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उम्रकैद के कैदी ने भागकर सरकारी नौकरी कर ली, जीता बेस्ट टीचर का अवार्ड, 40 साल बाद अरेस्ट

इस शख्स को 1983 में हत्या के एक मामले में दोषी ठहराया गया. उम्रकैद की सजा हुई. उसे 1983 को पैरोल पर रिहा किया गया था. मार्च, 1984 को उसे सरेंडर करना था, लेकिन वह जेल वापस ही नहीं लौटा. फिर 40 साल टीचर बनकर छिपा रहा.

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पुलिस ने 40 बाद हत्या के दोषी को गिरफ्तार किया. (सांकेतिक फोटो: AI)

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  • मार्च 1984 में उम्रकैद के एक कैदी ने पैरोल से भागकर सरकारी स्कूल में शिक्षक की नौकरी हासिल की और 40 साल तक बिना गिरफ्तारी के काम करता रहा, जिसे 2024 में गिरफ्तार किया गया।
  • इस मामले का कारण यह है कि कैदी ने मार्च 1984 को जेल नहीं लौटकर 40 साल तक कानून की पहुंच से बाहर रहा, जिससे पैरोल सिस्टमें की जांच और निगरानी कमजोर साबित हुई।
  • गिरफ्तारी के बाद अदालत ने पैरोल पर कैदियों की कड़ी निगरानी के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाने के आदेश दिए और याचिका खारिज कर कठोर कार्रवाई बरकरार रखी।

मार्च 1984 में पुलिस जिस कैदी के वापस जेल लौटने का इंतजार कर रही थी, वह अगले 40 सालों तक कानून की पहुंच से बाहर रहा. उम्रकैद की सजा से भागकर उसने न सिर्फ सरकारी स्कूल में टीचर की नौकरी हासिल की, बल्कि अपने काम के लिए ‘बेस्ट टीचर’ का अवॉर्ड भी पाया. सम्मान के साथ रिटायर होने के बाद आखिरकार जिंदगी के आखिरी पड़ाव (2024) पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया.

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73 साल के हत्या के दोषी की गिरफ्तारी के बाद उसके पैरोल मांगने पर तीन साल तक की रोक लगा दी गई. उसकी पत्नी ने इस रोक को तेलंगाना हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन अदालत ने याचिका खारिज कर दी. 

कोर्ट ने क्या कहा?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस टी माधवी देवी ने कहा, 

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“यह मामला दिखाता है कि एक कैदी को 40 साल तक ट्रैक नहीं किया जा सका. इस दौरान उसे सरकारी नौकरी मिली और वह रिटायरमेंट की उम्र तक बिना किसी रुकावट के काम करता रहा… इससे दूसरे कैदियों को भी ज्यादा समय तक बाहर रहने और धोखा देने जैसे तरीके अपनाने का बढ़ावा मिल सकता है.”

कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे पैरोल पर रिहा कैदियों पर कड़ी नजर रखने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाएं.

क्या है पूरा मामला?

रिकॉर्ड के मुताबिक, याचिकाकर्ता के पति को 1983 में हत्या के एक मामले में दोषी ठहराया गया था और उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. उसे तीन महीने के लिए दिसंबर, 1983 को पैरोल पर रिहा किया गया था. मार्च, 1984 को उसे सरेंडर करना था, लेकिन वह जेल वापस ही नहीं लौटा.

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40 साल बाद गिरफ्तार

हत्या का दोषी चार दशकों से ज्यादा समय तक जेल से बाहर ही रहा. 16 मई, 2024 को एक स्पेशल टास्क फोर्स ने उसे पकड़ लिया. इसके बाद उसे सेंट्रल जेल भेज दिया गया. दोषी की पत्नी ने जेल प्रशासन के उस फैसले का विरोध किया, जिसके तहत उसके पति को सजा में मिलने वाली 27 दिनों की छूट (माफी) छीन ली गई थी. साथ ही अगले तीन साल तक अस्थायी रूप से जेल से बाहर आने (पैरोल या फरलो) पर रोक लगा दी गई थी.

‘बेस्ट टीचर’ का मिला अवॉर्ड

पत्नी ने अदालत से गुहार लगाई है कि इस कड़े फैसले को बदला जाए ताकि कैदी को ये कानूनी अधिकार और रियायतें वापस मिल सकें. याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अधिकारियों ने लगभग 40 साल की बिना किसी वजह के देरी के बाद कार्रवाई की थी. उन्होंने यह भी बताया कि उसके पति सरकारी शिक्षक के तौर पर काम करते थे. 2013 में रिटायर हुए थे और उन्हें 2004 में 'बेस्ट टीचर' का अवॉर्ड भी मिला था.

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याचिका का किया विरोध

दूसरी तरफ, राज्य ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के पति को दी गई सजा नियमों के मुताबिक थी. यह भी बताया गया कि जब याचिकाकर्ता के पति पैरोल से भाग गए और वापस रिपोर्ट नहीं किया, तो उन्हें पकड़ने के लिए एक स्पेशल टास्क फोर्स टीम बनाई गई.

राज्य के वकील ने कहा कि पैरोल कैदियों का कोई पक्का अधिकार नहीं है और वे इसे अधिकार के तौर पर नहीं मांग सकते. अदालत ने गौर किया कि कैदी पैरोल की अवधि खत्म होने के बाद अपनी मर्जी से सेंट्रल जेल में रिपोर्ट करने नहीं आया. अदालत ने पाया कि उसने जानबूझकर गिरफ्तारी से बचने की कोशिश की और सजा के बारे में जानकारी छिपाकर ‘धोखाधड़ी’ से सरकारी नौकरी हासिल की. आखिरकार अदालत ने याचिका खारिज कर दी.

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