लोकतंत्र में जनता वोट देने के अलावा क्या कर सकती है? आप कहेंगे कि अगर सरकार कोई ‘जन विरोधी’ काम करती है तो जनता प्रोटेस्ट कर सकती है. अभी तक तो भूख हड़ताल, धरना प्रदर्शन या सत्याग्रह जनता की अभिव्यक्ति के अधिकार माने जाते थे. लेकिन केरल हाई कोर्ट ने तो कोई अलग ही सिद्धांत गढ़ दिया है.
'लोकतंत्र में सत्याग्रह के लिए कोई जगह नहीं', हाई कोर्ट ने हैरान कर दिया
केरल हाई कोर्ट ने एक यूनिवर्सिटी के 16 सस्पेंडेड छात्रों को सेमेस्टर परीक्षा में बैठने की इजाजत देने से इनकार कर दिया. छात्रों ने बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं की मांग को लेकर प्रदर्शन और नुक्कड़ नाटक किया था.

कुछ छात्रों के सस्पेंशन के मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि धरना, भूख हड़ताल या सत्याग्रह की लोकतंत्र में कोई जगह नहीं, खासतौर पर शिक्षण संस्थानों में तो ये सब नहीं किया जा सकता. ये कहते हुए केरल हाई कोर्ट ने सस्पेंडेड छात्रों को सेमेस्टर एग्जाम देने की इजाजत देने से इनकार कर दिया.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ये छात्र केरल के एर्नाकुलम जिले में श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं. सीपीआईएम के छात्र संगठन एसएफआई से जुड़े हैं. अगस्त 2026 में उन्होंने यूनिवर्सिटी में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और एकेडमिक सुविधाओं की मांग करते हुए एक प्रोटेस्ट और नुक्कड़ नाटक किया था. आरोप लगा कि इसमें उन्होंने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर सिजा थॉमस का अपमान किया. इसके बाद प्रोटेस्ट में शामिल 16 छात्रों को ये कहते हुए सस्पेंड कर दिया गया कि उन्होंने कॉलेज में अटेंडेंस से जुड़ी ज़रूरी शर्तें पूरी नहीं की थीं. उन्हें सेमेस्टर एग्जाम देने से वंचित कर दिया गया.
इसके बाद छात्र सस्पेंशन रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट पहुंचे. वहां की सिंगल बेंच ने छात्रों को सेमेस्टर एग्जाम देने की इजाजत दे दी. यूनिवर्सिटी ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला जस्टिस अनिल के नरेंद्रन और जस्टिस एस मुरली कृष्ण की डिवीजन बेंच के पास पहुंचा. जजों ने सिंगल बेंच के फैसले को रद्द कर दिया और कहा कि कोर्ट कोई ऐसी राहत नहीं दे सकता, जिसके लिए किसी अथॉरिटी के नियमों के खिलाफ जाना पड़े.
बेंच ने आगे कहा,
हम ये कहना चाहेंगे कि धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी सियासी हरकतों की संवैधानिक लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है. एकेडमिक इंस्टिट्यूशन में तो और भी नहीं. कोई भी व्यक्ति जो किसी एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन में ऐसी एक्टिविटीज़ में शामिल होगा, उसे निकाला जा सकता है या रस्टिकेट किया जा सकता है.
कोर्ट ने कहा कि एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन शिक्षा देने के लिए होते हैं, पॉलिटिक्स के लिए नहीं. अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए पॉलिटिकल पार्टियां एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन या सभ्य स्टूडेंट्स के शिक्षा पाने के अधिकार को बंधक नहीं बना सकतीं. कोर्ट ने कहा कि एकेडमिक डिसिप्लिन बनाए रखने के नियम का पालन होना चाहिए. पॉलिटिकल एक्टिविटीज यूनिवर्सिटी के माहौल से मेल नहीं खातीं. कोर्ट के मुताबिक, सस्पेंशन के बाद कोई एग्जाम में बैठने के लायक है या नहीं ये संस्थान के नियमों के हिसाब से तय होने की व्यवस्था बनी रहनी चाहिए.
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डिवीजन बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के हिसाब से कोर्ट ऐसी कोई राहत नहीं दे सकते जिसके लिए किसी अथॉरिटी के नियमों के खिलाफ जाना पड़े. रेगुलेटरी ज़रूरतों को पूरा किए बिना स्टूडेंट्स को एग्जाम देने की इजाज़त देने से यूनिवर्सिटी के कानूनी मानक और डिसिप्लिन के लिए उठाए गए कदम दोनों ही कमज़ोर होंगे.
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