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महाराष्ट्र: हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के लिए 32000 पेड़ कटेंगे, 150 आदिवासी बिना मुआवजे के होंगे बेघर

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में 3,000 मेगावाट का हाइड्रोपावर प्लांट बनाने के लिए 32 हजार से ज्यादा पेड़ काटे जाने हैं. पेड़ों की कटाई दशहरे की सुबह शुरू हुई थी. इस जंगल के आसपास 150 आदिवासी परिवार रहते हैं. इन परिवारों का पूरा जीवन इस जंगल से जुड़ा है.

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महाराष्ट्र में 32 हजार पेड़ काटने की तैयारी. (Courtesy- ITG/Torrent Power)

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में पड़ने वाले एक जंगल के तकरीबन 1,100 पेड़ काट दिए गए. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इनके तने अब भी जंगल में ढेर लगे पड़े हैं और उन पर पहरा बिठा दिया गया है. गांव के लोगों को इन पेड़ों की लकड़ियां उठाने तक नहीं दी जा रही हैं. जबकि वे पीढ़ियों से इसी जंगल से लकड़ियां इकट्ठा करके अपना घर चलाते आए हैं.

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प्रोजेक्ट क्या है?

यहां टोरेंट पावर 3,000 मेगावाट का हाइड्रोपावर प्लांट बना रही है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पर करीब 13,505 करोड़ रुपये खर्च होंगे और इसे 2029 तक चालू करने का टारगेट रखा गया है. इसके लिए 377 हेक्टेयर ज़मीन चाहिए, जिसमें 32 हज़ार से ज़्यादा पेड़ कटने हैं. इसमें 233 हेक्टेयर वन विभाग की ज़मीन है और 144 हेक्टेयर वहां की बस्तियों के भीतर आती है.

पेड़ों की कटाई दशहरे की सुबह शुरू हुई थी. गांव वालों के विरोध के बाद विपक्षी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता कर्जत पहुंचे. पिछले हफ्ते कटाई रोक दी गई. कर्जत के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर समीर शिंदे के मुताबिक, गांव में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कटाई अस्थायी रूप से रोकी गई है. दोबारा कब शुरू होगी, इस पर अभी फैसला नहीं हुआ.

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जंगल से ही चलता है परिवारों का गुजारा

इस जंगल के आसपास छह छोटी बस्तियां हैं. इनमें करीब 150 परिवार रहते हैं. इनमें ज्यादातर कटकरी आदिवासी समुदाय के लोग हैं. ये लोग पीढ़ियों से जंगल पर निर्भर हैं. ये लोग रोज़ जंगल से जलाऊ लकड़ी जमा करके बाज़ार में बेचते हैं. जिससे दिन के 150 से 200 रुपये की कमाई हो जाती हैं. गांव में मिलने वाला शहद, महुआ, जामुन और अमरूद भी बेचते हैं और खाने के लिए इस्तेमाल भी करते हैं. जंगल उनके लिए महज़ कमाई का जरिया नहीं है. यह उनके लिए इलाज करने की जगह भी है. नीम, गिलोय और अडूसा जैसी जड़ी-बूटियां बुखार, सांस की बीमारी, दांत की समस्या और घावों में काम आती हैं. जंगल में जाने पर रोक लगने से अब कमाई और रोज़मर्रा की ज़िंदगी, दोनों पर असर पड़ रहा है. 72 साल के नाना बरकू समुदाय के नेता हैं. उन्होंने अखबार से बात करते हुए कहा कि,

‘जैसे शहर में रहने वाले को जंगल में रहना मुश्किल लग सकता है, वैसे ही हमारे जैसे आदिवासी जंगल के बिना नहीं रह सकते. अगर जंगल गया, तो हमारे जीने का तरीका भी खत्म हो जाएगा.’

आदिवासी परिवारों को नहीं मिलेगा मुआवजा 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जंगल पर निर्भर इन परिवारों का सरकारी रिकॉर्ड में ज़िक्र ही नहीं है. वन अधिकार कानून, 2006 के तहत, जो लोग जंगल से कई पीढ़ियों से सामान इकट्ठा करते हैं, उन्हें ही उस जमीन पर अपना अधिकार मांगने का हक है.

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इस कानून की धारा 6 के तहत ये प्रोसेस ग्राम सभा से शुरू होती है. सभा इन परिवारों की जानकारी जुटाती है, उनकी जांच करती है और अपने प्रस्ताव उप-मंडल स्तरीय समिति को भेजती है. यही सरकारी समिति इन दावों पर फैसला करती है. कानून के मुताबिक, जब तक ये अधिकार तय न हो जाएं, वन भूमि किसी प्रोजेक्ट को नहीं सौंपी जानी चाहिए.

रिपोर्ट में वन विभाग के अधिकारियों हवाले से बताया गया है कि पाली की ग्राम सभा ने ऐसा कोई रिकॉर्ड जमा ही नहीं किया. विभाग के पास कोई रिकॉर्ड नहीं था. इसलिए उसने ज़मीन प्रोजेक्ट के लिए मंज़ूर कर दी. केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की पर्यावरण मंज़ूरी में भी लिखा है कि इस प्रोजेक्ट में किसी परिवार या गांव को दूसरी जगह बसाने की ज़रूरत नहीं होगी. नतीजा ये कि करीब 150 परिवार कानूनन मिल सकने वाले मुआवज़े की लिस्ट से बाहर हो गए.

रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर समीर शिंदे का कहना है कि, पिछले 18 महीनों में कई सार्वजनिक सुनवाइयां हुईं, जिनमें 400 से ज़्यादा लोग आए. कई लोगों ने कहा कि वे जंगल पर निर्भर हैं. विभाग ने ग्राम सभा से इसका लिखित रिकॉर्ड देने को कहा, लेकिन रिकॉर्ड कभी नहीं मिला. 

पर्यावरण पर असर 

2010 में बने गाडगिल पैनल ने पश्चिमी घाट को बचाने के लिए इलाके बांटे थे. उसकी 2011 की रिपोर्ट ने पाली को ESZ 1 में रखा, यानी सबसे ज़्यादा संरक्षण वाला क्षेत्र. यहां पैनल ने नए बड़े बांध, खनन या बड़े इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स नहीं बनाने की सिफ़ारिश की थी. लेकिन उसकी सिफ़ारिशें कभी लागू नहीं हुईं. प्रोजेक्ट की पर्यावरण मंज़ूरी रिपोर्ट में पूरे अध्ययन क्षेत्र में 26 ऐसी प्रजातियों का ज़िक्र है, जिन्हें वन्यजीव संरक्षण कानून की अनुसूची-1 में सर्वोच्च सुरक्षा मिली है. इनमें तेंदुआ, भालू, सांभर, अजगर और कई पक्षी हैं.

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सरकार और कंपनी का तर्क

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का कहना है कि प्लांट समय की ज़रूरत है, क्योंकि इससे राज्य की कोयले से बनी बिजली पर निर्भरता घटेगी. NITI आयोग के डैशबोर्ड के मुताबिक, महाराष्ट्र की करीब 74 फीसदी बिजली कोयले से आती है. ये प्लांट पानी की मदद से बिजली बनाएगा. इसमें पहाड़ी के ऊपर और नीचे दो बड़े जलाशय बनाए जाएंगे. जब बिजली की मांग कम होगी, तब पानी को नीचे से ऊपर भेजा जाएगा. जब बिजली की जरूरत ज्यादा होगी, तब ऊपर से पानी छोड़ा जाएगा. ये पानी टरबाइन घुमाएगा और बिजली बनेगी.

टोरेंट कंपनी का कहना है कि आदिवासी परिवारों के लिए 50 बिस्तरों वाला अस्पताल, स्कूल और ट्रेनिंग सेंटर भी बनाएगी. निर्माण के दौरान करीब 2,000 लोगों को रोजगार देने का दावा भी किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, पेड़ों की भरपाई के लिए कंपनी ने प्रोजेक्ट साइट से करीब 200 किमी दूर, सतारा जिले में 253 हेक्टेयर ज़मीन वन विभाग को सौंपी है. वहां करीब  70,000 पेड़ पहले से हैं, और वन विभाग 30,000 और लगाएगा. 

कंपनी का दावा है कि इसका फायदा नुकसान की तुलना से करीब 3,000 गुना ज़्यादा है. फिलहाल गांव वालों के विरोध के बाद पेड़ काटने का काम रोक दिया गया है. लेकिन यह रोक अस्थायी है. सवाल यही है कि बिजली बनाने की इस योजना में जंगल पर निर्भर रहने वाले परिवारों और वहां रहने वाले जानवरों का भविष्य क्या होगा?

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