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'हम आ गए हैं, विधर्मी और मुसलमान खुद बाहर निकल जाएं', गुजरात के गरबों में ये क्या हो रहा?

UNESCO ने 2023 में गरबा को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का दर्जा देते हुए इसे विविधता में एकता और सामाजिक समानता बढ़ाने वाला उत्सव बताया था. लेकिन इस नवरात्र गुजरात में कई जगहों पर मुस्लिमों को गरबा कार्यक्रमों से बाहर करने, उनकी पहचान पर सवाल उठाने और आयोजनों में उनके शामिल होने का विरोध करने की घटनाएं सामने आई हैं.

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गरबा को लेकर इस साल कई विवाद सामने आए हैं. (फोटो- India Today)

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  • यूनेस्को ने 2023 में गुजरात के गरबा उत्सव को ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ का दर्जा दिया था, जिसमें विविधता में एकता को बढ़ावा देने वाले सामूहिक उत्सव के रूप में मान्यता मिली।
  • नवरात्रि के दौरान कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों ने मुसलमानों को गरबा कार्यक्रमों से बाहर निकालने और विवादित व्यवहार करने की घटनाओं को अंजाम दिया, जिससे त्योहार की एकता पर सवाल उठा।
  • इन घटनाओं के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ जांच शुरू की और कुछ संगठनों के सदस्यों को हिरासत में भी लिया गया, जिससे आगामी त्योहारों के सुरक्षा और समावेशिता को लेकर चर्चा बढ़ी।

संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की सांस्कृतिक संस्था है ‘UNESCO’. साल 2023 में इसकी अंतर-सरकारी समिति ने गुजरात के प्रसिद्ध उत्सव गरबा को ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ का दर्जा दिया था. यूनेस्को ने कहा था कि गरबा एक सामूहिक उत्सव है, जिसके जरिए ‘विविधता में एकता’ को बढ़ावा मिलता है. यह अलग-अलग जाति, लिंग और धर्म के लोगों को एक साथ लाता है. इससे सामाजिक समानता बढ़ती है. इसमें हाशिये पर रहने वाले सामाजिक समूहों के लोग भी हिस्सा लेते हैं, जिससे लोगों का आपसी जुड़ाव मजबूत होता है और मजबूत रिश्ते बनते हैं. 

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लेकिन गरबा को लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्था के ऐसे विचारों को पलीता कौन लगा रहा है? दरअसल नवरात्र में इस साल कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जो गरबा की विविधता में एकता वाली पहचान पर हमला करती दिखती हैं. कई जगहों पर हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े लोगों ने एक खास समुदाय के लोगों को गरबा में शामिल होने पर टारगेट किया है. मुस्लिमों को खुले तौर पर गरबा कार्यक्रमों से निकाले जाने की घटनाएं सामने आई हैं. कई मामलों में उनके साथ बदसलूकी भी की गई. 

‘विधर्मी मैदान छोड़कर चले जाएं’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में मशहूर लोक गायक आदित्य गढ़वी का 14 अक्टूबर को ‘रंग मोरलो’ नाम का एक कार्यक्रम था. कोक स्टूडियो में अपने ‘खलासी’ गाने से मशहूर हुए गढ़वी को सुनने के लिए भारी संख्या में लोग आए थे. इसी दौरान मंच से ऐंकर ने घोषणा की कि जो लोग ‘विधर्मी’ यानी दूसरे धर्म के हैं या मुसलमान हैं, वो अपनी मर्जी से कार्यक्रम छोड़कर चले जाएं. ऐंकर ने आगे कहा कि विश्व हिंदू परिषद यहां हिंदुओं की सुरक्षा के लिए आई है. इस घटना ने तूल पकड़ लिया. विवाद बढ़ा तो न सिर्फ आदित्य गढ़वी ने बल्कि ऐंकर आकाश त्रिवेदी ने भी इस विवादित ऐलान से अपने आपको अलग कर लिया.

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गढ़वी ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट करके कहा कि उनके नाम पर बहुत कुछ कहा जा रहा है, लेकिन मुसलमानों को जाने के लिए कहने वाली घोषणा से पहले न तो उनसे और न ही ऐंकर से इस बारे में सलाह ली गई थी. उन्होंने दावा किया कि कुछ लोगों ने बैकस्टेज पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद उन लोगों ने जो किया, ऐसा काम वो कभी नहीं करेंगे.

हालांकि, ये ऐसी अकेली घटना नहीं है. 

गरबा जैसे सांस्कृतिक आयोजनों में धार्मिक आधार पर लोगों के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है. एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद (VHP) जैसे हिंदुत्ववादी संगठन पुलिस को ज्ञापन देकर मांग कर रहे हैं कि नवरात्र के आयोजनों में ‘गैर-हिंदुओं’ को एंट्री न मिले. कई जगहों पर कानून हाथ में लेकर वो ये काम खुद कर रहे हैं.

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वडोदरा की 16 अक्टूबर की एक घटना है. गरबा के प्रोग्राम में रज्जाक पठान एंट्री पास की जांच कर रहे थे. इसी दौरान वीएचपी के लोग उनके पास पहुंच गए. आरोप लगाया कि इवेंट कराने वाली टीम ने उन्हें जो आई कार्ड दिया है, उस पर आयुष पटेल नाम लिखा है. वीएचपी के लोगों ने रज्जाक को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया. दोनों पक्षों में खूब बहस भी हुई, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर लोगों ने शेयर भी किए. अब पुलिस वीएचपी के आरोपों के आधार पर रज्जाक की जांच कर रही है.  

सूरत के किरण मेडिकल कॉलेज में गरबा प्रोग्राम का एक वीडियो खूब वायरल हुआ. इसमें विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं की कॉलेज के स्टाफ से तीखी बहस हुई. वीएचपी ने कार्यक्रम में मुस्लिम समुदाय के लोगों की मौजूदगी पर सवाल उठाए. उन्हें बताया गया कि संस्थान में अलग-अलग धर्मों के लोग काम करते हैं. प्रोग्राम में सिर्फ संस्थान के लोग ही शामिल थे. बहस आगे बढ़ी तो पुलिस ने वीएचपी के लोगों से कहा कि कार्यक्रम में अगर उन्हें कोई व्यक्ति किसी को परेशान करता दिखे तो वो पुलिस को बताएं. इसके बाद ही वीएचपी के लोग वहां से हटे. 

सूरत में ही रसलोक नवरात्र प्रोग्राम कराने वाले हर्षल मिस्त्री और उनके भाई मिमेश ने तो पहले ही ऐलान कर दिया कि वो अपने कार्यक्रम में मुसलमानों को घुसने नहीं देंगे.

गुजरात के ही भावनगर के वरतेज इलाके में हिंदुत्ववादी संगठन के लोग डांडिया कार्यक्रम में गाना बजाने वाले मुस्लिम म्यूजिशियन्स के एक ग्रुप को काम पर रखने का विरोध किया. ये मामला इतना ज्यादा बढ़ गया कि पुलिस को अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद (AHP) और दूसरे संगठनों के 40 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लेना पड़ा. 

ये संगठन गरबा के दौरान अपनी ऐसी कार्रवाईयों का गर्व से प्रचार भी करते हैं. जैसे बजरंग दल ने अपने X अकाउंट पर दावा किया कि उसने अहमदाबाद के वटवा इलाके में ‘हिंदू जैसे नाम’ रखकर गरबा में आने वाले दो मुस्लिम लड़कों को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया. इसके अलावा, अहमदाबाद में ही पांच लोगों और मणिनगर में दो ऐसे लोगों को पुलिस को सौंपने का दावा किया.

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कुल मिलाकर, गरबा जैसे सांस्कृतिक आयोजनों में एक ‘अघोषित’ सा नियम लागू कराने की कोशिश की जा रही है, जो इस त्योहार की मूल सद्भावना के खिलाफ है. जिसमें सांप्रदायिकता का असर है और जो सामाजिक सौहार्द को काफी नुकसान पहुंचाती है.

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