आने वाले प्रदूषण सीजन से निपटने के लिए प्रशासन ने कड़े नियम तो बना दिए हैं, लेकिन बिल्डर एसोसिएशन के विरोध ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है. दिल्ली-एनसीआर में विंटर सीजन के दौरान हर साल विकराल होने वाले वायु प्रदूषण यानी स्मॉग से निपटने के लिए इस बार भी पाबंदियों की रूपरेखा तैयार हो रही है, जिस पर निर्माण क्षेत्र यानी कंस्ट्रक्शन सेक्टर ने अपनी असहमति और आपत्तियां दर्ज कराई हैं.
सर्दियों से पहले फिर घिरेगी दिल्ली! कंस्ट्रक्शन बैन और नए नियमों के खिलाफ खड़े हो गए हैं बिल्डर्स
Delhi Pollution Crisis: दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों से पहले वायु प्रदूषण से निपटने के लिए बनाए गए नए नियमों और कंस्ट्रक्शन बैन पर बिल्डर्स ने सख्त ऐतराज जताया है.

विकास बनाम सांसों की जंग
ये कहानी है उस दौर की जब सर्दियों की आहट के साथ ही दिल्ली-एनसीआर की हवा भारी होने लगती है और आसमान में धुंध की चादर तन जाती है. एक तरफ शहर की रफ्तार को बनाए रखने वाले रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स हैं तो दूसरी तरफ इस कंक्रीट के जंगल में रहने वाले करोड़ों लोगों की साफ हवा में सांस लेने की बुनियादी जरूरत है.
जब भी पॉल्यूशन का ग्राफ ऊपर जाता है, प्रशासन सबसे पहले निर्माण कार्यों पर हंटर चलाता है. इस बार भी विंटर एक्शन प्लान के तहत कंस्ट्रक्शन पर बैन और नए नियमों की तलवार लटक रही है, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के मुताबिक बिल्डर्स का कहना है कि हर बार इंडस्ट्री को ही क्यों बलि का बकरा बनाया जाता है.
प्रशासनिक पाबंदियां बनाम प्रैक्टिकल दिक्कतें
प्रशासन ने धूल रोकने के लिए एंटी-स्मॉग गन, ग्रीन नेट और वाटर छिड़काव जैसे तमाम कड़े नियम तो बना दिए हैं, लेकिन मैदान पर उतरने पर इनकी असलियत कुछ और ही दिखती है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बिल्डर्स और डेवलपर्स एसोसिएशन का तर्क है कि बार-बार काम रोकने से प्रोजेक्ट की लागत बेतहाशा बढ़ जाती है और लेबर की रोजी-रोटी का संकट अलग से खड़ा हो जाता है. उनका ये भी कहना है कि अगर कुछ साइट्स नियम नहीं मानती हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन पूरी इंडस्ट्री पर बैन लगाना किसी समस्या का प्रैक्टिकल हल नहीं है.
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दावे और हकीकत का जमीनी सच
हर साल सर्दियों से पहले सरकारी विभागों की तरफ से लंबे-चौड़े दावे किए जाते हैं कि इस बार प्रदूषण को काबू में कर लिया जाएगा, लेकिन हकीकत में स्थिति जस की तस बनी रहती है. ‘डाउन टू अर्थ मैगजीन’ की एयर पॉल्यूशन रिपोर्ट्स के मुताबिक एंटी-स्मॉग गन और डस्ट कंट्रोल के नियम कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं और मॉनिटरिंग एजेंसियां खानापूर्ति करके शांत बैठ जाती हैं. इस कागजी घोड़े दौड़ाने की प्रक्रिया का प्रदूषण के ग्राफ पर कोई स्थायी असर नहीं पड़ता है, बल्कि ये सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाती है जिससे आम जनता की सेहत पर रोज बुरा असर पड़ता है.
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