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''NICE के प्रोजेक्ट में कुछ नाइस नहीं, ये अब तक का सबसे बड़ा स्कैम', कर्नाटक HC ने बुरा लताड़ा

Bengaluru Mysuru NICE Project: जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस टी.एम. नदाफ की डिवीजन बेंच NICE की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी. लेकिन सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि NICE प्रोजेक्ट में कुछ भी नाइस नहीं है. उन्होंने इसे राज्य का सबसे बड़ा घोटाला भी बता दिया.

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NICE ने जस्टिस आर देवदास की सिंगल बेंच के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. (फोटो-इंडिया टुडे)

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  • कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि बैंगलोर-मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर (BMIC) प्रोजेक्ट में किसानों की जमीन के मुआवजे का 23 साल से निर्धारण नहीं किया गया है, जिसे राज्य के एक बड़े घोटाले की तरह देखा जा रहा है।
  • BMIC प्रोजेक्ट का उद्देश्य बेंगलुरु और मैसूर के बीच बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करना था, लेकिन जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया में मुआवजे की देरी और कमर्शियल उपयोग से विवाद उत्पन्न हुआ।
  • हाई कोर्ट ने NICE की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि प्रोजेक्ट के दौरान मुआवजे में लगातार देरी से अधिग्रहण की प्रक्रिया अमान्य मानी जाएगी और मामले की जांच आवश्यक है।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने बैंगलोर-मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर (BMIC) प्रोजेक्ट पर कड़ी टिप्पणी की है. कहा कि यह राज्य के सबसे बड़े घोटालों में से एक लग रहा है. कोर्ट ने कहा है कि 23 सालों से किसानों की अधिग्रहित जमीन के बदले ‘अवॉर्ड’ (मुआवजा तय करने का आदेश) नहीं दिया गया. परियोजना बेहतर कनेक्टिविटी के लिए लाई गई थी, मगर इसका इस्तेमाल कमर्शियली होने लगा.

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मामले की सुनवाई जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस टी.एम. नदाफ की डिवीजन बेंच कर रही थी. वह नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइज (NICE) और कर्नाटक इंडस्ट्रियल एरियाज डेवलपमेंट बोर्ड (KIADB) की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें सिंगल बेंच के फैसले को चुनौती दी गई थी. मगर यहां कोर्ट ने कहा कि NICE प्रोजेक्ट में कुछ भी अच्छा (nice) नहीं है. किसानों से बिना मुआवजा दिए उनकी जमीन छीन ली गई.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, 29 जुलाई को बेंच ने कहा,

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“सामने आए तथ्यों से पता चलता है कि NICE प्रोजेक्ट में कुछ भी अच्छा नहीं है. यहां सिर्फ किसानों से बिना मुआवजा दिए उनकी जमीन और पीढ़ियों की आजीविका छीन ली गई है. एक हलफनामे के मुताबिक, 111 किलोमीटर में से सिर्फ 5 किलोमीटर एक्सप्रेसवे बनाया गया है. NICE के पास 20 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन का भंडार है. इस जमीन व संपत्ति का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया गया है.”

कोर्ट ने कहा कि यह प्रोजेक्ट सुप्रीम कोर्ट के 2021 के फैसले और 1997 में कर्नाटक सरकार तथा NICE के बीच हुए फ्रेमवर्क एग्रीमेंट (FWA) की शर्तों के मुताबिक नहीं चला. 1998 से 2009 के बीच जमीन अधिग्रहण की अधिसूचनाएं जारी हुईं. लेकिन जमीन मालिकों को 23 साल तक कोई अवॉर्ड जारी नहीं किया गया.

ऐसे में कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, 

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"BMICP कर्नाटक राज्य के सबसे बड़े घोटालों में से एक हो सकता है. यह दिखाता है कि कैसे एक राज्य (जो नागरिकों की ओर से प्राकृतिक संसाधनों का ट्रस्टी होता है) संवैधानिक नियमों और कानूनों का पूरी तरह उल्लंघन करके. संदिग्ध वजहों से निजी हितों को फलने-फूलने दे सकता है. इससे पर्यावरण, इकोलॉजी और जनहित को नुकसान पहुंचता है.”

क्या था BMICP प्रोजेक्ट?

BMICP बेंगलुरु और मैसूर के बीच कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए शुरू की गई थी. इसके तहत,

-लगभग 111 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेसवे,
-लगभग 41 किलोमीटर लंबी पेरिफेरल रोड और
-लगभग 9.8 किलोमीटर लंबी लिंक रोड बनाना,
-पांच आत्मनिर्भर टाउनशिप भी विकसित करना शामिल था.

NICE का कहना था यह प्रोजेक्ट जनहित में शुरू किया गया. लेकिन कोर्ट का कहना था कि परियोजना हित में लाई गई, सिर्फ यह नहीं देखना है. इसका इस्तेमाल कैसे हुआ, यह भी देखा जाएगा.

अदालत ने चिंता जताई कि प्रोजेक्ट की जमीन का कमर्शियल इस्तेमाल हुआ. NICE की सालाना रिपोर्ट में टोल कलेक्शन के अलावा, डेवलप्ड जमीन की बिक्री, ज्वाइंट डेवलपमेंट एग्रीमेंट और प्रोजेक्ट की जमीन से होने वाली कमाई को भी रेगुलर इनकम का जरिया बताया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों की जांच होनी चाहिए. लेकिन इसमें सरकार भी भागीदार नजर आती है.

'अनिश्चित काल तक मुआवजा नहीं टाल सकते'

NICE ने हाई कोर्ट के जस्टिस आर देवदास की सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती दी थी. आदेश में कर्नाटक इंडस्ट्रियल एरियाज डेवलपमेंट बोर्ड (KIADB) के प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहित की गई कई एकड़ निजी जमीन के अधिग्रहण को रद्द कर दिया गया था. NICE ने यह भी दलील थी कि KIAD अधिनियम (कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम) के तहत अवॉर्ड देने की कोई कानूनी समय-सीमा लागू नहीं होती.

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इस पर कोर्ट ने टोकते हुए कहा कि इसका मतलब यह नहीं कि आपको अनिश्चित काल तक देरी करने की खुली छूट मिल गई है. कोर्ट ने कहा, "अधिकारियों की ओर से दो दशकों से ज्यादा समय तक अवॉर्ड (मुआवजे का फैसला) जारी न कर पाना. इतनी लंबी देरी के लिए कोई संतोषजनक कारण न बता पाना, अधिग्रहण की प्रक्रिया को अमान्य बनाता है."

आखिर में हाई कोर्ट ने NICE की दलील खारिज कर दी.

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