एक तरफ राजस्थान में आसमान से आग बरस रही है तो दूसरी तरफ अरुणाचल में बारिश और बाढ़ ने ऐसी तबाही मचाई है कि बचाव कार्य के लिए वायुसेना को मोर्चा संभालना पड़ा है. मौसम का ऐसा अजीबोगरीब रूप शायद ही पहले कभी देखने को मिला हो. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD ने एक ऐसा बुलेटिन जारी किया है जिसे देखकर अच्छे-अच्छे मौसम वैज्ञानिकों का सिर चकरा जाए. देश के 20 राज्यों में जहां मानसून अपनी पूरी ताकत के साथ दस्तक दे चुका है और भारी बारिश का तांडव शुरू हो गया है, वहीं कुछ इलाके ऐसे भी हैं जो अभी तक भीषण लू (हीटवेव) की चपेट में झुलस रहे हैं.
कहीं बारिश का कहर, कहीं आग उगलती गर्मी, 20 राज्यों के लिए मौसम विभाग का बड़ा अलर्ट
Monsoon Alert: मौसम विभाग ने देश के लिए मिक्स बुलेटिन जारी किया है. जहां 20 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट है, वहीं कई हिस्से अब भी भीषण लू की चपेट में हैं. इस खबर को मद्देनजर रखते हुए जानते हैं कि क्या क्लाइमेट चेंज ने मानसून का पूरा पैटर्न बिगाड़ दिया है?


ये स्थिति सिर्फ एक सामान्य मौसमी बदलाव नहीं है. ये इशारा है उस बड़े संकट की तरफ जिसे हम आसान भाषा में क्लाइमेट चेंज कहते हैं.
आधा हिंदुस्तान पानी में, आधा आग में: ये कैसा डबल अटैक है?
मौसम विभाग के ताजा अपडेट के मुताबिक, दक्षिण-पश्चिम मानसून बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है. मुंबई, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात समेत देश के करीब 20 राज्यों में भारी से बहुत भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है. मुंबई की सड़कों पर पानी भरने लगा है और दिल्ली-NCR में अचानक आई तेज बारिश ने लोगों को उमस से राहत तो दी, लेकिन ट्रैफिक जाम जैसी मुसीबतें भी खड़ी कर दीं.
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू बेहद डरावना है. जब देश का एक बड़ा हिस्सा रेनकोट और छाते ढूंढ रहा है, ठीक उसी वक्त उत्तर और पूर्वी भारत के कई जिले ऐसे हैं जहां तापमान अब भी 42 से 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है. वहां सूरज की तपिश और गर्म हवाओं के थपेड़े लोगों का जीना मुहाल किए हुए हैं.

क्या क्लाइमेट चेंज ने मानसून का पूरा कैलेंडर ही बिगाड़ दिया?
अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या हमारे मानसून का टाइम-टेबल पूरी तरह खराब हो चुका है? सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की ‘रिपोर्ट ऑन एक्सट्रीम वेदर’ तो हां, ऐसा बिल्कुल हो रहा है. पहले के दौर में मानसून के आने और आगे बढ़ने का एक तय पैटर्न होता था. केरल में एंट्री के बाद वो धीरे-धीरे मध्य भारत से होते हुए उत्तर भारत तक पहुंचता था. लेकिन अब ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से समुद्र का तापमान लगातार बढ़ रहा है.
जब समुद्र की सतह ज्यादा गर्म होती है, तो हवा में नमी सोखने की क्षमता अचानक बढ़ जाती है. इसी वजह से मानसून के बादल एक ही जगह पर कम समय में बहुत ज्यादा पानी बरसा देते हैं, जिसे हम 'फ्लैश फ्लड' या अत्यधिक भारी बारिश कहते हैं. दूसरी तरफ, जिन इलाकों तक नमी वाली हवाएं नहीं पहुंच पातीं, वहां की जमीन सूखी रह जाती है और वहां लंबे समय तक हीटवेव का दौर चलता रहता है.
ये जो एक ही समय पर बाढ़ और सूखे जैसी दो चरम स्थितियां (Extreme Weather Events) दिख रही हैं, वो सीधे तौर पर इस बात का सबूत हैं कि मौसम का पुराना चक्र टूट चुका है.

अल नीनो और ला नीना का वो खेल, जिसने सब उलझा दिया
इस पूरे खेल के पीछे प्रशांत महासागर में होने वाली हलचल भी जिम्मेदार है. पिछले कुछ समय से 'अल नीनो' के असर के कारण भारत में गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूट गए. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के ‘क्लाइमेट अपडेट’ की मानें तो अब मौसम वैज्ञानिक 'ला नीना' की तरफ बढ़ने की बात कर रहे हैं, जो आमतौर पर भारत में अच्छी और तेज बारिश लाता है.
समस्या ये है कि इन दोनों स्थितियों के बीच का जो बदलाव का समय है, वो बहुत हिंसक हो गया है. हवाओं का रुख इतनी तेजी से बदल रहा है कि एक तरफ तो चक्रवाती हवाएं नमी खींचकर भारी बारिश करा रही हैं, और दूसरी तरफ मैदानी इलाकों में शुष्क और गर्म हवाओं का दबाव बना हुआ है जो मानसून के बादलों को आगे बढ़ने से रोक रहा है. यही कारण है कि दिल्ली-यूपी जैसे राज्यों के कुछ हिस्सों में झमाझम बारिश हो रही है, तो कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही लोग उमस और लू से बेहाल हैं.
इस 'डबल अटैक' का हमारी जिंदगी पर क्या असर होगा?
मौसम की ये आंख-मिचौली सिर्फ हेडलाइंस बनाने तक सीमित नहीं है, इसका सीधा असर हमारी रसोई, जेब और सेहत पर पड़ने वाला है.
हेल्थ इमरजेंसी: अचानक मौसम बदलने से अस्पतालों में मरीजों की तादाद बढ़ जाती है. एक तरफ लू से डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक का खतरा है, तो दूसरी तरफ जलभराव के कारण डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियों का डर फैल रहा है.पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की वार्षिक रिपोर्ट इसकी समस्या की एक डरावनी तस्वीर पेश करती है.
सूखती फसल, तपते खेत: इस पूरे मौसमी संकट का सबसे बड़ा और सीधा प्रहार हमारी खेती-किसानी पर पड़ रहा है. एक तरफ जहां भारी बारिश से फसलें जलमग्न हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ जिन इलाकों में मानसून देरी से पहुंच रहा है या जहां सिर्फ सूखी गर्मी पड़ रही है, वहां पानी की कमी से खेती पूरी तरह सूखने की कगार पर पहुंच गई है. जून का महीना खरीफ की फसलों, जैसे धान, मक्का और गन्ने की बुवाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है.
भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की साप्ताहिक बुवाई रिपोर्ट भीषण गर्मी और लू के कारण मिट्टी की नमी पूरी तरह खत्म हो चुकी है, जिससे खेतों में दरारें पड़ गई हैं. नहरें सूखी हैं और भूजल स्तर गिरने से ट्यूबवेल भी जवाब दे रहे हैं. ऐसे में जो किसान महंगे डीजल और बिजली के दम पर बुवाई कर भी चुके हैं, उनकी अंकुरित फसलें तेज धूप में झुलसकर नष्ट हो रही हैं. अगर आने वाले कुछ दिनों में इन इलाकों में पानी नहीं बरसा, तो किसानों की पूरी लागत डूब जाएगी और देश के सामने खाद्य सुरक्षा का एक नया संकट खड़ा हो जाएगा.
महंगाई की मार: जब फसलें प्रभावित होंगी, तो सीधा असर सब्जियों और अनाज के दामों पर पड़ेगा. यानी मौसम की ये मार सीधे आम आदमी के बजट पर पड़ेगी.
वैसे इन सबके बीच मौसम की इस मार का एक और असर भारत के शहरों पर हर साल पड़ता है. सड़कों पर इतना पानी भर जाता है कि नाव चलने की नौबत आ जाती है. वैसे इस समस्या पर लल्लनटॉप ने एक लेख लिखा है. शीर्षक है- स्मार्ट सिटी या स्विमिंग पूल? पहली ही बारिश में पानी-पानी क्यों हो जाते हैं भारत के शहर? दिलचस्पी हो तो जरूर पढ़िएगा.
फिलहाल लौटते हैं मौसम की डलब चेतावनी पर क्योंकि अब वक्त आ गया है कि हम इसे सिर्फ 'आज का मौसम खराब है' कहकर न टालें. ये धरती के गर्म होने की वो चेतावनी है, जिसे अगर अब भी नहीं समझा गया तो आने वाले सालों में मानसून का ये रूप और ज्यादा डरावना हो सकता है.
वीडियो: सोशल लिस्ट: अचानक पूरे देश में बारिश कैसे? बिल गेट्स ने मौसम खराब कर दिया?















