पानी के लिए आप कितनी मुश्किलें झेल सकते हैं? क्या आपको एक हैंडपंप या टैप की दूरी पर पानी मिल जाता है? पीने वाले पानी से आपकी दूरी सिर्फ बीस रुपये की है? क्या आप सोच सकते हैं कि इसी देश के किसी ‘उपेक्षित’ कोने में ऐसी महिलाएं भी हैं, जो जरा से पानी के लिए हर रोज ‘पाताल’ में उतरती हैं. वहां भी उन्हें आसानी से पानी नहीं मिल जाता. बूंद-बूंद से घड़ा भरने की आपने सिर्फ कहावत सुनी होगी. यहां की महिलाएं ये कहावत जीती हैं. वो जहां से पानी भरने जाती हैं, वहां पानी का कोई बड़ा सोता नहीं है. एक छोटा सा गड्ढा है, जिसमें उन्हें बूंद-बूंद रिसते पानी से गड्ढा भर जाने का इंतजार करना होता है. मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती. इसके बाद भी उन्हें चढ़नी होती है एक मुश्किल चढ़ाई, जिसके लिए वो अंधेरे से भी रेस लगाती हैं.
यहां पानी का ऐसा संकट, चट्टानों से रिसते पानी को इकट्ठा कर रही महिलाएं
मध्य प्रदेश के धार जिले के उटावा गांव में महिलाएं रोज 50 फीट गहरी खाई में उतरकर रिसते पानी की बूंदों से बर्तन भरने को मजबूर हैं. जल जीवन मिशन पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गांव में नलों से पानी नहीं पहुंच रहा, जिससे लोगों की परेशानी जारी है.


ये कहानी है मध्य प्रदेश के धार जिले के उटावा गांव की. इंडिया टुडे से जुड़े रवीश पाल सिंह ने यहां पानी के संकट की जमीनी पड़ताल की है. उनकी रिपोर्ट के मुताबिक, उटावा गांव की महिलाएं रोजाना कठोर चट्टानों से भरी करीब 50 फीट गहरी खाई में उतरकर बूंद-बूंद पानी भरने को मजबूर हैं. इस खाई तक पहुंचने का रास्ता भी आसान नहीं है. तकरीबन 43 डिग्री तापमान वाली दोपहरी का सोचिए. इसी भीषण गर्मी में उटावा की महिलाएं सिर पर खाली बर्तन रखे एक सुनसान घाटी की ओर जाती हैं.
50 फीट गहराई में मिलता है पानीयहां ऊंची-ऊंची चट्टानों के बीच गहरी खाई जैसी जगह है. ऊंचाई से इसे देखना अपने आप में डरावना है, लेकिन गांव में पानी इसी डरावनी गहराई में मिलता है. यह महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. फिसलन भरे पत्थरों से कदम संभालते हुए नीचे उतरने पर कोई कुआं नहीं मिलता. न तालाब और न हैंडपंप. यहां सिर्फ जमीन से रिसती हुई पानी की बूंदें मिलती हैं. इन बूंदों से ही वहां एक गड्ढा बन जाता है. जब वो गड्ढा भर जाता है तो महिलाएं वही पानी अपने बर्तन में भर लेती हैं.
पानी इतना कम होता है कि गड्ढा बार-बार खाली हो जाता है. दोबारा उसे भरने में दो घंटे का टाइम लगता है. तब तक महिलाएं चुपचाप गड्ढा भरने और अपनी बारी आने का इंतजार करती हैं. यहां से पानी लेने आईं सुषमा बताती हैं कि इस पाताल में उतरना काफी डरावना अनुभव होता है. पिछले साल उनकी ननद पानी भरने आई थीं तो उनके ऊपर पेड़ गिर गया था. सुषमा आगे बताती हैं कि पानी भरकर वापस जाते वक्त काफी सावधान रहना होता है. पत्थरों पर पैर फिसलते हैं. अगर एक बार भी पैर फिसला तो सीधे नीचे आकर पत्थरों पर गिरेंगे.
पिक्चर अभी बाकी है…पानी भरने की मेहनत एक तरफ. उससे ज्यादा मुश्किल है पानी भरकर ले जाने का संघर्ष. खाली बर्तन लेकर नीचे उतरना थोड़ा आसान था, लेकिन असली चुनौती होती है पानी भरे बर्तन को लेकर चट्टानों पर चढ़ना. एक छोटी सी चूक आपको नीचे गिरा सकती थी.
आज के वक्त में पानी को लेकर ऐसा संघर्ष किताबी कहानी लगती है, लेकिन धार जिले के उटावा का यही सच है. गांव में जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन तो बिछ गई है, लेकिन पानी फिर भी लोगों के घरों से दूर है. असिस्टेंट इंजीनियर विनोद महाजन ने बताया कि उटावा गांव में एक करोड़ 17 लाख रुपये की लागत से जल जीवन मिशन की योजना पूरी कर ग्राम पंचायत को सौंप दी गई थी, लेकिन इस साल पानी का लेवल कम होने की वजह से पानी की समस्या पैदा हुई है. उन्होंने कहा कि नया नलकूप भी उतना पानी नहीं दे पा रहा है, जितने की जरूरत है.
विभाग करोड़ों रुपये खर्च होने का दावा तो कर रहा है लेकिन हकीकत यही है कि नलों से पानी नहीं आता. नतीजा ये है कि महिलाएं आज भी धरती की दरारों से रिसती बूंदों पर निर्भर हैं.
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