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30 साल तक मां-बेटी में जमीन को लेकर जंग, कोर्ट ने फैसले में कहा, 'पुरखों की जमीन ऐसे...'

एक ज़मीन को लेकर बेटी और सौतेली मां का विवाद मद्रास हाई कोर्ट पहुंच गया. अदालत ने पुरखों की जमीन के दावे को खारिज करते हुए माना कि यह लैंड महिला को तोहफे में दी गई है. कोर्ट ने बेटी के दावे को खारिज कर दिया.

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मद्रास हाई कोर्ट में एक ज़मीन विवाद को लेकर सुनवाई हुई. (courtesy: AI-Enhanced)

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  • मद्रास हाई कोर्ट ने 8 सितंबर 2026 को एक बेटी की 2.5 एकड़ जमीन में हिस्सेदारी की मांग खारिज कर दी, क्योंकि जमीन उसके पिता और दादी ने सौतेली मां को गिफ्ट की थी।
  • यह विवाद 1953 की वसीयत और 1975 में हुए गिफ्ट सेटलमेंट डीड के कारण उठा, जिसमें जमीन पिता की दूसरी पत्नी को ट्रांसफर की गई, जिससे पहली बेटी ने आपत्ति जताई।
  • कोर्ट ने हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के सेक्शन 14(2) को मान्यता देते हुए कहा कि जमीन का ट्रांसफर और बिक्री दोनों कानूनन वैध थे, और सेटलमेंट डीड ने मालिकाना हक साबित किया।

ज़मीन का विवाद कई परिवारों के लिए सरदर्द बन जाता है. कई दफा ‘ये हमारे पुरखों की ज़मीन है’ बनाम ‘ये हमने कमाई है’ का दावा कोर्ट-कचहरी तक पहुंच जाता है. मद्रास हाई कोर्ट में ऐसे ही एक केस की सुनवाई हुई. एक बेटी ने प्रॉपर्टी में अपना हिस्सा मांगा. यह प्रॉपर्टी उसके पिता और दादी ने उसकी सौतेली मां को तोहफे में दी थी. मद्रास हाई कोर्ट ने बेटी की मांग ठुकरा दी है. 

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टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ये पूरा मामला 2.5 एकड़ की ज़मीन विवाद से जुड़ा है.

पूरी कहानी क्या है?

कहानी शुरू होती है साल 1953 से. एक आदमी के पास 2.5 एकड़ की ज़मीन थी. उसने वसीयत बनवाई और ज़मीन अपनी पत्नी के नाम कर दी. वसीयत के मुताबिक, ये ज़मीन अंत में उसके बेटे के नाम होनी थी. लेकिन जब वसीयत लिखी गई तब उसका बेटा छोटा था. इसलिए उसने पत्नी के ज़रिए बेटे को वसीयत सौंपने की सोची. इसलिए वसीयत में पत्नी पर कुछ पाबंदियां लगाई गई. वो ज़मीन किसी को न बेच सकती थीं और न ट्रांसफर कर सकती थी. 

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जब उनका बेटा बड़ा हुआ तो उसने दो शादी की और इससे पांच बच्चे हुए. यहां फिर मामला पेचीदा हो गया. बेटे और उसकी मां ने 1975 में गिफ्ट सेटलमेंट डीड साइन की और पूरी प्रॉपर्टी आदमी की दूसरी पत्नी के नाम ट्रांसफर कर दी. मगर इस डील के बाद भी शख्स अपनी ज़मीन पर 1986 तक रहा. यहीं उसकी मौत भी हुई थी. यहां से इस केस की शुरुआत हुई. 

कट टू 1996. दस साल बाद शख्स की दूसरी पत्नी ने किसी बाहरी को अपनी ज़मीन बेच दी. फिर शख्स की पहली शादी से हुई उसकी बेटी ने इसपर आपत्ति जताई. उसने तर्क दिया कि ये ज़मीन उसके पुरखों की है और उसकी भी उसमें भागीदारी है. इसके बाद मामला कोर्ट-कचहरी तक पहुंचा. आखिरकार 8 सितंबर, 2026 को मद्रास हाईकोर्ट ने बेटी की मांग को ख़ारिज कर दिया.        

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कोर्ट ने ख़ारिज क्यों किया?

मद्रास हाईकोर्ट ने ये माना कि ज़मीन पुरखों की नहीं बल्कि कमाई गई है. हिन्दू कानून के मुताबिक, शख्स और उसकी मां के पास पूरा हक़ था कि वो दूसरी पत्नी को ज़मीन दे सकते हैं. ये भी कहा कि दूसरी पत्नी का ज़मीन बेचना भी जायज था. इस मामले में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के सेक्शन 14 (2) को कायम रखा है. इस कानून के तहत हिन्दू औरत को ‘राइट टू क्लेम’ का अधिकार मिलता है.

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि शख्स की पोती ने खुद भी ये माना है कि सेटेलमेंट डीड हुई थी. और ये भी माना कि वसीयत लिखने के बाद 11 साल में एक बार भी उन्होंने अपनी वसीयत पर सवाल नहीं उठाया था. कोर्ट ने ये साफ़ किया कि अगर ये सेटलमेंट डीड हुई है तो ये अपने आप साफ हो जाता है कि ज़मीन दूसरी पत्नी की थी.   

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