The Lallantop

'नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम ही नहीं', पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज का अहम बयान

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज सुधांशु धूलिया ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता से जुड़े कई फैसलों में कानून तय किया है. यह 'भारत के चुनाव आयोग का काम नहीं है.'

Advertisement
post-main-image
जस्टिस धूलिया अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए थे. (Courtsey-इंडिया टुडे)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा कि अगर चुनाव आयोग के फैसले केवल मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा लिए जाते हैं तो यह गंभीर मामला हो सकता है, परंतु इसका सत्यापन अभी बाकी है।
  • चुनाव आयोग के मतभेद और आपत्तियां विशेष रूप से मतदाता सूची के सत्यापन प्रक्रिया और चुनाव आयोग के दायित्वों को लेकर सामने आई हैं, जिसमें नागरिकता का निर्धारण आयोग के कार्य क्षेत्र में नहीं माना जाता।
  • इस चर्चा के बाद चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और मतदाता सूची के प्रबंधन पर निगरानी बढ़ने की संभावना है, साथ ही आगामी मामलों में कोर्ट आदेशों के पालन का भी परीक्षण हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धूलिया ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के अंदर मतभेद के दावों पर खुलकर अपनी राय रखी है. उन्होंने कहा कि अगर चुनाव आयोग में फैसले केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ने लिए तो ये काफी 'गंभीर मामला' है. हालांकि उन्होंने कहा कि सच सामने आने तक ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. जस्टिस धूलिया ने यह भी कहा कि ‘नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं' है.

Advertisement

जस्टिस धूलिया अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए थे. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के 'आइडिया एक्सचेंज' में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की आपत्तियों पर बात की. जस्टिस धूलिया से 2025 में बिहार में SIR सुनवाई के दौरान की गई उनकी एक टिप्पणी के बारे में सवाल पूछा गया था. उस सुनवाई में जस्टिस धूलिया ने कहा था,

“नागरिकता का मुद्दा भारत के चुनाव आयोग द्वारा नहीं, बल्कि गृह मंत्रालय द्वारा तय किया जाना चाहिए.”

Advertisement

इसी का जिक्र करते हुए उन्होंने एक्सप्रेस से कहा,  

“यह सुप्रीम कोर्ट के पहले के कई फैसलों में तय किया गया कानून है. यह भारत के चुनाव आयोग का काम नहीं है. लेकिन वोटर को इस देश का नागरिक होना चाहिए. समस्या उन बहुत सारी शर्तों की है, जो लगाई गई हैं. जब मैं मामले की सुनवाई कर रहा था. तब किसी ने स्टे नहीं मांगा था. वे बस आधार और वोटर कार्ड को स्वीकार करने की मांग कर रहे थे. इसलिए हमने कहा ठीक है.”

चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा,

Advertisement

"अगर भारत के चुनाव आयोग के फैसले सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त ही ले रहे थे, जैसा कि 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने बताया, तो यह एक ‘गंभीर मामला’ बन जाता है. लेकिन हमें पता नहीं है और किसी के लिए भी अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी..."

जस्टिस धूलिया से बातचीत में गोवा में 97 मतदाताओं से जुड़ा सवाल भी पूछा गया. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक, ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (यानी रिकॉर्ड में गड़बड़ी या बेमेल जानकारी होना) वाले वोटर्स को सुनवाई का मौका दिया जाना था. इस पर जस्टिस धूलिया ने कहा,

“किसी अदालत के आदेश की अवमानना तभी मानी जाती है, जब यह साबित हो कि आदेश का जानबूझकर और इच्छापूर्वक उल्लंघन किया गया है.”

उन्होंने कहा कि यह भी मुमकिन है कि वे कहें कि चुनाव आयोग ने तो निर्देश दिए थे, लेकिन कुछ निचले स्तर के अधिकारियों ने उनका पालन नहीं किया. ऐसे में कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट की कार्रवाई शुरू करना आसान नहीं.

ये भी पढ़ें: 97 वोटरों के नाम कटने पर बवाल के बाद गोवा CEO ऑफिस की सफाई, ‘कुछ नाम जोड़े गए’

2025 में SIR की सुनवाई में वेकेशन जज थे धूलिया

जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने जुलाई 2025 में बिहार में वोटर लिस्ट के SIR पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. लेकिन बेंच ने चुनाव आयोग से आधार, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे डॉक्यूमेंट्स पर भी विचार करने को कहा था. 

एक्सप्रेस से बातचीत में जस्टिस धूलिया ने स्पष्ट किया कि वह उस समय सिर्फ एक-दो दिन के लिए ‘वेकशन जज’ थे. उनका कहना है कि उनके सामने मामले की पूरी दलीलें नहीं हुई थीं. पूरी सुनवाई और अंतिम निर्णय बाद की बेंच के सामने हुआ. 

वीडियो: 3 दिन की बैंक हड़ताल टली, रात की बैठक में क्या फैसला हुआ?

Advertisement