‘पासपोर्ट केवल एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है, इससे नागरिकता साबित नहीं होती.’ विदेश मंत्रालय के इस बयान के बाद इंटरनेट पर बवाल मच गया. विपक्षी पार्टियों ने सरकार की आलोचना की. मशहूर लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने भी विदेश मंत्रालय के बयान को ‘बेतुका’ बता दिया. लोग सवाल करने लगे कि अगर आधार नहीं, पासपोर्ट नहीं, तो फिर पक्की नागरिकता की पहचान क्या है? अब 25 जून को केंद्र सरकार ने इस पर फिर बयान दिया है.
भारतीय नागरिक नहीं, फिर भी मिल सकता है पासपोर्ट? विदेश मंत्रालय ने पूरा नियम समझा दिया
Passport citizenship proof: विदेश मंत्रालय ने हाल ही में पासपोर्ट से जुड़ा एक बयान दिया. जिससे इंटरनेट पर बहस छिड़ गई. लोग सवाल करने के लगे कि नागरिकता का पक्का सबूत फिर क्या है. अब इस मामले पर एक सरकारी अधिकारी का बयान आया है.


हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि ये हालत नई नहीं है. न तो हाल में नागरिकता साबित करने से जुड़ी किसी नीति में कोई बदलाव किया गया है. अधिकारी ने कहा,
(पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है) यह कल तय की गई बात नहीं है. पिछले 12 सालों में नियम बदलने का कोई ऐसा फैसला नहीं लिया गया.
‘पासपोर्ट और नागरिकता’ को जोड़ने पर अधिकारी ने मौजूदा कानूनों और अदालती फैसलों का हवाला देते हुए कहा,
पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का सबूत नहीं रहा है. पासपोर्ट एक्ट 1967 कहता है कि पासपोर्ट उन लोगों को भी दिया जा सकता है जो नागरिक नहीं हैं. बॉम्बे हाईकोर्ट के 2013 के फैसलों ने भी साफ किया कि पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है.
पासपोर्ट एक्ट 1967 की धारा 6(2)(a) कहती है कि अगर आवेदन करने वाला व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है तो अधिकारियों के लिए पासपोर्ट जारी करने से मना करना जरूरी है. मगर पासपोर्ट एक्ट की धारा 20 में यह भी कहा गया है कि सरकार किसी ‘गैर-नागरिक’ को पासपोर्ट जारी कर सकती है, अगर उसे ‘जनहित’ में सही समझा जाए.
दरअसल, 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस पर विदेश मंत्रालय ने दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया. इसमें MEA ने कहा कि पासपोर्ट एक ट्रैवेल डॉक्यूमेंट है जो सरकार इशू करती है ताकि लोग विदेश यात्रा कर सकें. लेकिन केवल एक पासपोर्ट से नागरिकता तय नहीं होती.
इस बयान के बाद बवाल खड़ा हो गया. सवाल उठा कि जब भारत सरकार केवल भारतीयों को ही पासपोर्ट देती है तो फिर ये नागरिकता साबित क्यों नहीं कर सकता?
इस विवाद को और तूल मिला क्योंकि हाल ही में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान आधार कार्ड को भी नागरिकता का पक्का सबूत नहीं माना गया. बिहार SIR के दौरान इलेक्शन कमीशन ने तर्क दिया कि आधार कार्ड पहचान के लिए इस्तेमाल होता है, लेकिन इससे नागरिकता साबित नहीं होती. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस तर्क का समर्थन करते हुए कहा कि आधार को नागरिकता का आधार नहीं माना जा सकता है.
इसके बाद आम जनता से लेकर विपक्षी पार्टियां तक पूछने लगीं कि नागरिकता तय कैसे हो? जावेद अख्तर ने सवाल करते हुए लिखा,
‘पासपोर्ट केवल एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है. सच में? तो फिर आप ऐसे लोगों को पासपोर्ट दे रहे हैं जो भारतीय नागरिक है ही नहीं?’
शिवसेना (उद्धव) के नेता आदित्य ठाकरे ने कहा कि ‘अगर ऐसा है तो पुलिस जांच किस बात की करती है?’
AIMIM प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा,
हो सकता है कि सरकार यह कह रही हो कि 2030 में सिर्फ उन्हीं लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा जिनके पास BJP का मेंबरशिप कार्ड होगा.
उन्होंने तर्क दिया कि पासपोर्ट सिर्फ भारतीय नागरिक को ही दिया जाता है. पासपोर्ट एक्ट 1967 में साफ लिखा है कि पासपोर्ट किसी गैर-भारतीय नागरिक को नहीं दिया जाता. पासपोर्ट पूरी पुलिस जांच के बाद ही दिया जाता है.
सिटिजनशिप लॉ क्या कहता है?सिटिजनशिप लॉ कहता है कि अगर कोई व्यक्ति 26 जनवरी, 1950 को या उसके बाद, लेकिन 1 जुलाई, 1987 से पहले भारत में पैदा हुआ है, तो वह जन्म से भारतीय नागरिक है. जुलाई 1987 के बाद पैदा हुए लोगों के लिए, जन्म से नागरिकता तभी लागू होती है जब उनके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो.
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फिर 3 दिसंबर, 2004 को या उसके बाद पैदा हुए लोगों के लिए, जन्म से नागरिकता तभी लागू होती है जब उनके दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों. अगर माता-पिता में से कोई एक भी भारतीय नागरिक हों और दूसरा जन्म के समय अवैध अप्रवासी न हो तो भी भारत की नागरिकता मिल सकती है.
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