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'SC में इतने भ्रष्ट जज रहे कि गिनती भूल गया', 48 साल वकालत करने वाले वकील ने ये क्यों कहा?

वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, कार्यपालिका के बढ़ते दखल और जजों में सामाजिक विविधता की कमी को लेकर गंभीर सवाल उठाए.

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वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे (बाएं) ने पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ (दाएं) की भी आलोचना की है. (Courtesy: India today)

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  • वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के तीन बार अध्यक्ष रहते हुए भारत की न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और पक्षपात की बात कही और न्यायपालिका का क्रियान्वयन ठीक न होने का आरोप लगाया है।
  • दवे ने कहा कि न्यायपालिका ताकतवर वर्गों के पक्ष में झुक गई है और सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति में महिलाओं को शामिल नहीं किया, जिससे न्याय व्यवस्था में संवेदनशीलता की कमी बनी है।
  • उन्होंने अपनी 48 वर्षों की वकालत के पश्चात 2025 में पूरी तरह से पेशा छोड़ने की घोषणा की, जिससे न्याय व्यवस्था पर उनके प्रभाव और उनके द्वारा किए गए दावों पर भविष्य में चर्चा हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के तीन बार अध्यक्ष रहे वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने भारत की न्यायपालिका (Judiciary) को लेकर कई 'विस्फोटक' दावे किए हैं. उन्होंने कहा कि भारत में न्याय व्यवस्था ताकतवर लोगों के पक्ष में झुक गई है और ऐसी कार्यपालिका का समर्थन कर रही है जो पहले से ताकतवर हो गई है. दवे ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट में इतने भ्रष्ट जज रहे हैं, जिनकी गिनती भी याद नहीं. इसने न्याय व्यवस्था को बहुत नुकसान पहुंचाया है. भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की आलोचना करते हुए दवे ने कहा कि वह खुद को उदारवादी बताते थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने जिन 17 जजों की नियुक्ति की, उसमें एक भी महिला नहीं थी.

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दुष्यंत दवे ने और क्या क्या कहा, विस्तार से जानते हैं. 

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, 48 सालों तक वकालत करने वाले वकील दुष्यंत दवे 17वें केएम बशीर मेमोरियल लेक्चर में बोल रहे थे. यहां उन्होंने कहा कि अपने लंबे तजुर्बे से वो ये बात कह सकते हैं कि न्यायपालिका में कई बेहतरीन जज हुए लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इतने सारे भ्रष्ट जज भी रहे कि अब उन्हें इसकी गिनती भी याद नहीं. उन्होंने कहा कि ऐसे जजों ने देश में ‘न्याय’ को बहुत नुकसान पहुंचाया है जबकि यह एक बुनियादी इंसानी जरूरत है.

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‘न्याय पर अमीरों का कब्जा’

दवे ने कहा कि देश की न्याय व्यवस्था पर ‘अमीर और ताकतवर लोगों का कब्जा’ हो गया है. अदालतों में उनके मामलों की तेजी से सुनवाई होती है. उन्हें अपने पक्ष में फैसले भी मिल जाते हैं. उन्होंने उदाहरण दिया, 

आप अखबार या बिजनेस अखबार खोलकर देखें तो पाएंगे कि सबसे बड़े औद्योगिक घरानों को हर दूसरे या तीसरे दिन अपने पक्ष में कोई न कोई फैसला मिलता है. ये हैरान करने वाली बात है. वो अपने सारे मामलों में कामयाब कैसे हो जाते हैं. वो कभी नहीं हारते. न्याय व्यवस्था में ऐसा ही हो रहा है.

दवे ने न्यायपालिका पर आरोप लगाया कि वह कार्यपालिका (यानी सरकार) को सपोर्ट कर रही है. वो भी ऐसी सरकार को जो पहले ही काफी ताकतवर हो गई है. भारत का सुप्रीम कोर्ट भी अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा रहा है और मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए कोई दखल नहीं दे रहा है जबकि उसे ऐसा करने का अधिकार संविधान ने दिया है. उन्होंने कहा, 

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ऐसा नहीं है कि इंदिरा गांधी ही देश में ज्यादतियों के लिए जिम्मेदार थीं. पिछले 12 सालों से देश में जो हो रहा है, उससे हालात सच में बेकाबू होते जा रहे हैं. संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों को लागू करवाना होता है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट दखल देने को तैयार नहीं है. भले ही उसे दिखे कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है.

एसआईआर की आलोचना

चुनाव आयोग के वोटर्स लिस्ट की सफाई वाले SIR अभियान पर सुप्रीम कोर्ट के रवैये की भी दवे ने कड़ी आलोचना की. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की वजह से वयस्क मताधिकार खतरे में है. पूर्व सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की आलोचना करते हुए दवे ने कहा कि वह खुद को उदारवादी जज बताते हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने 17 जजों की नियुक्ति की. उनमें एक भी महिला जज नहीं थी.

दवे ने कहा कि ज्यूडिशियल सिस्टम में समाज के हर वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व जरूरी होता है. देश में ज्यादातर जज ऊंची जातियों से आते हैं. उनमें से ज्यादातर कानूनी बिरादरी से जुड़े होते हैं. जब तक आप समाज के अलग-अलग वर्गों से जजों को नियुक्त नहीं करेंगे, तब तक न्याय देने के लिए जरूरी संवेदनशीलता को नहीं समझ पाएंगे.

दवे ने आगे ये भी कहा कि न तो मीडिया और न ही न्यायपालिका ही नागरिकों की रक्षा कर रही है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 12 साल से एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने की भी आलोचना की. कहा कि मीडिया भी उनसे कोई मुश्किल सवाल नहीं पूछता.

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कौन हैं दुष्यंत दवे

70 साल के दुष्यंत दवे ने लंबे समय तक सुप्रीम कोर्ट में वकालत की है. वह सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के तीन बार अध्यक्ष रह चुके हैं. 1978 में उन्होंने गुजरात में वकालत शुरू की थी और 1998 में सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील नामित हुए. 2025 में उन्होंने अचानक वकालत का पेशा पूरी तरह से छोड़ दिया. दवे ने ऐलान किया कि अब वो न तो अदालत में पेश होंगे. न सलाहकार या किसी तरह के मध्यस्थ का ही काम करेंगे. दुष्यंत दवे के पिता जस्टिस अरविंद दवे गुजरात हाईकोर्ट में जज थे. 

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