दिल्ली से बनारस की दूरी करीब 865 किलोमीटर है. अभी ट्रेन से जाओ तो कम से कम 10 से 12 घंटे लगते हैं और गाड़ी से निकलो तो पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के रास्ते भी कम से कम 11-12 घंटे का सफर तय करना ही पड़ता है. लेकिन अब इस पूरी तस्वीर को बदलने की तैयारी पूरी हो चुकी है.
दिल्ली वाराणसी बुलेट ट्रेन का ब्लूप्रिंट तैयार, 1 घंटा 40 मिनट में तय होगी 865 किमी की दूरी, फाइनल रूट जान लीजिए
Delhi-Varanasi Bullet Train: दिल्ली-वाराणसी बुलेट ट्रेन (DVHSR) के फाइनल रूट का ऐलान हो गया है. अब दिल्ली से निकलकर जेवर एयरपोर्ट और लखनऊ होते हुए ये ट्रेन सिर्फ 1 घंटे 40 मिनट में आपको बनारस पहुंचा देगी.


केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दिल्ली-वाराणसी हाई-स्पीड रेल (DVHSR) कॉरिडोर का फाइनल रूट घोषित कर दिया है. प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो यानी PIB के मुताबिक सबसे बड़ी बात ये है कि ये रूट सिर्फ दिल्ली और बनारस को नहीं जोड़ेगा, बल्कि इसके बीच में नोएडा का जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ भी शामिल होंगे. जब ये ट्रेन पटरी पर दौड़ेगी, तो दिल्ली से बनारस का सफर सिर्फ 1 घंटा 40 मिनट का रह जाएगा.
बुलेट ट्रेन से क्या बदलेगा?
दिल्ली-बनारस के बीच का ये बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट सिर्फ दो शहरों के बीच की दूरी कम करने का जरिया नहीं है. ये उत्तर प्रदेश के आर्थिक भूगोल को हमेशा के लिए बदलने वाला कदम साबित हो सकता है. इस रूट में जेवर और लखनऊ को जोड़ने का फैसला बहुत सोच-समझकर लिया गया है. जेवर में बन रहा इंटरनेशनल एयरपोर्ट और लखनऊ में पहले से मौजूद प्रशासनिक और व्यापारिक हब, इन दोनों को एक ही धागे में पिरोने से वेस्टर्न यूपी और ईस्टर्न यूपी के बीच एक मजबूत इकॉनोमिक कॉरिडोर तैयार होगा.
रेल मंत्रालय के मुताबिक जेवर एयरपोर्ट पर उतरने वाला कोई भी विदेशी कारोबारी या पर्यटक चंद मिनटों में लखनऊ या बनारस पहुंच सकेगा. इससे व्यापार में तेजी आएगी, नए स्टार्टअप्स को बढ़ावा मिलेगा और रियल एस्टेट सेक्टर को एक बहुत बड़ा उछाल मिलने की उम्मीद है.
लेकिन इस पूरे शानदार प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा और संवेदनशील पहलू है जमीन अधिग्रहण. करीब 800 किलोमीटर लंबे इस पूरे रूट के लिए उत्तर प्रदेश के दर्जनों जिलों से होकर बुलेट ट्रेन की लाइन गुजरेगी. इसमें गौतम बुद्ध नगर (नोएडा), अलीगढ़, आगरा, कानपुर, लखनऊ, सुल्तानपुर, जौनपुर और वाराणसी जैसे प्रमुख जिले शामिल हैं.
चुनौतियां अभी बाकी है…
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन इलाकों के किसानों की उपजाऊ जमीन को अधिग्रहित करने की होगी. हालांकि, रेल मंत्रालय ने साफ किया है कि इसके लिए मुआवजे का एक पारदर्शी फॉर्मूला तय किया गया है. ग्रामीण इलाकों में सर्किल रेट से चार गुना तक और शहरी क्षेत्रों में सर्किल रेट से दो गुना तक मुआवजा देने का प्रावधान है. ‘नेशनल हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन’ यानी NHSRCL के मुताबिक इसके साथ ही जमीन मालिक के परिवार के एक सदस्य को रोजगार या पुनर्वास भत्ता भी दिया जाएगा ताकि किसी भी तरह का विवाद खड़ा ना हो.
किराया कितना लगेगा?
अब बात करते हैं उस मुद्दे की जो हर आम आदमी के जेहन में घूम रहा है - किराया कितना होगा? क्या बुलेट ट्रेन में सिर्फ कॉरपोरेट क्लास और अमीर लोग ही सफर कर पाएंगे या मिडिल क्लास के लिए भी ये मुमकिन होगा. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने शुरुआती अनुमानों और बिजनेस मॉडल के हवाले से अंदाजा लगाया है कि दिल्ली से वाराणसी का संभावित किराया करीब 3,000 रुपये से लेकर 4,500 रुपये के बीच रहने की उम्मीद है.
‘इंडियन रेलवे इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट’ यानी IRITM के डेटा के मुताबिक अगर बुलेट ट्रेन की अनुमानित किराये की तुलना फ्लाइट टिकट से करें, तो आखिरी वक्त पर टिकट लेने पर फ्लाइट का किराया 5,000 से 7,000 रुपये तक जाता है और उसमें एयरपोर्ट की चेकिंग का वक्त अलग से जुड़ता है. वहीं ट्रेन के थर्ड-एसी का किराया करीब 1,500 रुपये होता है लेकिन समय बहुत ज्यादा लगता है. ऐसे में मिडिल क्लास के कामकाजी लोग, बिजनेसमैन और इमरजेंसी में सफर करने वाले यात्रियों के लिए बुलेट ट्रेन एक बेहतरीन और किफायती विकल्प बनकर उभरेगी.
स्पीड और तकनीक का पूरा लेखा-जोखा
अब बात उस तकनीक की, जिस पर दिल्ली-वाराणसी बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की नींव रखी गई है. पहले इस प्रोजेक्ट के कुछ तकनीकी पहलुओं पर नजर डाल लेते हैं.
तकनीक: बुलेट ट्रेन का ये प्रोजेक्ट आधारित है, जापान की 'शिनकानसेन' (Shinkansen) ई2/ई5 सीरीज तकनीक पर. ‘जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एजेंसी’ यानी JICA के मुताबिक 'शिनकानसेन' तकनीक अपनी सेफ्टी और जीरो एक्सीडेंट रिकॉर्ड के लिए दुनिया भर में मशहूर है.
ऑपरेटिंग स्पीड: इस रूट पर बुलेट ट्रेन की डिजाइन स्पीड 350 किलोमीटर प्रति घंटा होगी. जबकि यह 320 किलोमीटर प्रति घंटा की ऑपरेशनल स्पीड पर चलेगी.
सुरक्षा फीचर्स: ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल (ATC) और भूकंप डिटेक्शन सिस्टम, जो किसी भी तरह के झटके का आभास होते ही ट्रेन को तुरंत रोक देता है.
ट्रैक डिजाइन: इसमें गिट्टी रहित (Ballastless) स्लैब ट्रैक सिस्टम का इस्तेमाल होगा, जिससे ट्रेन बिना किसी कंपन के इतनी तेज रफ्तार पकड़ पाती है.
नेशनल हाईवे-19 बनाम बुलेट ट्रेन
अब जरा सड़क मार्ग, फ्लाइट रूट और बुलेट ट्रेन के बीच एक तुलना करके देखते हैं कि सेफ्टी और पर्यावरण सुरक्षा के मानकों पर कौन-कितना खरा उतरता है. इस इंफोग्राफिक्स के जरिए ये तुलना कुछ ज्यादा आसानी से समझ आएगी.

सोर्स: National Highways Authority of India
पर्यावरण पर असर
भारत सरकार के 'पर्यावण मंत्रालय' की ‘फॉरेस्ट और क्लाइमेट चेंज रिपोर्ट’ के मुताबिक इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा फायदा पर्यावरण को होने जा रहा है. बुलेट ट्रेन पूरी तरह से बिजली से चलेगी, जिसका सीधा मतलब है कि सड़कों से गाड़ियों का लोड कम होगा और कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आएगी. जब लोग सिर्फ पौने दो घंटे में बनारस पहुंच जाएंगे, तो वो अपनी निजी गाड़ियों से लंबा सफर करने से बचेंगे. जेवर और लखनऊ के जुड़ने से उत्तर प्रदेश के विकास की रफ्तार को एक नया गियर मिल गया है, जो आने वाले समय में राज्य की अर्थव्यवस्था को वन ट्रिलियन डॉलर बनाने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा.
ये तो बात हुई दिल्ली और वाराणसी के बीच प्रस्तावित बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की. अगर इसे पढ़कर आपके मन में सवाल उठ रहा हो कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच बन रहे बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट का क्या हुआ तो उसके लिए लल्लनटॉप में हमने एक लेख लिखा है. शीर्षक है- 9 साल का इंतजार, जमीन पर काम और अब रफ्तार की बारी, मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन पर बड़ा अपडेट, पढ़ना हो तो क्लिक करिएगा.
वीडियो: रेल मंत्रालय ने बताया कहां तक पहुंचा है 'बुलेट ट्रेन' का काम















