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पार्टनर के कंसेंट के बिना प्राइवेट वीडियो शेयर किया तो जेल होगी, कानून क्या कहता है?

Karnataka revenge porn order: निजी फोटो और वीडियो को बिना सहमति के पब्लिश या शेयर करने पर अब कर्नाटक में FIR दर्ज करना अनिवार्य है. राज्य भर के सभी पुलिस अधिकारियों को आदेश दिया कि वे रिवेंज पोर्नोग्राफी, सेक्सटॉर्शन और ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसी घटनाओं में FIR जरूर लिखे.

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कर्नाटक में निजी फोटो और वीडियो को बिना सहमति के शेयर करने के मामलों में FIR दर्ज करनी अनिवार्य है. (फोटो-इंडिया टुडे)

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  • कर्नाटक के डीजीपी एमए सलीम ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि बिना सहमति के निजी पलों के फोटो या वीडियो को शेयर करने पर तुरंत FIR दर्ज की जाए।
  • कई मामलों में शिकायतें दायर न करने या देरी से दर्ज करने की वजह से रिवेंज पोर्नोग्राफी, सेक्सटॉर्शन जैसी घटनाएं बढ़ी हैं और शिकायतें खारिज की गई हैं।
  • पुलिस अधिकारियों को IT एक्ट और BNS की धारा 77 के तहत डिजिटल सबूत सुरक्षित करने और जल्द टेकडाउन नोटिस जारी करने के निर्देश दिए गए हैं।

निजी पलों (Intimate) को रिकॉर्ड करने का कंसेंट और शेयर करने की इजाजत देना कानूनी तौर पर दो एकदम अलग बातें हैं. कोई अगर अपने अंतरंग पलों को कैमरे में रिकॉर्ड करने दे रहा है तो इसका मतलब ये नहीं कि व्यक्ति के पास अधिकार है कि वो इसे कहीं भी शेयर कर दे. ऐसा करना एक गंभीर अपराध है. ये टिप्पणी की है कर्नाटक के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस एमए सलीम ने. उन्होंने प्रदेश के सभी पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वो निजी पलों के फोटो और वीडियो बिना सहमति के पब्लिश या शेयर करने के मामलों पर जरूर FIR दर्ज करेंगे.

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आरोप लगते हैं कि जब पीड़ित पक्ष ‘रिवेंज’ पोर्नोग्राफी, सेक्सटॉर्शन और ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसी घटनाओं की शिकायत लेकर लोकल थाने पहुंचे तो केस दर्ज नहीं किया गया. या इसमें काफी देरी की गई. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अधिकारियों ने कंटेंट रिकॉर्ड करने में पीड़ित की सहमति होने की बात कहकर शिकायत खारिज कर दी.

DGP ने कोर्ट का दिया हवाला

ऐसे में अब DGP सलीम ने सभी पुलिस अधिकारियों को आदेश देते हुए कहा,

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रिकॉर्ड करने की सहमति और शेयर करने की सहमति दो पूरी तरह से अलग कानूनी अवधारणाएं हैं. भले ही किसी पीड़ित ने अपनी फोटो या वीडियो बनवाने के लिए सहमति दी हो, लेकिन उनकी अनुमति के बिना उस कंटेंट को किसी तीसरे पक्ष के साथ शेयर करना एक कॉग्निजेबल ऑफेंस (गंभीर अपराध) है.

DGP ने चेतावनी दी कि अगर कोई अधिकारी बिना सहमति के बनाए गए इंटीमेट कंटेंट (निजी पलों के वीडियो/फोटो) से जुड़े मामले में FIR दर्ज करने से इनकार करता है. या उसमें देरी करता है तो उसके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. पुलिस अधिकारी ने अपने आदेश में जस्टिस केएस पुट्टास्वामी (रिटायर्ड) बनाम भारत संघ (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया. ऑर्डर ने निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया था.

सलीम ने कहा कि इस नियम का उल्लंघन 'वॉयरिज्म' माना जाता है. वायरिज्म का मतलब है किसी की जानकारी के बिना उन्हें अंतरंग पलों में देखना. इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 77 के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है.

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BNS के प्रावधानों के अलावा, दोषियों पर इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) एक्ट की धारा 66(e), 67 और 67(a) के तहत भी मामला दर्ज किया जा सकता है. IT एक्ट के तहत किसी व्यक्ति की सहमति के बिना उसके निजी अंगों की तस्वीरें लेने या उन्हें पब्लिश करने पर सात साल तक की जेल हो सकती है. IT एक्ट की ये धाराएं जेंडर-न्यूट्रल हैं. डीजीपी ने जेल पर बात करते हुए कहा,

किसी महिला की सहमति के बिना उसकी निजी गतिविधि की तस्वीरें लेने या उन्हें फैलाने पर पहली बार अपराध करने पर एक से तीन साल की जेल हो सकती है. बार-बार ऐसा करने पर तीन से सात साल की जेल हो सकती है.

अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे महिला पीड़ितों के मामलों में BNS की धारा 77 के साथ-साथ IT एक्ट के संबंधित प्रावधानों को भी लागू करें. अब स्थानीय पुलिस अधिकारियों के लिए यह जरूरी है कि वे IT एक्ट के तहत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को तुरंत 'टेकडाउन नोटिस' जारी करें. और जरूरी डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखें.

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