वियतनाम वॉर अमेरिका के लिए ‘वाटरलू’ साबित हुआ था. यानी इस जंग में वियतनाम ने अमेरिका जैसी महाशक्ति को नाको चने चबवा दिए थे. इसने अमेरिका की ग्लोबल पावर की छवि को भी खोखला साबित कर दिया था. अमेरिका ने इस युद्ध में जीत के लिए तमाम ‘धतकर्म’ किए थे. अमेरिकी लड़ाकू जहाजों ने वियतनाम के जंगलों और खेतों में लाखो लीटर ‘एजेंट ऑरेंज’ का छिड़काव किया था. एजेंट ऑरेन्ज एक तरह का केमिकल होता है, जिसका इस्तेमाल खरपतवार को नष्ट करने में किया जाता है.
जिस केमिकल ने वियतनाम के खेतों को झुलसाया, उसे भारत में इस्तेमाल की मंजूरी किसने दे दी?
भारत के किसान अपने खेतों में 2,4-डाइक्लोरोफेनॉक्सीएसेटिक एसिड नाम के जहर का खुलेआम छिड़काव कर रहे हैं. इसको हर्बिसाइड के नाम पर खेतों में छिड़का जा रहा है. लेेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की कैंसर अनुसंधान संस्था IARC ने 2,4-D को ग्रुप 2B (Possibly Carcinogenic) यानी इंसानों के लिए संभावित रूप से 'कैंसरकारी' केमिकल की श्रेणी में रखा है.


अमेरिका ने वियतनाम के घने जंगलों और फसलों को बर्बाद करने के लिए इस खतनाक केमिकल को छिड़का था. जंगल और खेतों से वियतनाम के कम्युनिस्ट लड़ाकों को रसद मिलाता था. इस सप्लाई चेन को काटने के लिए अमेरिका की रणनीति में इस केमिकल ने एंट्री ली थी. इस जंग में तो एजेंट ऑरेन्ज से अमेरिका के मंसूबे पूरे नहीं हुए लेकिन भारत के खेतों में ‘ऑरेज एजेंट’ बनाने में इस्तेमाल होने वाले केमिकल को इस्तेमाल करने का लाइसेंस दे दिया गया है. इस केमिकल का नाम है- 2,4-D यानी 2,4-डाइक्लोरोफेनॉक्सीएसेटिक एसिड.
कहने को तो ये सेलेक्टिव हर्बिसाइड है जो सिर्फ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को खत्म करता है. लेकिन असल में यह हमारी कृषि व्यवस्था की रीढ़ पर सीधा हमला है. फसलों में परागण (Pollination) करके लोगों के लिए खाना उपलब्ध करवाने वाली मधुमक्खियों का यह केमिकल बेरहमी से कत्ल कर रहा है. लेकिन मुनाफे की दौड़ में अंधी हो चुकी कंपनियां और सिस्टम के लोग भूल गए कि मधुमक्खियां खत्म हुईं तो पूरा ईकोसिस्टम तबाह हो जाएगा.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, एक तरफ एग्रो केमिकल कंपनियों का अरबों का टर्नओवर और सस्ती खेती की दलील है. दूसरी तरफ मानव जीवन की सुरक्षा का सवाल. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की कैंसर अनुसंधान संस्था IARC ने 2,4-D को ग्रुप 2B (Possibly Carcinogenic) यानी इंसानों के लिए संभावित रूप से 'कैंसरकारी' केमिकल की श्रेणी में रखा है. दुनिया के विकसित देशों ने इसके खतरनाक एस्टर फॉर्मूलेशन पर भारी पाबंदी लगा रखी है.
सरकारी भी मान चुकी है खतराभारत में बिक रहे खतरनाक केमिकलों की जांच के लिए डॉ. अनुपम वर्मा की अध्यक्षता में एक एक्सपर्ट कमेटी बनी थी. इस कमेटी ने 2,4-D को बैन करने की सिफारिश की थी.
साल 2020 में इस कमेटी की रिपोर्ट का ड्राफ्ट ऑर्डर जारी हुआ था. इसमें साफ साफ लिखा था कि 2,4-D में डायोक्सीन की बड़ी मात्रा पाई जाती है, जो सीधे तौर पर कार्सिनोजोनिक यानी कैंसर पैदा करने वाला है. ड्राफ्ट में इस पर पूरी तरह से बैन का प्रस्ताव रखा गया.
तब कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया था. एग्रो-केमिकल कंपनियों के संगठनों का तर्क था कि विदेशों में इस केमिकल पर जो पाबंदी लगी है, उसका भारतीय खेती से कोई लेना-देना नहीं है. जब केंद्र सरकार ने 2,4-डी समेत 27 खतरनाक कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा तो केमिकल कंपनियों ने कहा कि ऐसा करने से पूरे देश के घरेलू उत्पादन पर असर पड़ेगा. इससे अरबों रुपये का एक्सपोर्ट मार्केट खतरे में पड़ जाएगा.
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सिस्टम ने लिया यू-टर्नइस केस में असली खेल साल 2020 के ड्राफ्ट के बाद शुरू हुआ. जिस केमिकल को खुद सरकार ने कैंसरकारी माना था. जिस पर खुद सरकार बैन लगाने की तैयारी कर रही थी. उस केमिकल को लेकर यू-टर्न ले लिया गया. अक्टूबर 2023 में जब बैन किए गए कीटनाशकों की फाइनल लिस्ट जारी हुई तो सभी हैरान रह गए. सरकार ने Insecticides Prohibition Order, 2023 में 2,4-D को बड़ी चालाकी से बैन केमिकल्स की लिस्ट से बाहर कर दिया गया था. कृषि विभाग के अधिकारियों ने साल 2020 की अपनी ही चेतावनी पर पानी फेरते हुए इसके इस्तेमाल को हरी झंडी दे दी. कागजों पर बस इसके उपयोग लेकर सावधानियां बता दी गईं और पल्ला झाड़ लिया गया.
अब सवाल है कि जिस केमिकल को सरकारी दस्तावेजों में कैंसरकारी बताया गया था, वो आखिर किस ताकतवर कार्पोरेट लॉबी के प्रेशर में बैन केमिकल्स की लिस्ट से बाहर हो गया? आखिर लाखों किसानों और उनके कन्ज्यूमर्स की सेहत के साथ समझौता किसने कर लिया?
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