करती हैं? हर साल दावों का एक पुलिंदा तैयार किया जाता है कि सारे नाले साफ कर दिए गए हैं. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक एमसीडी ने इस साल 31 मई को भी ऐसा ही एक दावा किया है. अब उस दावे की हकीकत तो तभी पता चलेगी, जब बरसात की बूंदे दिल्ली में दस्तक देंगी. मगर अभी तक का अनुभव तो ये कहता है कि ड्रेनेज सिस्टम (Drainage System) पूरी तरह से चोक रहता है.
शहरों में कंक्रीट का जाल इतना बढ़ चुका है कि पानी को जमीन के अंदर जाने का रास्ता ही नहीं मिलता. नालों की डिजाइन दशकों पुरानी है, जो आज की आबादी और अचानक होने वाली भारी बारिश को झेलने के लायक नहीं है. पीडब्लूडी भी समय-समय पर मीडिया को प्रेस रिलीज जारी कर इस दिशा में काम करने का दावा करती रहती है. मगर सच तो ये है कि सिविक एजेंसियों की इस लापरवाही का खामियाजा आम जनता को घंटों लंबे ट्रैफिक जाम और जलभराव के रूप में भुगतना पड़ता है.
'अर्बन फ्लडिंग' (Urban Flooding) पर अगर विस्तार से पढ़ना चाहते हैं तो लल्लनटॉप ने कुछ दिन पहले ही एक विस्तृत रिपोर्ट की है. शीर्षक है- स्मार्ट सिटी या स्विमिंग पूल? पहली ही बारिश में पानी-पानी क्यों हो जाते हैं भारत के शहर? दिलचस्पी हो तो क्लिक कर सकते हैं.
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