The Lallantop

भारत के ग्रेजुएट्स नौकरी के लायक नहीं? नीति आयोग ने कड़वा सच बता दिया

भारत में अब पहले से कहीं ज्यादा संख्या में ग्रेजुएट तैयार हो रहे हैं. लेकिन ये उपलब्धि के बजाय संकट का विषय बन गया है, ऐसा नीति आयोग की एक रिसर्च पेपर बता रही है. रिसर्च पेपर की मानें तो ग्रेजुएट डिग्री छात्रों को जॉब मार्केट के हिसाब से तैयार नहीं कर पा रही है. यानी नौकरी दिला पाने में सक्षम नहीं है.

Advertisement
post-main-image
भारत में ग्रेजुएट डिग्री लोगों को नौकरी नहीं दिला पा रही. (प्रतीकात्मक तस्वीर- इंडिया टुडे)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • नीति आयोग ने 18 अगस्त 2024 को प्रकाशित अपनी रिसर्च रिपोर्ट में बताया कि केवल 8.25 प्रतिशत ग्रेजुएट्स ही अपनी काबिलियत के अनुसार रोजगार पा रहे हैं।
  • रिपोर्ट के अनुसार भारत की उच्चशिक्षा प्रणाली में पढ़ाया जाने वाला सिलेबस उद्योग की बदलती जरूरतों के साथ अनुकूल नहीं है, जिससे डिग्रीधारकों को नौकरी नहीं मिल पाती।
  • रिपोर्ट ने इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप को सीखने के अंतर को भरने का उपाय बताया है, पर छात्रों के सिर्फ ऑब्जर्विंग करने से उनकी जानकारी सतही रहती है।

भारत में ग्रेजुएट्स की पहले से बड़ी खेप तैयार हो रही है. लेकिन इनकी डिग्री नौकरी के लायक नहीं है. ये हम नहीं, नीति आयोग की नई रिसर्च रिपोर्ट बता रही है. रिपोर्ट बताती है कि डिग्री से मिल रही स्किल और जॉब मार्केट की जरूरतों के बीच बहुत बड़ा असंतुलन पैदा हो गया है. यानी ग्रेजुएट डिग्री रोजगार दिला पाने में सक्षम नहीं हो पा रही है. 

Advertisement

18 अगस्त को नीति आयोग ने एक रिसर्च पेपर पब्लिश किया. इसकी हेडिंग है, 'Reimagining Skilling for Viksit Bharat @2047'. इस रिसर्च पेपर के मुताबिक, सिर्फ 8.25 प्रतिशत ग्रेजुएट ही अपनी काबिलियत के हिसाब से रोजगार पा सके हैं. ये आंकड़े आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 से लिए गए हैं.

नीति आयोग भारत सरकार का एक प्रमुख पॉलिसी थिंक टैंक है. यह केंद्र और राज्य सरकारों को रणनीतिक और तकनीकी सलाह देता है. नीति आयोग के हाल में जारी किए आंकड़े सवाल उठाते हैं कि उन करोड़ों युवाओं का क्या, जो अपने सालों की मेहनत फकत डिग्री पाने में लगा देते हैं. लेकिन उनको ये नहीं पता कि यह पढ़ाई उनकी नौकरी की राह आसान करेगी या नहीं.

Advertisement

जॉब इंडस्ट्री के हिसाब से अपडेट नहीं सिलेबस

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की हायर और टेक्निकल एजुकेशनल सिस्टम में जो पढ़ाया जाता है, उसमें और लेबर मार्केट की जरूरत के बीच एक बड़ा फर्क है. कई संस्थानों में पढ़ाए जाने वाला सिलेबस इंडस्ट्री की बदलती जरूरतों के हिसाब से अपडेटेड नहीं है. इस वजह से डिग्री, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट होने के बावजूद लोगों को आसानी से नौकरी नहीं मिल पाती है.

एंट्री लेवल की नौकरियों के लिए भी चाहिए स्किल

Advertisement

नीति आयोग की रिसर्च बताती है कि ग्रेजुएट कोर्स के भरोसे मुश्किल से नौकरी मिल पाती है. हालांकि कई छात्र इस भरोसे ये डिग्री ले रहे हैं, क्योंकि इनसे सरकारी भर्ती की एलिजिबिलिटी मिलती है. मसला ये नहीं है कि बीए, बीकॉम या बीएससी की कोई वैल्यू नहीं है. सच्चाई ये है कि अक्सर इस तरह की डिग्री हासिल करने वाले स्टूडेंट या फिर एम्पलॉयर को यह पता नहीं चल पाता कि ग्रेजुएट असल में क्या काम कर सकता है.

भारत में एक बड़ी आबादी जेनरिक ग्रेजुएट डिग्री की ओर भागती है, इसलिए ये समस्या ज्यादा बड़ी है. ग्रेजुएट प्रोग्राम में एडमिशन कराने वाले 3 करोड़ 40 लाख छात्रों में से 1 करोड़ 13 लाख छात्रों ने बैचलर ऑफ आर्ट्स (B.A.) में एडमिशन लिया है. वहीं बैचलर ऑफ साइंस (B.Sc) और बैचलर ऑफ कॉमर्स (B.Com) में दो करोड़ से ज्यादा छात्रों ने एडमिशन लिया है.

आयोग ने अपने पेपर में साफ किया है कि बीए, बीकॉम या बीएससी की डिग्री हासिल करने पर शायद ही कभी सीधे नौकरी मिलती है. एंट्री लेवल की नौकरियों के लिए भी टैली या ऑफिस एप्लिकेशन जैसे स्किल्स की जरूरत होती है.

स्किल की कमी परेशानी का सबब

नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि बात सिर्फ रोजगार के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, खुद छात्र भी मानते हैं कि उनमें कई चीजों की कमी है. 34 प्रतिशत छात्र डिग्री हासिल करते समय स्किल की कमी को बड़ी समस्या मानते हैं, जबकि 18 प्रतिशत छात्र इंटरव्यू की तैयारी नहीं हो पाने से परेशान है. वहीं 80 प्रतिशत छात्र अपनी डिग्री में प्रैक्टिकल और इंडस्ट्री के अनुभव को बड़ी कमी मानते हैं.

एक भारतीय ग्रेजुएट इकोनॉमिक्स की थ्योरी तो जानता है लेकिन कंपनी के फाइनेंस में इसका इस्तेमाल कैसे होगा, ये उसे नहीं पता है. एक कॉमर्स ग्रेजुएट अकाउंट्स की पढ़ाई तो करता है, लेकिन वर्कप्लेस पर काम आने वाले सॉफ्टवेयर स्किल्स के बारे में उसे पता नहीं है.

इसी तरह से पॉलिटिकल साइंस का ग्रेजुएट स्टूडेंट पॉलिटिकल थ्योरी की समझ रखता है, लेकिन उसके पास रिसर्च की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग नहीं है. वह पॉलिसी एनालिसिस और पब्लिक अफेयर के बारे में नहीं जानता. इस तरह कॉलेज से मिले सर्टिफिकेट काम करने की क्षमता के बारे में नहीं बता पाते.

इससे हमारी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, जो स्टूडेंट की सफलता को एनरोलमेंट, परीक्षा और डिग्री के आधार पर मापती रही है. यहां ये नहीं सोचा जाता कि क्लासरूम से निकलने के बाद छात्रों के साथ क्या होगा.

सरकारी नौकरी की ओर भागते हैं छात्र

क्लास की पढ़ाई और वर्कप्लेस की जरूरतों के बीच की खाई के चलते ही बड़ी संख्या में छात्र सरकारी नौकरी की ओर भागते हैं, जिसके चलते यहां गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा हो जाती है. नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2024 और जुलाई 2025 के बीच 55,000 पदों की वैकेंसी आई, जिसके लिए 1 करोड़ 86 लाख एप्लिकेशन आए. ये संख्या भारत के एजुकेशन सिस्टम से निकली उम्मीदों और सरकारी सेक्टर में उपलब्ध सुरक्षित नौकरियों की संख्या के बीच के असंतुलन को दिखाती है.

ये भी पढ़ें - बैंकों की हजारों नौकरियां कौन खा गया? टॉप प्राइवेट बैंकों का ये सच डरा देगा

कॉलेज और जॉब मार्केट के बीच की कड़ी गायब

नीति आयोग का रिसर्च पेपर बेहद कमजोर प्रैक्टिकल लर्निंग, इंडस्ट्री के अनुभव की कमी और नौकरी के लिए जरूरी तैयारी में पूरी मदद नहीं मिल पाने जैसी कमियों को बताता है. हाईस्कूल के बाद मिलने वाली फॉर्मल एजुकेशन में सीवी राइटिंग, मॉक इंटरव्यू और जॉब सर्च के लिए सपोर्ट सिस्टम की कमी होती है. 

ऐसे में स्टूडेंट्स अपनी काबिलियत जाने बिना ही जॉब मार्केट तक पहुंच जाते हैं. रिसर्च की मानें तो प्रैक्टिकल कोर्स पढ़ाने के तरीके में भी कई कमियां है. मसलन, इंडस्ट्री का पर्याप्त अनुभव लिए बिना ही टीचर्स नए सब्जेक्ट पढ़ाते हैं. वहीं खराब इंफ्रास्ट्रक्चर के चलते छात्रों को केवल सतही या पुरानी प्रैक्टिकल नॉलेज ही मिल पाती है.

एम्प्लॉयर अनुभव चाहते हैं, ग्रेजुएट्स के पास अनुभव की कमी होती है, जिसके चलते कॉलेज से निकलने के बाद भी वह वर्कप्लेस से नहीं जुड़ पाते. इससे एक लूप बन जाता है. इस पेपर में बताया गया है कि इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप इस गैप को पूरा करने का जरिया बन सकती है. 

लेकिन साथ में चेतावनी भी दी गई है कि अगर छात्र असल में सीखने और काम करने के बजाय सिर्फ ऑब्जर्व करते हैं, तो उनकी नॉलेज सतही रह जाती है. इसलिए भारत के सामने चुनौती बस युवाओं को कॉलेज में एडमिशन दिलाने भर की नहीं है, असल चुनौती उस सवाल का जवाब देने की है जो डिग्री मिलने के बाद मुंह बाए खड़ा हो जाता है.

वीडियो: MMA फाइटर को करनी पड़ रही सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी

Advertisement