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कैसे दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीदार बना हथियार बेचने वाली ताकत? भारत की डिफेंस क्रांति की पूरी कहानी

India's Defence Export Boom: भारत कैसे दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक से तेजी से उभरता रक्षा निर्यातक बना? जानिए Make in India, DRDO, निजी कंपनियों और 21 हजार करोड़ रुपये के रिकॉर्ड डिफेंस एक्सपोर्ट के पीछे की पूरी कहानी.

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डिफेंस एक्सपोर्ट में भारत के बढ़ते कदम (फोटो-AI)

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  • रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वित्त वर्ष 2023-24 में भारत के रक्षा निर्यात 21 हजार करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर को पार करने की जानकारी दी, जो देश की बढ़ती सैन्य क्षमता को दर्शाता है।
  • पहले भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लगभग 70-75% हिस्से के लिए विदेशी हथियारों पर निर्भर था, परन्तु 'मेक इन इंडिया' पहल और निजी कंपनियों के योगदान से यह स्थिति बदली है।
  • भारत अब करीब 85 देशो को हथियार निर्यात कर रहा है, जिससे अर्थव्यवस्था में सुधार और रोजगार के अवसर बढ़े हैं, साथ ही रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ी है।

26 जुलाई का कारगिल विजय दिवस बीत चुका है. देश ने अपने शहीदों और वीर जवानों को सलाम किया. इसी मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक ऐसी बात कही, जिसने भारत की बदलती सैन्य ताकत की पूरी तस्वीर सामने रख दी. कभी भारत उन देशों में था, जो अपनी सुरक्षा के लिए हथियारों के आयात पर सबसे ज्यादा निर्भर थे. छोटी राइफल से लेकर बड़े रक्षा उपकरण तक, सब कुछ विदेशों से खरीदना पड़ता था. लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल बदल चुकी है. 

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अब भारत सिर्फ अपनी सीमाओं की रक्षा करने वाला देश नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों को हथियार बेचने वाली ताकत बन चुका है. रक्षा मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2023-24 में भारत का रक्षा निर्यात 21 हजार करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गया. आखिर ऐसा क्या बदला कि दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीदार अब तेजी से उभरता हथियार निर्यातक बन गया?  

डिफेंस सेक्टर में 'मेक इन इंडिया'

लेकिन सवाल है कि आखिर ये बदलाव आया कैसे? इसकी सबसे बड़ी वजह बनी 'मेक इन इंडिया' पहल और डिफेंस सेक्टर में किए गए बड़े सुधार. ‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ की रिपोर्ट कहती है कि एक समय था जब हथियार बनाने का काम लगभग पूरी तरह सरकारी ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों तक सीमित था. लाल फीताशाही, धीमी प्रक्रिया और समय पर डिलीवरी न होना इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरियां थीं. फिर सरकार ने डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का दरवाजा निजी कंपनियों के लिए खोल दिया. टाटा, लार्सन एंड टुब्रो (L&T), कल्याणी ग्रुप और कई दूसरी भारतीय कंपनियों ने इस सेक्टर में बड़े पैमाने पर निवेश किया. 

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डिफेंस एक्सपर्ट और पूर्व वायुसेना अधिकारी डॉ डी.के. पाण्डेय कहते हैं,

सिर्फ प्राइवेट सेक्ट ने ही काम नहीं किया. डीआरडीओ और सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों ने भी रिसर्च, डिजाइन और उत्पादन की रफ्तार तेज कर दी. इसका नतीजा ये हुआ कि भारत अब सिर्फ विदेशी हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहा. आज हम राफेल और सुखोई जैसे लड़ाकू विमानों की मेंटेनेंस से लेकर अत्याधुनिक मिसाइलें, तोपें, रडार और दूसरे रक्षा उपकरण भी देश में तैयार कर रहे हैं.

आंकड़ों की नजर में देश का डिफेंस एक्सपोर्ट

अब जरा उन आंकड़ों पर नजर डालिए, जो भारत की इस पूरी यात्रा को बयां करते हैं. एक दशक पहले तक भारत अपनी रक्षा जरूरतों का करीब 70 से 75 फीसदी हिस्सा विदेशों से आयात करता था. यही वजह थी कि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्टों में भारत लगातार दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक बताया जाता था. लेकिन बीते दस साल में तस्वीर तेजी से बदली है. वित्त वर्ष 2013-14 में भारत का रक्षा निर्यात महज 686 करोड़ रुपये था. आज यही आंकड़ा बढ़कर 21 हजार करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर को पार कर चुका है. यानी सिर्फ दस साल में भारत के रक्षा निर्यात में करीब 30 गुना की ऐतिहासिक छलांग लगी है. दूसरे शब्दों में कहें तो जो देश कभी अपनी सुरक्षा के लिए दुनिया पर निर्भर था, वही अब दुनिया के कई देशों की रक्षा क्षमता मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहा है.

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डिफेंस एक्सपोर्ट में भारत के बढ़ते कदम (ग्राफिक्स- AI)

इस कामयाबी के पीछे उन खास डिफेंस प्रोडक्ट्स का अहम योगदान है, जिन्हें भारत खुद अपने दम पर बनाता है. और  जिनकी डिमांड आज ग्लोबल मार्केट में तेजी से बढ़ रही है. ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल दुनिया की सबसे तेज और बेहतरीन मिसाइलों में गिनी जाती है. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रह्मोस को खरीदने में कई एशियाई और अफ्रीकी देश दिलचस्पी दिखा रहे हैं. इसके अलावा तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम, एडवांस्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS), और आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम आज ग्लोबल मंच पर भारतीय इंजीनियरिंग का लोहा मनवा रहे हैं.

भारत के हथियार भरोसेमंद हैं

दुनिया के तमाम देश आज भारतीय हथियारों पर क्यों भरोसा कर रहे हैं, इसके पीछे एक बड़ा जियोपॉलिटिकल गेम भी है. चीन की विस्तारवादी नीतियों और दक्षिण चीन सागर में उसके आक्रामक रुख से एशियाई देश डरे हुए हैं. ऐसे में फिलीपींस और वियतनाम जैसे देश एक भरोसेमंद पार्टनर की तलाश में थे. भारत ने फिलीपींस के साथ ब्रह्मोस मिसाइल का बड़ा सौदा करके यह साबित कर दिया कि वह ड्रैगन की आंख में आंख डालकर बात कर सकता है. पाकिस्तान के सामरिक दबाव और आतंकवाद से निपटने के अपने लंबे अनुभव के कारण भारतीय हथियार युद्ध-परीक्षित (combat-tested) माने जाते हैं, जो कम कीमत में बेहतरीन परफॉर्मेंस देते हैं.

भारतीय हथियारों के मुख्य खरीदार

आइए अब नजर डालते उन टॉप देशों की लिस्ट पर जो आज 'मेक इन इंडिया' हथियारों पर दांव लगा रहे हैं. भारत आज दुनिया के करीब 85 से ज्यादा देशों को डिफेंस प्रोडक्ट्स और टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट कर रहा है. ‘फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ के मुताबिक इनमें फिलीपींस, आर्मेनिया, वियतनाम, फ्रांस, आर्मेनिया, यूएसए, यूएई, इथियोपिया, सऊदी अरब और इंडोनेशिया प्रमुख हैं. आर्मेनिया ने भारत से पिनाका रॉकेट सिस्टम और आकाश मिसाइलें खरीदी हैं, जबकि फिलीपींस दुनिया का पहला देश है जिसने ब्रह्मोस मिसाइल बैटरी का सौदा भारत के साथ किया है. ये देश पश्चिमी देशों के महंगे हथियारों के विकल्प के रूप में भारतीय साजो-सामान को तरजीह दे रहे हैं.

‘इंडिया मैटर्स’ के रोहित शर्मा मानते हैं कि डिफेंस एक्सपोर्ट में इस बूम का सीधा फायदा देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़ रहा है. लल्लनटॉप से बात करते हुए रोहित भरोसा जताते हैं कि,

जब मेक इन इंडिया के तहत देश में हथियार बनेंगे, तो एमएसएमई (MSME) सेक्टर को बड़े पैमाने पर ऑर्डर्स मिलेंगे. 

रक्षा मंत्रालय की प्रेस रिलीज के मुताबिक, इस सेक्टर में हजारों नए और हाई स्किल रोजगार पैदा हो रहे हैं. उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बनाए गए डिफेंस कॉरिडोर इस दिशा में गेम-चेंजर साबित हो रहे हैं. यहां छोटी-छोटी स्थानीय फैक्ट्रियां भी बड़े डिफेंस पाट्र्स बना रही हैं, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हो रहा है और देश आत्मनिर्भरता की एक नई इबारत लिख रहा है.

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