मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेद की खबर सामने आने के बाद सियासत तेज हो गई है. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने भी मामले पर प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा है कि अगर फैसले सर्वसम्मति से नहीं लिए गए, तो वे 'अवैध' हैं. एसवाई कुरैशी ने कहा है कि चुनाव आयोग को पिछले डेढ़ साल में लिए फैसलों की लिस्ट सार्वजनिक करनी चाहिए.
'EC में कानून का खुला उल्लंघन, फैसले सार्वजनिक करें', पूर्व CEC एसवाई कुरैशी ने किसे कहा 'अवैध'?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित में आपत्तियां जताईं. ये असहमतियां SIR समेत कई मुद्दों से जुड़ी थीं. इसी को लेकर पूर्व सीईसी एसवाई कुरैशी का बयान आया है.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित में आपत्तियां जताईं. ये असहमतियां SIR समेत कई मुद्दों से जुड़ी थीं. इसे लेकर विपक्षी पार्टियों ने सरकार और चुनाव आयोग को घेरना शुरू कर दिया. अब पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी का भी इस पर बयान आया है. उन्होंने कहा,
“आज मैंने अखबार में पढ़ा. बहुत ही सीरियस और एक्सप्लोसिव खुलासे हैं. पिछले डेढ़ साल से इलेक्शन कमीशन में कानून का उल्लंघन खुलेआम होता चला आ रहा है.”
कुरैशी ने कहा कि 1993 में जब से कई सदस्यों वाला आयोग बना है, तब से ये पूरी तरह साफ है कि आयोग में फैसले आम सहमति से होने चाहिए. या कम से कम बहुमत की राय पर आधारित होने चाहिए. उन्होंने कहा कि तीनों आयुक्तों के अधिकार बराबर हैं. बहुमत बनाने वाले किन्हीं भी दो सदस्यों की राय ही मान्य होनी चाहिए. चाहे वे दो चुनाव आयुक्त हों या एक आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा,
“दोनों चुनाव आयुक्त सवाल कर रहे थे. मुखालफत कर रहे थे. मुझे ये भी पता लगा कि चार-चार महीने तक इलेक्शन कमीशन की मीटिंग भी नहीं होती थी. ऐसी एरोगैंस तो शेषन (पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन) के जमाने में भी नहीं थी.”
एसवाई कुरैशी ने आगे कहा कि एक व्यक्ति के पास ज्यादा पावर होना सही नहीं है. उन्होंने बताया, “सुप्रीम कोर्ट ने 1995 के फैसले में तब के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन पर कहा था कि कितना भी आदमी बुद्धिमान या समझदार हो, इलेक्शन कमीशन की इतनी पावर्स एक आदमी में होना अच्छी चीज नहीं है. इसका मल्टी-मेंबर होना ही अच्छा है. उसके बाद सरकार ने इलेक्शन कमीशन को मल्टी-मेंबर बना दिया.”
ये भी पढ़ें: SIR पर चुनाव आयोग में था बड़ा मतभेद, खुलासे के बाद विपक्ष की मांग- ‘ज्ञानेश कुमार को जेल भेजो’
कुरैशी का कहना है कि अब जैसा पता लगा है कि कई फैसले मेजॉरिटी से नहीं लिए गए, तो ये अवैध है. फैसलों पर सहमति ना होने या उन्हें बाईपास करते हुए अगर कोई फैसला लिया गया है, तो ये गैरकानूनी है. इन्हें पलट देना चाहिए.
एसवाई कुरैशी ने पिछले डेढ़ साल के फैसलों को सार्वजनिक करने की मांग भी की. उन्होंने कहा,
"पिछले डेढ़ साल में लिए गए सभी फैसलों की एक पूरी लिस्ट तैयार करके सार्वजनिक की जानी चाहिए, जिसमें यह बताया जाए कि कौन-से फैसले आम सहमति से लिए गए थे. कोर्ट को पूरा रिकॉर्ड मंगाना चाहिए, क्योंकि जनता सच जानना चाहती है."
कुरैशी ने साफ कहा है कि अगर रिपोर्ट गलत है. तो तीनों मेंबर (चुनाव आयुक्त) को मिलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करना चाहिए. बताना चाहिए कि जो रिपोर्ट आई है, वो गलत है. सारे फैसले एकमत से लिए गए हैं.
पूर्व इलेक्शन कमिशन ओपी रावत ने क्या कहा?SIR प्रक्रिया पर पूर्व इलेक्शन कमिशन ओपी रावत का भी बयान आया है. उन्होंने ANI से बात करते हुए कहा
“शुरुआत में कुछ गलतियां हुई थीं. मामला कोर्ट तक भी पहुंचा था. मैंने इस बारे में बात की है और चुनाव आयोग समय-समय पर सुधार करता रहा है. धीरे-धीरे सुधारों के साथ SIR प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हुई.”
ओपी रावत ने आगे कहा कि पश्चिम बंगाल के मामले में अपीलीय ट्रिब्यूनल ने फैसला सुनाया कि जिन लोगों के नाम हटाए गए थे, उनमें से 93 प्रतिशत असली वोटर थे. उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया था. ये एक क्रिमिनल नेगलेक्ट है. इलेक्शन कमीशन को इसके लिए तुरंत कुछ ना कुछ उपाय करना चाहिए, नहीं तो पूरी SIR प्रक्रिया रोक देनी चाहिए.
वीडियो: मीराबाई चानू ने जीता पहला एशियन गेम्स मेडल, जीता सिल्वर













