The Lallantop

ग्लाइसोफेट से कैंसर होता है तो भारत के लोगों को ये क्यों 'खिलाया' जा रहा है?

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने ग्लाइफोसेट नाम के केमिकल से कैंसर होने का खतरा बताया है. लेकिन भारत में आयात की जा रही विदेश दालों और सोयाबीन में ग्लाइफोसेट को खपाने के लिए नियमों में ढील दी जा रही है. जबकि भारत के किसानों के लिए ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल पर बेहद सख्ती बरती जाती है.

Advertisement
post-main-image
ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल को भारत में नियमों की ढाल दी जा रही है. (इंडिया टुडे)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के दस्तावेजों के अनुसार, भारत में आयातित दालों और सोयाबीन में ग्लाइफोसेट की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच सकती है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने ग्लाइफोसेट को कैंसर कारक के रूप में वर्गीकृत किया है, जबकि भारत में नियमों को ढीला किया गया है।
  • भारत में ग्लाइफोसेट के उपयोग पर घरेलू प्रतिबंध हैं, लेकिन आयात की गई दालों में इसकी अधिकतम सीमा बढ़ाई गई है, जिससे सेहत के जोखिम और नियामकीय विवाद बन रहे हैं।

भारत में सबसे सस्ता क्या है? इस पर बहस की जा सकती है. लेकिन बहस में एक मजबूत दावेदारी आम नागरिकों की जान की रहेगी. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के सरकारी कागज इस दावे को और मजबूती देते हैं. सवाल एक केमिकल का है. नाम है 'ग्लाइफोसेट'. विश्व स्वास्थ संगठन (WHO) ने इससे कैंसर होने का खतरा बताया है. लेकिन भारत में आयात की जा रही विदेशी दालों और सोयाबीन में ग्लाइफोसेट को खपाने के लिए नियमों में ढील दी जा रही है.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement

इंडिया टुडे से जुड़े ओमप्रकाश की रिपोर्ट के मुताबिक, WHO की संस्था इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने ग्लाइफोसेट से कैंसर होने का खतरा बताया है. सरकारी फाइलें बताती हैं कि हमारी रेगुलेटरी एजेंसियां इस खतरे से अनजान नहीं हैं. FSSAI के इम्पोर्ट डिवीजन के आधिकारिक कागजों में साफ लिखा है, आयातित दालों में खरपतवारनाशी ग्लाइफोसेट की मात्रा बहुत ज्यादा होने की आशंका है, जिससे भारतीय कंज्यूमर्स की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है. चेतावनी के बावजूद देश के लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है.

ग्लाइफोसेट के लिए इतनी मोहब्बत क्यों?

Advertisement

भारत का अपना बेसिक नियम है कि जिस केमिकल के यूज की सीमा तय न हो, उस पर 0.01mg/kg की सख्त लिमिट (लगभग शून्य) लागू होगी. इसका मतलब हुआ कि एक टन दाल में 1 ग्राम केमिकल का मिलना भी कानूनी तौर पर अपराध है. लेकिन ग्लाइफोसेट के मामले में इस नियम को ताक पर रख दिया गया है.

इस मामले में अंतरराष्ट्रीय मानक संस्था 'कोडेक्स' (Codex) द्वारा तय किया गया मैक्सिमम रेसीड्यू लिमिट (MRL) को अपनाया गया है. इसके तहत मसूर और मटर में ग्लाइफोसट की लिमिट 5mg/kg तक रखी गई है. वहीं सोयाबीन के लिए तो हद पार कर दी गई है. इसमें 20mg/kg की लिमिट रखी गई है.

ये छूट विदेश से आयात किए जाने वाली दालों के लिए है. भारत में किसानों के लिए ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल पर कड़े प्रतिबंध हैं. भारत में सरकारी नियमों (CIB&RC) के मुताबिक, ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल किसी भी खाद्य फसल (जैसे धान, गेहूं या दालों) पर करने की इजाजत नहीं है. इसे केवल चाय के बागानों और गैर-फसली क्षेत्रों (खाली पड़े मैदानों या मेडों) में उगी जंगली घास को साफ करने के लिए इस्तेमाल की इजाजत है. हालांकि जमीनी हकीकत कुछ और है. कई राज्यों में नियमों को ताक पर रखकर (HTBT कॉटन), गन्ने, मक्के और फलों के बागानों में इसका धड़ल्ले से छिड़काव किया जा रहा है.

Advertisement

अमीर देशों का दोहरा खेल 

यूरोपीय यूनियन और कनाडा जैसे देश जब भारत से चाय या चावल खरीदते हैं तो 0.01mg/kg को लेकर जीरो टॉलरेंस अपनाते हैं. अगर इससे जरा सा भी ज्यादा अंश मिला तो भारत का पूरा कंसाइनमेंट रिजेक्ट कर दिया जाता है. वहीं कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जब अपनी दालें भारत को बेचते हैं तो वे 5mg/kg वाली छूट का फायदा उठाते हैं. सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों ने अपने यहां ग्लाइफोसेट वाली दालों पर बैन लगा रखा है, लेकिन भारत इस मामले में कुछ ज्यादा ही 'उदारता' बरत रहा है.

अमेरिका में खुला मोर्चा 

भारत भले ग्लाइफोसेट को लेकर नरम रुख अपना रहा हो. लेकिन अमेरिका में इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू हो चुकी है. अमेरिका के टेक्सास राज्य के अटॉर्नी जनरल केन पैक्सटन ने खाने में ग्लाइफोसेट मिलाकर लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने के आरोप में दिग्गज कंपनियों पर सीधे केस ठोक दिया है.  
अमेरिकी जांच रिपोर्ट का दावा है कि ग्लाइफोसेट न केवल कैंसर का कारण हो सकता है, बल्कि इससे हॉर्मोन असंतुलन, बांझपन, किडनी की बीमारियां और ऑटोइम्यून डिसऑर्डर का भी खतरा है.

भारत में किसानों पर सबसे ज्यादा असर

भारत में फसलों पर ग्लाइफोसेट का छिड़काव बैन है. लेकिन किसान कपास, मक्का, अरहर और धान के खेतों में उगे खरपतवार को साफ करने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं. किसान या मजदूर चप्पल, बनियान या बिना किसी मास्क और चश्मे के पीठ पर टैंक लादकर खेतों में ग्लाइफोसेट स्प्रे करते हैं. हवा के जरिए यह सीधे उनके स्कीन और फेफड़ों तक पहुंचता है, जो 'नॉन-हॉजकिन लिंफोमा' (कैंसर) जैसी बीमारियों की वजह बनता है. फसलों पर स्प्रे के दौरान उनकी जड़ें और पत्तियां ग्लाइफोसेट को सोख लेती हैं. इसके अवशेष गेहूं, दाल, मक्का और सब्जियों के जरिए सीधे आम कंज्यूमर्स की थाली तक पहुंच रहा है.

बिजनेस के लिए लोगों की जान से समझौता?

सरकारी अफसर तर्क देते हैं कि भारत में दालों की कमी पूरा करने के लिए आयात जरूरी है. उनका कहना है कि विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के चलते अंतरराष्ट्रीय मानकों को मानना हमारी मजबूरी बन जाता है. लेकिन सवाल बहुत सीधा है, कोई भी व्यापारिक मजबूरी या अंतरराष्ट्रीय संधि देश के करोड़ों नागरिकों की जिंदगी से बढ़कर है? जवाब तो सबको मालूम है!

वीडियो: खर्चा पानी: बैंक स्ट्राइक और किसान आंदोलन क्यों होने वाला है?

Advertisement