IIT बॉम्बे. देश के उन संस्थानों में से एक, जहां पढ़ने का सपना लाखों छात्र देखते हैं. लेकिन इसी संस्थान में पढ़ रहे साहिल वाकोडे को आखिर ऐसा क्या महसूस हुआ कि उन्हें अपनी जिंदगी खत्म करने जैसा कदम उठाना पड़ा? साहिल के माता-पिता का आरोप है कि अनुसूचित जाति से होने की वजह से संस्थान में उनके साथ भेदभाव किया जाता था. उन्हें उनकी जाति की वजह से परेशान किया जाता था. हालांकि इन आरोपों की जांच अभी चल रही है.
IIT बॉम्बे की फैकल्टी में आरक्षित वर्ग के सिर्फ 11% शिक्षक, इसी में EWS भी शामिल
IIT बॉम्बे में 775 शिक्षकों में SC, ST, OBC और EWS वर्गों के सिर्फ 84 शिक्षक हैं, यानी कुल फैकल्टी में इनकी हिस्सेदारी करीब 11% है. साहिल वाकोड़े की मौत के बाद संस्थान में जातिगत भेदभाव के आरोपों के बीच फैकल्टी में आरक्षित वर्गों के कम प्रतिनिधित्व को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.

लेकिन साहिल की मौत ने एक पुराना और असहज सवाल फिर सामने ला दिया है. कि क्या देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में से एक में आज भी छात्रों को उनकी जाति की वजह से भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है?
अगर ऐसा होता है तो संस्थान में बने एससी-एसटी सेल जैसी कमेटियां क्या कर रही होती हैं? सवाल ये भी उठता है कि इन कमेटियों में वंचित समुदायों के कितने लोग होते हैं? सवालों का ये सिलसिला यहां जाकर रुकता है कि संस्थानों के फैकल्टी में ही कितने स्टाफ ऐसे हैं, जो आरक्षित वर्ग से आते हैं और जब इस सवाल का जवाब मिलता है तो टेंशन थोड़ी बढ़ जाती है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक रिसर्च स्कॉलर ने सूचना का अधिकार (RTI) के जरिए सितंबर 2026 की शुरुआत में यही सवाल पूछा था कि आईआईटी बॉम्बे की फैकल्टी में आरक्षित वर्ग के कितने लोग हैं. जवाब मिला- सिर्फ 84 लोग.
IIT बॉम्बे में फिलहाल टीचिंग स्टाफ के कुल 1225 पद हैं. इनमें से 775 पद भरे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इन भरे हुए पदों में आरक्षित वर्गों के सिर्फ 84 टीचर हैं. यानी वंचित समुदाय से आने वाले सिर्फ 11 फीसदी लोग ही IIT बॉम्बे की फैकल्टी में जगह पा सके हैं. इनमें भी SC-ST, OBC के अलावा EWS के लोग भी शामिल हैं. और ये सब तब है जब संस्थान में टीचिंग स्टाफ के 450 पद अभी खाली ही हैं.
ऑल इंडिया OBC स्टूडेंट्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष गौड़ किरण कुमार RTI एक्टिविस्ट भी हैं. एक अकादमिक रिसर्च के लिए उन्होंने RTI आरटीआई दाखिल की थी, जिसमें ये सारे खुलासे हुए. TOI ने बताया कि उसने IIT बॉम्बे से इस बारे में सवाल किया था, लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया.
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रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिवर्सिटीज या आईआईटीज में असिस्टेंट प्रोफेसर लेवल के पदों पर आरक्षित वर्गों की हिस्सेदारी प्रोफेसर लेवल के पदों के मुकाबले ज्यादा है और ये सिर्फ आईआईटी बॉम्बे की बात नहीं है. देश के कई दूसरे सरकारी तकनीकी संस्थानों में भी यही हाल है. छात्र संगठनों का मानना है कि फैकल्टी में आरक्षित वर्ग के लोगों की संख्या इतनी कम होने का असर इन समुदायों से आने वाले छात्रों को मिलने वाली मेंटरशिप और मदद पर भी पड़ सकता है.
गौड़ किरण कुमार ने इसे लेकर सवाल उठाया कि जब IIT, NIT और अन्य संस्थानों से वंचित समुदायों के सैकड़ों पीएचडी करने वाले छात्र निकल रहे हैं, तो संस्थानों को उन्हें नौकरी देने से कौन रोक रहा है? उन्होंने आगे कहा कि देश की तकरीबन सभी यूनिवर्सिटी या सरकारी संस्थानों में ‘एससी-एसटी सेल’, ‘इक्वल अपॉर्च्युनिटी सेल’ जैसे सिस्टम होते हैं. यूनिवर्सिटीज में एकैडमिक काउंसिल और एग्जीक्यूटिव काउंसिल होती हैं. IIT के लिए IIT काउंसिल भी होती है लेकिन प्रोफेसर के लेवल पर वंचित समुदायों के बहुत कम लोग हैं. ऐसे में वो इन फैसले लेने वाली संस्थाओं का हिस्सा भी नहीं बन पाते. किरण का मानना है कि भेदभाव रोकना है तो इन काउंसिलों में समाज के हर वर्गों का प्रतिनिधित्व होना जरूरी है.
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