सुपर स्टार ऑफ दि मिलेनियम अमिताभ बच्चन की वो फिल्म याद है, भूतनाथ? अरे हां, वही जिसमें ‘बंकू भइया’ के बस्ते से टिफिन निकलता था. और उस टिफिन पर हेड मास्टर साहब की नजर होती थी. स्कूल बैग से टिफिन तो आज भी निकलते हैं, मगर साथ में कई ऐसी-ऐसी चीजें भी निकलती हैं. जिन्हें बच्चों के बैग में ना तो टीचर देखना चाहेंगे और ना ही बच्चों मम्मी-पापा.
स्कूल बैग, 30 रुपये वाली लिपस्टिक और कैंसर का खतरा, केरल के स्कूलों की कहानी, पैरेंट्स की आंखें खोल देगी
Lipstick Free School Campus: केरल का कोल्लम देश का पहला 'कॉस्मेटिक मुक्त' स्कूल कैंपस वाला जिला बन गया है. इंस्टाग्राम रील्स के 'GRWM' कल्चर से उपजा ये शौक अब बच्चों के लिए आंतों के कैंसर का 'धीमा जहर' साबित हो रहा है. जानिए कैसे स्कूल गेट के बाहर बिकने वाली 20 रुपये की लिपस्टिक ने हेल्थ डिपार्टमेंट और पैरेंट्स की नींद उड़ा दी है और क्यों ये हर शहर की कहानी है.


मोबाइल फोन से लेकर सिगरेट और गुटखा के पैकेट और लिपस्टिक-नेलपॉलिश जैसे कॉस्मेटिक्स तक… बच्चों का स्कूल बैग एक खतरनाक पहेली बनता जा रहा है, जिसे समय रहते सुलझाना बेहद जरूरी है. आज बात सिर्फ स्कूल बैग्स में पाए जाने वाले कॉस्मेटिक्स की. जिसने केरल के स्कूलों को टेंशन में डाल दिया है.
समाचार पत्र ‘द हिंदू’ ने कुछ दिनों पहले खबर छापी थी कि केरल के स्कूलों में जब बस्ते खुलते हैं तो पेंसिल बॉक्स के अंदर मसकारा, आई लाइनर, काजल और लिपस्टिक निकल रहे हैं. ये कॉस्मेटिक्स सिर्फ स्कूल के परंपरा, प्रतिष्ठा और अनुशासन की धज्जियां ही नहीं उड़ा रहे. बल्कि बच्चों की मासूमियत खतरे में डालने के साथ-साथ, उन्हें कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी की ओर भी धकेल रहे हैं.

ऐसे में केरल के कोल्लम जिले से एक ऐसी खबर आई है जिसने देशभर के स्कूलों के संचालकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. ‘एनडीटीवी’ की खबर के मुताबिक कोल्लम देश का पहला ऐसा जिला बन गया है, जहां के स्कूल सौ फीसदी ‘कॉस्मेटिक फ्री’ हैं. यहां के स्कूलों में अब लिपस्टिक, मस्कारा और काजल के लिए 'नो एंट्री' बोर्ड लग चुका है.
अब जबकि कोल्लम, देश का पहला 'कॉस्मेटिक-फ्री' कैंपस जिला बन चुका है. सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी. बच्चे अगर सज संवर रहे हैं तो उसमें दिक्कत ही क्या है? मगर बात उतनी सीधी भी नहीं, जितनी नजर आती है.
सवाल ये नहीं है कि स्कूल में सजना-संवरना मना है या नहीं? असली सवाल ये है कि आखिर 10-12 साल के बच्चों की जेबों में ये 20-30 रुपये वाला 'जहरीला मेकअप' आया कहां से? आखिर हालात इतने कैसे बिगड़ गए कि कोल्लम जिला प्रशासन को एक पूरा 'अभियान' छेड़ना पड़ गया?
सेहत का खेल: 30 रुपये का 'चमकदार' स्लो पॉइजन
ऐसा नहीं है कि कोल्लम जिसा प्रशासन और वहां के स्कूल वाले मोरल पुलिसिंग पर उतर आये हैं. बल्कि इस पूरे अभियान के बैकड्रॉप में है, तिरुवनंतपुरम के रीजनल कैंसर सेंटर (RCC) और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) की एक रिपोर्ट, जिसे पढ़कर आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे.
इस रिपोर्ट के मुताबिक कोल्लम और आसपास के जिलों में स्कूली बच्चों में पेट और आंतों के कैंसर (Intestinal Cancer) के मामले सामने आए. जब तहकीकात हुई, तो सुई जाकर टिकी उन सस्ती लिपस्टिक्स पर जो लड़कियां बड़ी आसानी से पॉकेट मनी से खरीद रही थीं.
कुल मिलाकर बात बहुत सीधी सी है. बच्चे लिपस्टिक लगाते हैं, उसे गलती से निगल भी जाते हैं, जिसे मेडिकल लैंग्वेज में Lipstick Ingestion कहते हैं. कई रिसर्च और रिपोर्ट्स में इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि इन नॉन-ब्रांडेड और सस्ते कॉस्मेटिक्स में लेड (सीसा), मरकरी (पारा) और कैडमियम जैसे 'हेवी मेटल्स' की भरमार होती है.
बच्चों की स्किन बड़ों के मुकाबले बहुत ज्यादा सेंसिटिव होती है, जिससे ये टॉक्सिन्स सीधे खून और पाचन तंत्र में घुल जाते हैं. यानी जो चमक होठों पर दिख रही है, वो असल में शरीर के अंदर धीरे-धीरे जहर घोल रही है.
रील लाइफ का नशा: 10 साल की उम्र में 'बॉडी डिस्मॉर्फिया'
जो बचपन कभी छुपन-छुपाई और रिंगा-रिंगा रोजेज में मस्त रहता था. उनके अंदर आखिर ये 'सजने-संवरने' की सनक आई कहां से? जवाब बड़ा सीधा सा है. इसके लिए जिम्मेदार है- इंस्टाग्राम और यूट्यूब का 'GRWM' (Get Ready With Me) कल्चर.
मनोवैज्ञानिक और चाइल्ड काउंसलर डॉ वीना ध्यानी के मुताबिक साइकोलॉजिक की भाषा में इसे 'बॉडी डिस्मॉर्फिया' की शुरुआत कहते हैं. लल्ललटॉप से फोन पर बात करते हुए डॉ ध्यानी कहती हैं,
10-12 साल के बच्चे रील्स देखकर ये मान चुके हैं कि अगर चेहरे पर मेकअप नहीं है, तो वो 'कूल' नहीं दिखेंगे. ये सिर्फ शौक नहीं है, बल्कि एक तरह की असुरक्षा है जो बच्चों के दिमाग में बैठ गई है कि उनका नेचुरल रूप 'कमतर' है.
नोएडा के एक नाम चीन पब्लिक स्कूल की नर्सरी विंग में पढ़ाने वाली एक टीचर ने नाम ना छापने की शर्त पर लल्लनटॉप को जो बताया वो चौंकाने वाला है. वो कहती हैं,
क्लासरूम के ब्रेक्स में अब पढ़ाई नहीं, बल्कि शीशे के सामने पाउट बनाने और दीवारों पर लिप-प्रिंट्स छोड़ने की होड़ मची है.
सिर्फ केरल तक सीमित नहीं ये ‘ब्यूटीफुल’ ज़हर!
केरल की ये घटना इकलौती नहीं है. इस जहरीले खेल की जड़ें दिल्ली से लेकर मुंबई तक फैली हैं. हाल ही में आजतक ने दिल्ली के सदर बाजार जैसे बड़े बाजारों में 'ऑपरेशन ब्यूटीफुल' नाम से एक स्टिंग ऑपरेशन किया था
इस स्टिंग में जो सच सामने आया, वो किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं था. नामी ब्रांड्स के नाम पर नकली, एक्सपायर्ड और घटिया केमिकल से बने कॉस्मेटिक्स खुलेआम बिक रहे थे. 300 रुपये वाली लिपस्टिक महज 50 रुपये में मिल रही थी. ताज्जुब नहीं कि ये घटिया और सस्ता माल घूम-फिर कर आपके बच्चों के स्कूल के बाहर की रेड़ियों और स्टेशनरी शॉप्स पर पहुंचता हो, जिसे बच्चे शौक-शौक में खरीद लेते हैं.
'कॉस्मेटिक-फ्री' कैंपस पर जनता की राय
'कॉस्मेटिक-फ्री' कैंपस के फैसले को आम लोगों का तेजी से समर्थन भी मिल रहा है. इसे लेकर जानकारों की राय साफ है. सीनियर डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. रमन सचदेवा लल्लनटॉप से बात करते हुए कहते हैं,
बच्चों की स्किन पर ऐसे बिना टेस्टिंग वाले प्रोडक्ट्स लगाना खतरनाक है. लेड और मरकरी जैसे तत्व न केवल स्किन खराब करते हैं, बल्कि ऑर्गन्स को भी डैमेज कर सकते हैं.
वहीं, दिल्ली के एक कॉलेज में सोशियोलॉजी की प्रोफेसर डॉ. अंकिता शर्मा का मानना है,
बचपन का बाजारीकरण हो चुका है. केरल का फैसला सिर्फ कॉस्मेटिक बैन नहीं, बल्कि बचपन को इस 'असुरक्षा' की अंधी दौड़ से बचाने की कोशिश है.
अभिभावकों के बीच भी ये चर्चा गरम है. लल्लनटॉप से बात करते हुए एच आर प्रोफेशनल और एक टीन एज बेटी की मां रश्मि कहती हैं ,
पिछले हफ्ते मेरी बेटी के बैग से 20 रुपये वाली लिपस्टिक निकली. ये बैन पूरे देश में लागू होना चाहिए.
वहीं दूसरी तरफ स्कूल जाने वाली कुछ लड़कियों का मानना है कि
बैन ठीक है, लेकिन इसे सजा नहीं, जागरूकता की तरह पेश किया जाए.
टीचर्स का 'मैनेजमेंट मंत्रा': डंडा नहीं, काउंसलिंग
केरल के स्कूलों ने एक मास्टरस्ट्रोक चला है. उन्होंने बच्चों को डांटने या सस्पेंड करने के बजाय, उन्हें 'ग्रीन सर्टिफिकेट' और 'कॉस्मेटिक-फ्री स्टार' का तमगा देना शुरू किया है. जब बच्चा खुद को गर्व के साथ इस कैंपेन का हिस्सा मानता है, तो वो धीरे-धीरे खुद ही इन जहरीले रंगों से दूरी बनाने लगता है.
केरल के कोल्लम ने तो घंटी बजा दी है, लेकिन बाकी शहरों के स्कूलों का क्या? जब तक हम इस 'सस्ते और जहरीले' ब्लैक मार्केट को नहीं पहचानेंगे और बच्चों को ये नहीं समझाएंगे कि उनकी खूबसूरती का पैमाना रील के 'पाउट' नहीं हैं, तब तक ये खतरा हर स्कूल के गेट पर खड़ा मिलेगा.
जरा सोचिए और चेक करके देख लीजिए कि कहीं आपके बच्चे के बस्ते में भी वही 'धीमा खूबसूरत जहर' तो नहीं रखा है? और हां, चलते-चलते स्कूली बच्चों के लिपस्टिक लगाने को लेकर पॉपुलर एक मिथ पर भी फिर से नजर डाल लेते हैं कि “लिपस्टिक लगाने से क्या 'विद्या माता' रूठ जाती हैं?”. लल्लनटॉप ने आज से करीब दस साल पहले इस राज से पर्दा उठाया था. दिलचस्पी हो तो पढ़ सकते हैं, मज़ा आएगा.
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