उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शौर्य चक्र विजेता शहीद का परिवार 22 सालों से सरकार की कथित वादाखिलाफी झेल रहा है. शहीद असिस्टेंट कमांडेंट विवेक सक्सेना ने देश की रक्षा करते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी. लेकिन, सरकार ने उनके परिवार को जमीन देने का वादा अब तक पूरा नहीं किया. इन 22 सालों में परिवार ने अपने हक के लिए ना जाने कितनी बार सिस्टम की चौखट पर दस्तक दी, लेकिन कोई राहत नहीं मिली. थक-हारकर, शहीद की 80 साल की बूढ़ी मां सावित्री सक्सेना ने सरकार को शौर्य चक्र और राष्ट्रपति पुलिस पदक लौटाने की पेशकश की है.
80 की उम्र में दफ्तरों के चक्कर नहीं लगते, शौर्य चक्र वापस लो... 22 साल से भटक रहीं शहीद की मां
यूपी के लखनऊ की 80 वर्षीय सावित्री देवी अब पूरी तरह टूट चुकी हैं. उनका कहना है कि 8 जनवरी 2003 को मणिपुर में आतंकवादियों से लड़ते हुए बेटे ने शहादत दी थी, जिसके लिए शौर्य चक्र और राष्ट्रपति पुलिस पदक मिला. लेकिन सरकार ने वादे पूरे नहीं किए. वो कहती हैं कि अब 80 साल की उम्र में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की हिम्मत नहीं बची.

शनिवार, 5 सिंतबर को सावित्री सक्सेना अपने बड़े बेटे रंजीत सक्सेना के सहारे लखनऊ की सरोजनी नगर तहसील के 'संपूर्ण समाधान दिवस' में पहुंची. 80 साल की बुजुर्ग मां ने बेबसी में आकर बेटे को मिले सभी वीरता पदक और सम्मान राशि सरकार को लौटाने की मांग रख दी.
क्या बोलीं शहीद की मां?आजतक से जुड़े अंकित मिश्रा से बात करते हुए शहीद विवेक सक्सेना की मां सावित्री सक्सेना ने कहा,
"80 साल की हो गई हूं. अब दफ्तर-दफ्तर नहीं जा सकती. इसलिए बेटे को मिला सम्मान वापस करना चाहती हूं."
शहीद विवेक सक्सेना के बड़े भाई रंजीत ने भी सिस्टम की असंवेदनशीलता की परतें खोलीं. उन्होंने बताया कि जब शनिवार, 5 सिंतबर को समाधान दिवस में पहुंचे तो उन्हें अफसरों की हेकड़ी का सामना करना पड़ा. रंजीत के मुताबिक,
"तहसीलदार ने मुंह पर कह दिया कि जमीन ले तो पाओगे नहीं, जैसे वर्षों से भाग रहे हो, वैसे ही भागते रहोगे. यह इस तरह से होगा ही नहीं, अब फाइल नगर निगम जाएगी और बैठक में तय होगा."
दर्द बयां करते हुए रंजीत ने बताया कि शहादत के बाद स्मारक पार्क बनाने और ग्रामीण कोटे से भूमि आवंटन का ऐलान हुआ था, जो बरसों तक सिर्फ कागजी घोषणाओं में अटका रहा.
मूल निवास का सबूत मांगासाल 2016 में तत्कालीन डीएम राजशेखर ने मामले को संज्ञान में लेकर अलग-अलग विभागों के लिए आवेदन लिए. तब डीएम ने एडीएम को 15 दिन में जांच कर स्मारक और जमीन आवंटन के निर्देश दिए. 2016 में जमीन की प्रक्रिया तो शुरू हुई, लेकिन उसके बाद शुरू हुआ मूल निवास का अंतहीन चक्रव्यूह. अफसरों ने शहीद के परिवार को यह साबित करने पर मजबूर कर दिया कि वे यूपी के निवासी हैं या नहीं.
रंजीत ने बताया,
चेक की रसीद देख हैरान रह गए अफसर"हम यहीं पले-बढ़े, यहीं पढ़े और एयरफोर्स स्टेशन, मेमौरा में भाई का मोमेंटो बना है, फिर भी हमसे कहा गया कि सुविधाएं तभी मिलेंगी जब शादी से पहले माताजी कहां रहती थीं, इसका एफिडेविट दोगे. हमने एफिडेविट दिया तो आधी-अधूरी बात पकड़कर कह दिया कि आप यहां के मूल निवासी नहीं हैं, सुविधाएं नहीं मिलेंगी."
इसके बाद रंजीत को पुराने कागजों में यूपी सरकार की ओर से इसी पते पर जारी 75,000 रुपये के चेक की रसीद मिली. रंजीत ने कहा कि रसीद देखकर अफसरों के होश उड़ गए. रंजीत ने तर्क दिया कि जब पैसा इसी पते पर दिया था, तो अफसर मूल निवासी होने का सबूत कैसे मांग रहे हैं.
शौर्य चक्र की सम्मान धनराशि पाने के लिए भी परिवार को 2024 तक इंतजार करना पड़ा. उसमें भी फाइल को एक टेबल से दूसरी टेबल तक खिसकाने में महीनों लग गए. रंजीत के मुताबिक, अफसर वेरिफिकेशन से बचते रहे ताकि परिवार आगे कोई और दावा ना कर दे.
शौर्य चक्र और पदक लौटाने की पेशकशलखनऊ के सरोजनी नगर में दरोगा खेड़ा की कृष्ण लोक कॉलोनी में रहने वाली 80 वर्षीय सावित्री देवी अब पूरी तरह टूट चुकी हैं. उनका कहना है कि 8 जनवरी 2003 को मणिपुर में आतंकवादियों से लड़ते हुए बेटे ने शहादत दी थी, जिसके लिए शौर्य चक्र और राष्ट्रपति पुलिस पदक मिला. लेकिन 80 साल की उम्र में अब सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की हिम्मत नहीं बची.
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बुजुर्ग मां ने राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री से मुलाकात का वक्त मांगते हुए गुहार लगाई है कि जब शहादत के इतने सालों बाद भी एक जमीन के लिए अपमानित होना पड़े, तो सरकार यह शौर्य चक्र, पदक और सम्मान राशि सम्मान के साथ वापस ले ले. वहीं, मामले में एसडीएम ने शिकायतों की जांच कर एक हफ्ते के अंतर निपटारे के आदेश दिए हैं.
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