जम्मू के सिधरा इलाके में इस हफ्ते की शुरुआत में दो दर्जन से ज्यादा घरों को गिरा दिया गया. आरोप था कि ये घर वन विभाग की जमीन पर बनाए गए थे. अब्दुल रजाक (80) और खातून बी (75) का घर भी इन घरों में शामिल था. पिछले 30 सालों में यह दूसरी बार है जब इस बुजुर्ग दंपती को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है. इससे पहले साल 1997 में उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा था, जब आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों को जानकारी देने पर उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी.
कश्मीर में सेना की मदद की तो गांव छोड़ना पड़ा, 30 साल बाद बुलडोजर ने फिर उजाड़ दिया
Jammu Kashmir: पिछले 30 सालों में यह दूसरी बार है जब इस बुजुर्ग दंपति को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है. इससे पहले साल 1997 में उन्हें अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था, जब आतंकवादियों ने सुरक्षा बलों को जानकारी देने के लिए उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी.


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 मई को 43 डिग्री की चिलचिलाती गर्मी के बीच उनके घर पर बुलडोजर चल गया. बुजुर्ग दंपती ने धूप से बचने के लिए एक पेड़ के नीचे शरण ली. छांव में बैठे अब्दुल ने याद किया कि साल 1997 में भी उन्हें और उनकी पत्नी को बेघर होना पड़ा था, जब वे दक्षिण कश्मीर के कोकरनाग (अनंतनाग जिले) में रहते थे. उन्होंने बताया,
उस समय दक्षिण कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था. सेना की एक टुकड़ी हमारे गांव आई थी. अगली सुबह उन्होंने स्थानीय लोगों को बुलाया. सेना के एक सीनियर अधिकारी ने हमसे अपील की कि हम उन्हें इलाके में मौजूद आतंकवादियों के बारे में जानकारी दें.
उन्होंने यह भी बताया कि उनकी दी जानकारी के आधार पर कई आतंकवादी मारे गए थे. आगे उन्होंने बताया,
उस दौरान हमने सुरक्षा बलों के लिए काम किया और उनके लिए बंकर भी बनाए, लेकिन जब हमारा इलाका उग्रवाद से मुक्त हो गया तो सेना की यूनिट चली गई. उग्रवादी गांव लौट आए और घरों के साथ-साथ उस स्कूल की इमारत को भी जला दिया, जहां सुरक्षा बलों ने डेरा डाला हुआ था. जब उग्रवादियों ने ग्रामीणों से उन लोगों के नाम बताने को कहा जिन्होंने सुरक्षा बलों की मदद की थी तो उनमें से कुछ ने हमारे नाम बताए.
अब्दुल ने याद किया कि आतंकवादियों ने गांव में उनके बहनोई समेत तीन लोगों की हत्या कर दी थी. परिवार में दहशत फैल गई और वे जम्मू भाग गए.
अब 30 साल बाद अब्दुल और उनकी पत्नी खातून को एक बार फिर से विस्थापित होना पड़ा है. वन विभाग और पुलिस के कर्मचारियों ने आदिवासी गुर्जर और बकरवाल समुदायों के लोगों के 25-30 घरों को तोड़ दिया है. इनमें इस बुजुर्ग दंपति का घर भी शामिल था. इस बार उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे कहां जाएं? फिलहाल, वे उसी जमीन पर लगाए गए अस्थायी टेंटों में रह रहे हैं, जहां उनके घरों को तोड़ा गया था. अब्दुल रजाक और खातून बी कश्मीर से आए रजिस्टर्ड प्रवासी हैं, जिन्हें मुफ्त राशन और हर महीने प्रति व्यक्ति 3,250 रुपये की नकद राहत मिलती है.
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मंत्री ने कार्रवाई का वादा कियाजम्मू-कश्मीर के वन और जनजातीय मामलों के मंत्री जावेद राणा ने वन विभाग के दावे को खारिज कर दिया है. उन्होंने कहा कि लोग वन जमीन पर नहीं बल्कि सरकारी जमीन पर रह रहे थे. मंत्री जावेद ने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से भी इस तोड़फोड़ अभियान में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने की अपील की है.
इसके बाद जावेद राणा ने मामले की जांच के लिए दो सदस्यों वाली एक 'तथ्य-खोज समिति' का गठन किया. यह कमेटी ‘वन अधिकार अधिनियम, 2006’ के उल्लंघन पर सरकार को रिपोर्ट सौंपेगी. यह अधिनियम आदिवासियों को वन भूमि पर रहने का अधिकार देता है. पैनल को सात दिनों में अपनी रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया गया है.
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