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राम रहीम 17वीं जेल से बाहर: अब तक 12 पैरोल और 5 फरलो, कैदियों को कितनी बार मिल सकती है 'छुट्टी'

Gurmeet Ram Rahim: गुरमीत राम रहीम 25 अगस्त 2026 को 21 दिन की फरलो पर जेल से बाहर आया. ये उसकी 17वीं अस्थायी रिहाई है. जानिए अब तक उसे कितनी बार पैरोल और फरलो मिली, दोनों में क्या फर्क है और हरियाणा के कानून में सजायाफ्ता कैदियों के लिए क्या नियम हैं.

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पैरोल, फरलो और छुट्टी का पूरा खेल (फोटो- PTI)

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  • गुरमीत राम रहीम सिंह को 25 अगस्त 2026 को रोहतक की सुनारिया जेल से 21 दिन की फरलो मिली, जो उनकी 17वीं अस्थायी रिहाई है, और इस दौरान वे डेरा सच्चा सौदा के सिरसा मुख्यालय में रहेंगे।
  • राम रहीम को फरलो मिलने का कारण हरियाणा के अच्छे आचरण वाले कैदियों के लिए बनाए गए 2022 के अधिनियम के तहत उनकी पात्रता है, जिसमें फरलो और पैरोल की अलग-अलग कानूनी शर्तें निर्धारित हैं।
  • इस फरलो से राम रहीम को कम अवधि के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति मिली है, जो उनकी रिहाई की कानूनी प्रक्रिया और पात्रता के आधार पर होती है, और इस दौरान वे डेरा परिसर में रहेंगे।

गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर जेल से बाहर है. मंगलवार, 25 अगस्त 2026 को रोहतक की सुनारिया जेल से उसे 21 दिन की फरलो मिली. इसके साथ ही 2017 में सजा होने के बाद ये उसकी 17वीं अस्थायी रिहाई है. इस बार राम रहीम को फरलो मिली है, पैरोल नहीं. वो इस अवधि में डेरा सच्चा सौदा के सिरसा मुख्यालय में रहेगा.

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राम रहीम को अगस्त 2017 में दो महिला अनुयायियों से रेप के मामले में 20 साल की सजा सुनाई गई थी. इसके अलावा पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में उसे उम्रकैद की सजा भी मिली थी. हालांकि 2002 में डेरा मैनेजर रणजीत सिंह की हत्या के मामले में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 2024 में उसे बरी कर दिया था.

अब तक कब-कब बाहर आया राम रहीम?

राम रहीम की अस्थायी रिहाइयों का सिलसिला अक्टूबर 2020 में शुरू हुआ. ‘इंडिया टुडे’ की रिपोर्ट के मुताबिक 24 अक्टूबर 2020 को उसे बीमार मां से मिलने के लिए एक दिन की पैरोल मिली. 21 मई 2021 को फिर 12 घंटे के लिए पैरोल दी गई. इसके बाद 7 फरवरी 2022 को 21 दिन की फरलो मिली.

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फिर जून 2022 में 30 दिन की पैरोल, अक्टूबर 2022 में 40 दिन की पैरोल और जनवरी 2023 में 40 दिन की पैरोल मिली. जुलाई 2023 में 30 दिन की पैरोल और नवंबर 2023 में 21 दिन की फरलो दी गई. जनवरी 2024 में 50 दिन की पैरोल, अगस्त 2024 में 21 दिन की फरलो और अक्टूबर 2024 में 20 दिन की पैरोल मिली.

2025 में 28 जनवरी को 30 दिन की पैरोल, 9 अप्रैल को 21 दिन की फरलो और 5 अगस्त को 40 दिन की पैरोल मिली. 2026 में 5 जनवरी को 40 दिन की पैरोल और 26 मई को 30 दिन की पैरोल मिली. अब 25 अगस्त 2026 को 21 दिन की फरलो के साथ आंकड़ा 17 तक पहुंच गया है.

इस हिसाब से 17 अस्थायी रिहाइयों में 12 बार पैरोल और 5 बार फरलो शामिल हैं. आम बोलचाल में इन सभी को जेल से मिली "छुट्टी" कहा जाता है, लेकिन कानून की नजर में पैरोल और फरलो अलग व्यवस्थाएं हैं.

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पैरोल और फरलो में सबसे बड़ा फर्क क्या है?

हरियाणा में मौजूदा व्यवस्था "हरियाणा के अच्छे आचरण वाले कैदियों की (अस्थायी रिहाई) अधिनियम, 2022" (Haryana Good Conduct Prisoners (Temporary Release) Act, 2022) के तहत चलती है. कानून में नियमित पैरोल और फरलो के लिए अलग प्रावधान हैं.

नियमित पैरोल का मकसद खास परिस्थितियों में कैदी को अस्थायी रूप से जेल से बाहर जाने की अनुमति देना है. 2022 के कानून के मुताबिक पात्र कैदी को एक कैलेंडर वर्ष में कुल 10 हफ्ते यानी 70 दिन तक नियमित पैरोल मिल सकती है और इसे दो हिस्सों में लिया जा सकता है. सजा शुरू होने के बाद सामान्य तौर पर एक साल पूरा किए बिना नियमित पैरोल के लिए पात्रता नहीं बनती.

फरलो की प्रकृति अलग है. मौजूदा कानून में सामान्य तौर पर फरलो की अवधि 3 हफ्ते यानी 21 दिन है और इसे टुकड़ों में नहीं लिया जा सकता. अगर किसी टर्म सेंटेंस वाले कैदी ने अपनी कुल सजा का तीन-चौथाई हिस्सा पूरा कर लिया है, तो फरलो की अवधि 4 हफ्ते हो सकती है. उम्रकैद वाले कैदी के लिए 10 साल की सजा पूरी करने की शर्त भी दी गई है. तीन साल की सजा पूरी किए बिना सामान्य तौर पर फरलो की पात्रता नहीं बनती.

क्या हर सजायाफ्ता कैदी को पैरोल या फरलो मिल सकती है?

नहीं. ये कोई अपने आप मिलने वाला अधिकार नहीं है कि कैदी जब चाहे जेल से बाहर चला जाए. आवेदन, पात्रता, कैदी का आचरण, पुलिस रिपोर्ट, जिला प्रशासन की सिफारिश और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी जैसे पहलू देखे जाते हैं. जेल में नियम तोड़ने या अस्थायी रिहाई की शर्तों का उल्लंघन करने पर भी पात्रता प्रभावित हो सकती है. कानून में कुछ गंभीर अपराधों और परिस्थितियों वाले कैदियों के लिए फरलो पर विशेष प्रतिबंध भी हैं.

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इसके अलावा इमरजेंसी पैरोल भी अलग व्यवस्था है. परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु या गंभीर बीमारी जैसी परिस्थितियों में इसे दिया जा सकता है और कानून में इसकी कुल अवधि एक कैलेंडर वर्ष में अधिकतम 4 हफ्ते रखी गई है. वहीं "कस्टडी पैरोल" ऐसी स्थिति है जिसमें कैदी को पुलिस या जेल कर्मियों की निगरानी में किसी विशेष मौके, जैसे परिवार के सदस्य के अंतिम संस्कार, के लिए ले जाया जा सकता है.

इसलिए राम रहीम के मामले को समझने का सीधा तरीका ये है: 17 बार बाहर आना एक कुल आंकड़ा है, जबकि पैरोल और फरलो की अपनी अलग कानूनी शर्तें और अवधि हैं. हर कैदी को साल में मनमानी संख्या में छुट्टी मिल सकती है, ऐसा कानून नहीं कहता. असली सवाल हर बार पात्रता, अवधि और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी का होता है.

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