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"ये जलवायु परिवर्तन पर आखिरी चेतावनी है, इसके बाद वापस लौटना मुमकिन नहीं होगा"

UN ने कहा है, 'क्लाइमेट टाइम बम टिक-टिक रहा है. कुछ ही समय बचा है.'

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21 मार्च 2023 (अपडेटेड: 21 मार्च 2023, 08:30 AM IST)
UN final warning on climate change humanity still has a last chance
जलवायु परिवर्तन पर आखिरी चेतावनी. (फोटो- इंडिया टुडे/AP)
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क्लाइमेट चेंज को लेकर वैज्ञानिकों ने ‘आखिरी चेतावनी’ जारी की है. जलवायु परिवर्तन पर एक नई स्टडी के हवाले से वैज्ञानिकों ने कहा है कि अब पृथ्वी ऐसी स्थिति में पहुंचने वाली है जिसके बाद जलवायु को हुए नुकसान को ठीक करना नामुमकिन हो जाएगा (Irreversible Damage to Climate UN). संयुक्त राष्ट्र (UN) ने चेतावनी देते हुए कहा है कि जलवायु परिवर्तन से भविष्य में होने वाले डैमेज को रोकने का एक आखिरी मौका अब भी बचा है. UN महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस संकट को ‘टाइम बम’ करार देते हुए गंभीर चिंता जाहिर की है.

क्लाइमेट चेंज पर 'आखिरी चेतावनी'

UN में कई देशों की सरकारों के सहयोग से एक पैनल क्लाइमेट चेंज के मुद्दे पर काम करता है. इस पैनल का नाम है इंटरगर्वनमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज. छोटे में कहें तो IPCC. इसने हालिया स्टडी के आधार पर रिपोर्ट जारी की है. इसमें क्लाइमेंट चेंज के लिहाज से मौजूदा दशक को महत्वपूर्ण बताया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक इस दशक में क्लाइमेट के लिए जो काम किए जाएंगे उनका असर हजारों सालों तक रहेगा.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस मुद्दे पर कहा है,

"हमारी दुनिया को सभी मोर्चों पर एक साथ जलवायु कार्रवाई की जरूरत है. मानवता गंभीर खतरे में है. वो जिस पतली बर्फ पर टिकी हुई है वो तेजी से पिघल रही है."

गुटेरेस ने आगे कहा,

"पिछले 200 सालों में दुनियाभर में बढ़ते तापमान के लिए इंसान जिम्मेदार हैं. पिछली 50 सालों में तापमान वृद्धि की दर 2000 सालों में सबसे ज्यादा रही. कार्बन डाईऑक्साइड का जमाव (Concentration) कम से कम पिछले 20 लाख सालों के मुकाबले सबसे ज्यादा है. क्लाइमेट टाइम बम चेतावनी दे रहा है ("The climate time bomb is ticking")."

UN महासचिव ने 2030 तक सभी अमीर देशों और 2040 तक सभी गरीब देशों में कोयले के इस्तेमाल को खत्म करने की बात कही. उन्होंने आग्रह किया कि 2035 तक दुनिया में कार्बन मुक्त बिजली उत्पादन की जाए.

वहीं IPCC ने नया टार्गेट देते हुए बताया,

"पेरिस समझौते के तहत ग्लोबल वॉर्मिंग की निर्धारित सीमा (1.5 डिग्री सेल्सियस) के अंदर रहने के लिए दुनिया को 2035 तक अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 2019 की तुलना में 60% की कटौती करने की जरूरत है."

IPCC ने पिछले साल अपनी एक रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि दुनिया का कोई भी देश क्लाइमेट चेंज के परिणाम भुगतने के लिए तैयार नहीं हैं. उसने कहा कि लगातार बढ़ती गर्मी की लहरें, सूखे और बाढ़ पहले से ही पौधों और जानवरों की सहनशीलता की सीमा को पार कर रहे हैं. इससे पेड़ों और कोरल जैसी प्रजातियों में बड़े पैमाने पर मृत्यु दर बढ़ रही है.

वीडियो: साइंसकारी: क्लाइमेट चेंज और महामारी का अनोखा रिश्ता

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