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इंसानों के पेशाब से पिघली एवरेस्ट की 2 हजार टन बर्फ! एक स्टडी तो यही बता रही

दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट भी अब इंसानों की गर्मी से परेशान है? एक नई स्टडी ने बताया है कि एवरेस्ट बेस कैंप पर इंसानी गतिविधियों से इतनी Heat Energy पैदा हो रही है, जो हजारों टन ग्लेशियर की बर्फ पिघलाने के लिए काफी हो सकती है.

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हिमालय के ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं (PHOTO- India Today)

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  • माउंट एवरेस्ट बेस कैंप पर इंसानी गतिविधियों के बढ़ने से खुम्बु ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है, जिसमें मानव पेशाब से निकलने वाली गर्मी को भी ग्लेशियर पिघलाने वाले तीन मुख्य कारणों में शामिल किया गया है।
  • एवरेस्ट बेस कैंप पर बढ़ती भीड़, गैस और ईंधन के उपयोग से गर्मी उत्पन्न होना और ग्लोबल क्लाइमेट चेंज जैसे कारण ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के पीछे प्रमुख वजहें हैं।
  • अगर इस तरह का दबाव बना रहा तो जल्द ही ग्लेशियर पिघलने की प्रक्रिया तेज होगी, जिससे क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय बदलावों के नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

माउंट एवरेस्ट पर बढ़ती भीड़ के नतीजे टेंशन में डालने वाले हैं. दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी का बेस कैंप हिमालय की सबसे व्यस्त जगहों में से एक है. यहां इंसानी मौजूदगी के नुकसान का एक ऐसा पहलू सामने आया है, जो थोड़ा चौंकाने वाला है. एक स्टडी की रिपोर्ट में बताया गया कि एवरेस्ट का खुम्बु नाम का एक ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है. वैज्ञानिकों ने इसकी जो तीन वजहें बताई हैं, उनमें से एक है इंसानों के पेशाब से निकली गर्मी. चलिए इस रिपोर्ट के बारे में थोड़ा विस्तार से जान लेते हैं.

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दरअसल, 'रीजनल एनवायर्नमेंटल चेंज' में छपी एक स्टडी में बताया गया कि एवरेस्ट बेस कैंप पर इंसानी गतिविधियां बढ़ने से खुम्बु ग्लेशियर काफी तेजी से पिघल रहा है. रिसर्चर्स ने अपनी रिपोर्ट में इसके लिए तीन मुख्य कारणों का जिक्र किया है. इनमें ग्लोबल क्लाइमेट चेंज और फॉसिल फ्यूल का इस्तेमाल प्रमुख वजह तो है ही. तीसरी वजह इंसानी पेशाब से पैदा होने वाली गर्मी है. स्टडी के नतीजों से पता चला है कि एवरेस्ट बेस कैंप सिर्फ क्लाइमेट चेंज के बड़े असर का सामना नहीं कर रहा है. बल्कि कैंप में लोगों का लगातार आना भी वहां के ग्लेशियरों को पिघला रहा है.

अब एक ग्लेशियर का पिघलना या टूट कर गिरना कितना खतरनाक हो सकता है, ये हमने नेपाल में देखा ही है. ग्लेशियर पिघलने की प्रमुख वजह ग्लोबल वार्मिंग ही बताई जाती है लेकिन पहाड़ों पर पहुंचती मानव आबादी की बाढ़ भी ग्लेशियरों के लिए खतरा बन चुकी है. दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट भी इसमें अपवाद नहीं रह गया है. माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप पर हर साल भारी संख्या में पर्वतारोही, ट्रेकर्स, गाइड और सपोर्ट स्टाफ इकट्ठा होते हैं. यहां इंसानी गतिविधियों के बढ़ने से कैंप के नीचे और आसपास मौजूद ग्लेशियर पर दबाव बढ़ रहा है. 

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ये बात एक स्टडी में सामने आई है. 

दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा एवरेस्ट बेस कैंप

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस स्टडी का नेतृत्व एक इंटरनेशनल टीम ने किया है. इसमें नेपाल सरकार के एक सीनियर सर्वे अधिकारी भी शामिल थे. रिसर्चर्स ने 2023 के बसंत में चढ़ाई के मौसम के दौरान एवरेस्ट बेस कैंप पर फील्ड डेटा जुटाया. उन्होंने कैंप में होने वाली गतिविधियों से निकलने वाली एनर्जी और गर्मी की जांच की. इसमें लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG), केरोसिन और पेट्रोल का इस्तेमाल शामिल था. इनका इस्तेमाल खाना पकाने, गर्मी बनाए रखने और बिजली पैदा करने जैसी चीजों के लिए किया जाता है. 

इस रिसर्च के दौरान एक और दिलचस्प जानकारी सामने आई. रिसर्चर्स ने पेशाब से पैदा होने वाली गर्मी पर भी स्टडी की. स्टडी के अनुसार, 2023 के बसंत में इन गतिविधियों से निकलने वाली कुल गर्मी (heat energy) का अनुमान 8,49,174 ± 1,79,774 मेगाजूल लगाया गया था. इसको ऐसे समझिए कि इतनी गर्मी लगभग 2,492 ± 528 टन ग्लेशियर की बर्फ को पिघलाने के लिए काफी है. 

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हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि एवरेस्ट के आस-पास ग्लेशियरों के पिघलने का एकमात्र कारण वहां मौजूद इंसानों की गतिविधियां ही हैं. ग्लोबल क्लाइमेट चेंज अब भी ग्लेशियर पिघलने के तीन मुख्य कारणों में से एक है. लेकिन एवरेस्ट बेस कैंप पर स्थानीय गतिविधियां भी पहले से ही कमजोर ग्लेशियर पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं. अगर इसी तरह चलता रहा तो एक दिन ग्लेशियर पिघलेंगे और उसका खामियाजा पूरी धरती भुगतेगी.

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