नेपाल में आई भीषण बाढ़ के संकट के बीच भारत में एक परियोजना को लेकर पर्यावरणविदों चिंता जता रहे हैं. हिमाचल प्रदेश में चेनाब को ब्यास नदी से जोड़ने की 2352 करोड़ रुपये की लागत वाली परियोजना का विरोध तेज होने लगा है.
'ये तो वॉटर बम है', लाहौल स्पीति की इस जल परियोजना से एक्सपर्ट के हाथ-पांव क्यों फूले?
लाहौल-स्पीति में चंद्रा नदी पर 19 मीटर ऊंचा बैराज और पीर पंजाल के नीचे 8.7 किमी लंबी सुरंग बनाने की योजना है, जिसका स्थानीय लोग और पर्यावरणविद विरोध कर रहे हैं.

इस प्रोजेक्ट के तहत हिमाचल की चंद्रा नदी पर कोकसर के पास करीब 19 मीटर ऊंचा कंक्रीट का बैराज बनाने की योजना है. साथ ही पीर पंजाल पहाड़ियों के नीचे से तकरीबन साढ़े 8 किलोमीटर की सुरंग भी खोदी जानी है. इसके जरिए ही नदी के पानी को ब्यास नदी में मिलाया जाएगा. पर्यावरण के जानकारों और स्थानीय लोगों का कहना है कि ये पूरी परियोजना ही ‘वॉटर बम’ है. इसकी वजह से पूरा इलाका हमेशा भयंकर बाढ़ की आशंका के मुहाने पर रहेगा.
प्रोजेक्ट के लिए जिस कोकसर जगह को चुना गया है, वो प्रोजेक्ट की सबसे ज्यादा चिंता में डालने वाली बात बताई गई है. पर्यावरणविद कह रहे हैं कि बैराज या फिर सुरंग बनाने के लिए इससे खराब जगह शायद ही कोई और हो सकती है.
भारत सरकार की संस्था नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) हिमाचल के लाहौल स्पीति में चिनाब और ब्यास नदी को जोड़ने पर काम कर रही है. चिनाब-ब्यास लिंक हाइड्रो प्रोजेक्ट नाम के इस प्लान की लागत 2352 करोड़ की बताई जा रही है. इसके तहत लाहौल स्पीति के कोकसर गांव के पास चंद्रा नदी पर करीब 19 मीटर ऊंचा कंक्रीट का बैराज बनाया जाएगा. इसके अलावा पीर पंजाल की पहाड़ियों के नीचे से 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाई जाएगी. इस सुरंग के जरिए चंद्रा नदी का पानी ऊपरी ब्यास नदी के इलाके में पहुंचाया जाएगा. प्रोजेक्ट के हिसाब से चंद्रा नदी के पानी को धुंधी, पलचान या सोलंग गांवों के आसपास ब्यास नदी में छोड़े जाने की योजना है.
इस प्रोजेक्ट का मकसद ब्यास नदी के पानी में जल प्रवाह को बढ़ाना और हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोडक्शन को सपोर्ट करना है. बताया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट की वजह से आगे बने पावर प्रोजेक्ट्स में बिजली प्रोडक्शन की क्षमता 4,000 मेगावाट तक बढ़ सकती है.
आंदोलन की चेतावनीलेकिन ये काम इतना आसान नहीं है. पर्यावरण के जानकार और कई स्थानीय लोग लाहौल स्पीति में ऐसा कोई प्रोजेक्ट नहीं चाहते. उन्होंने आंदोलन तक की चेतावनी दे डाली है.
उनका कहना है कि चंद्रा और ब्यास दोनों ही नदी घाटी के लिए ये प्रोजेक्ट ठीक नहीं है, बल्कि ‘खतरे की घंटी’ है. यह हिमालय का वो इलाका है, जहां ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली बाढ़, फ्लैश फ्लड और लैंडस्लाइड के खतरे इन दिनों बढ़े हैं.
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में जाने-माने हाइड्रोलॉजिस्ट हिमांशु ठक्कर ने कहा कि ब्यास नदी का ये इलाका पहले ही बार-बार आने वाली बाढ़ और कई सारे बांधों के जबाव से जूझ रहा है. उस पर भी सुरंग और बैराज के लिए जो जगह (कोकसर) चुनी गई है, वह तो इस प्रोजेक्ट के लिए सबसे खराब जगहों में से एक है.
रिपोर्ट के मुताबिक, कोकसर का इलाका चंद्रा नदी के ऊपरी हिस्से में है. यहां ग्लेशियर से बनी कई झीलें हैं. हिमाचल प्रदेश का सबसे बड़ा ग्लेशियर बारा शिगरी भी इसी इलाके में है. इन झीलों के फटने से अचानक बड़ी बाढ़ आ सकती है.
कमजोर पहाड़ों पर बढ़ेगा दबावपर्यावरण के लिए काम करने वालों का कहना है कि बैराज बनाने से पहाड़ों में ब्लास्टिंग की जाएगी. सुरंग की खुदाई के बाद मलबा हटाने जैसे काम भी होंगे. इससे पहले से ही कमजोर पहाड़ी इलाके पर दबाव और बढ़ेगा. पर्यावरणविद गुमान सिंह का कहना है कि ये प्रोजेक्ट 'वॉटर बम' है. इससे ब्यास में पानी का बहाव बहुत तेज हो जाएगा. इसके बाद पूरी ब्यास नदी घाटी हमेशा ही बाढ़ के खतरे वाले इलाके में बदल सकती है.
इस प्रोजेक्ट के तहत चंद्रा नदी का पानी सुरंग के जरिए ब्यास नदी में छोड़ा जाना है. धुंधी, पलचान और सोलंग के आसपास ये काम किया जाएगा. पर्यावरण एक्टिविस्ट्स का कहना है कि यह भी सेफ नहीं है. धुंधी, पलचान और सोलंग पहले से ही फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और हिमस्खलन की चपेट में आता रहा है. 2024 में बादल फटने और अचानक आई बाढ़ से पलचान पुल को नुकसान पहुंचा था और लेह-मनाली हाईवे का संपर्क टूट गया था.
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सिर्फ बैराज-सुरंग का मामला नहींपरियोजना का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि यह सिर्फ एक बैराज और सुरंग बनाने का मामला नहीं है. यह देखना भी जरूरी है कि पूरे ब्यास-सतलुज रिवर सिस्टम में और ज्यादा पानी संभालने की क्षमता कितनी बची है. पूरे नदी बेसिन पर इसका क्या असर पड़ेगा? नदियों और नीचे रहने वाले लोगों पर इसका क्या प्रभाव होगा. ये सभी चीजें देखकर ही फैसला लिया जाना चाहिए.
उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रोजेक्ट के बारे में पहले से लोगों को सार्वजनिक तौर पर जानकारी नहीं दी गई. इस प्रोजेक्ट के पास अभी जरूरी मंजूरियां भी नहीं हैं. ग्राम सभाओं से भी जरूरी प्रस्ताव नहीं लिए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक लाहौल-स्पीति के रहने वाले लोगों का कहना है कि सरकार नदियों को उनके हाल पर छोड़ दे. यहां कोई भी इस तरह का प्रोजेक्ट नहीं चाहता. अगर जरूरत पड़ी तो वे इसके खिलाफ आंदोलन करने के लिए भी तैयार हैं.
बता दें कि ये मामला ऐसे समय में आया है, जब नेपाल में फ्लैश फ्लड की भयंकर तबाही ने दुनिया भर को चिंता में डाल दिया. इस हादसे में हजारों लोगों की जानें गईं. इसने ग्लोबल वार्मिंग से जुड़े पर्यावरण के संकट के बारे में लोगों ने एक बार फिर से सोचने पर मजबूर किया है.
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