देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर पर शिक्षक दिवस मनाते हैं. लेकिन इस दिन ऐसे शिक्षक (टीचर्स) को भी याद करना जरूरी है, जो चुपचाप अपना काम कर रहे हैं. ऐसे ही एक व्यक्ति हैं महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के टीचर जीवन मिथारी. जीवन ने कवलटेक धनगरवाड़ा के स्कूल में नौकरी इसलिए शुरू की क्योंकि कोई और यह काम नहीं करना चाहता था और वह नहीं चाहते थे कि बच्चे स्कूल छोड़ दें. ऐसे में वो रोजाना घने जंगल से होकर 5 किलोमीटर का सफर तय करके मिथारी स्कूल पहुंचते हैं.
तेंदुए-भालू भी नहीं डराते, 2 बच्चियों को पढ़ाने 5 किमी जंगल पार कर स्कूल जाते हैं ये टीचर
एक ऐसा स्कूल, जहां सिर्फ दो छात्राएं पढ़ती हैं. स्कूल तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं, बिजली नहीं और रास्ते में तेंदुए, गौर और जहरीले सांपों का खतरा. लेकिन इन सबके बावजूद एक शिक्षक पिछले 13 साल से हर दिन जंगल पार करके यहां पहुंचते हैं. नाम है जीवन मिथारी.

यहां वो बस दो छात्राओं को पढ़ाते हैं. ये दोनों बहनें हैं. एक की उम्र आठ साल की है और दूसरी सिर्फ पांच साल की है. छोटी बहन ने अभी तक आधिकारिक तौर पर स्कूल में दाखिला नहीं लिया है. फिर भी जीवन उसे पढ़ाते हैं.
तेंदुए का डर, फिर भी पढ़ाने जाते हैंगगनबावड़ा तालुका का कवलटेक धनगरवाड़ा एक छोटा सा गांव जिसमें बस तीन घर हैं. यहां बिजली भी नहीं है. साथ ही ये कोल्हापुर जिले की सबसे नम जगहों में से एक है. यहां का स्कूल पहाड़ी पर है. यहां न ही मोटरसाइकिल से पहुंचा जा सकता है, न ही कोई और रास्ता है. जंगल का इलाका है इसलिए जंगली कुत्ते, तेंदुए और सुस्त भालुओं का डर भी है. फिर भी जीवन हर सुबह वहां पहुंच जाते हैं.
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक जीवन मिथारी ने यह काम स्वेच्छा से लिया है. पिछले 13 सालों से वो कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए, अपने घर काले गांव से कवलटेक धनगरवाड़ा तक 28 किलोमीटर की यात्रा करते हैं. टाइम्स ने उनके साथ जंगल से होकर स्कूल तक का सफर तय किया. मिथारी जंगल के एंट्री गेट पर गाड़ी पार्क करने के बाद, लगभग 3 किलोमीटर की खड़ी ढलान पर चढ़े. फिसलन भरी सतह थी, लेकिन सावधानी से कदम रखते हुए, जोंकों से बचते हुए चलते रहे. मिथारी ने कहा,
जंगली जानवरों से होता है सामनामैं चढ़ाई करते समय सावधान रहता हूं. सर सलामत तो पगड़ी पचास. रास्ता हमेशा फिसलन भरा होता है, और अगर मैं गिर भी जाऊं तो हेलमेट पहनने से मेरे सिर पर चोट नहीं लगेगी.
मिथारी का कहना है कि उन्हें अक्सर गौर (जंगली भैंस) और जंगली कुत्ते दिख जाते हैं. वो कहते हैं,
चलते समय मैं गाता हूं या आवाज करता हूं ताकि जंगली जानवरों को पता चल जाए और उन्हें दूर जाने का समय मिल सके. जंगल में तेंदुए, जंगली सूअर और जहरीले सांप भी हैं. एक बार गौर के झुंड के रास्ता रोक लेने के कारण मुझे एक घंटे से ज्यादा इंतजार करना पड़ा था. एक कैमरा ट्रैप में स्कूल के पीछे 200 मीटर की दूरी पर एक तेंदुआ रिकॉर्ड हुआ था.
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टीचर की लगन, पढ़ रही हैं बच्चियांबच्चियों के पिता दगडू बोडके ने कहा कि उनकी बेटियां मिथारी की लगन की वजह से ही स्कूल जा पा रही हैं. उन्होंने कहा,
दूसरा स्कूल 8 किलोमीटर दूर है और मेरी बेटिया इतनी छोटी हैं कि जंगल के रास्ते इतनी दूर पैदल नहीं जा सकतीं. हमें उम्मीद है कि सरकार हमारा स्कूल बंद नहीं करेगी, भले ही इसमें सिर्फ दो छात्र हैं और यह दूर-दराज इलाके में है. अगर स्कूल बंद हुआ तो मेरी बेटियों की पढ़ाई छूट जाएगी. हम पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन उन्हें पढ़ना-लिखना चाहिए और अपना नाम बनाना चाहिए.
मां सखुबाई ने बताया कि इस बस्ती में कभी 70 परिवार रहते थे, लेकिन रोजाना की मुश्किलों से बचने के लिए अधिकतर परिवार कोल्हापुर शहर चले गए. मिथारी दो साल में रिटायर होने वाले हैं. उनका कहना है कि जाते-जाते अगर स्कूल की टपकती छत की मरम्मत हो जाए तो सभी को खुशी होगी.
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