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ईसाई बन चुके आदिवासी गांव में शव नहीं दफना पा रहे, छत्तीसगढ़ में कई जगह लगी रोक

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कई गांवों में ईसाई बन चुके आदिवासियों को शव दफनाने के लिए जमीन देने से मना किया जा रहा है. पुनपल्ली गांव से चुने गए एक जनपद सदस्य ने कहा कि उन्होंने इसे लेकर एक प्रस्ताव भी पारित किया है, जिसमें कहा गया है कि गांव में ईसाई धर्म को मानने वाले आदिवासियों को दफनाने के लिए कोई जमीन नहीं देगा.

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ग्राम सभा ने गांव के आदिवासी ईसाई परिवारों को दफनाने की जमीन देने पर रोक लगाई. (सांकेतिक तस्वीर: PTI)

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  • पुनपल्ली गांव की ग्राम सभा ने 12 प्रस्ताव पारित किए हैं, जिनमें से एक में ईसाई आदिवासियों को गांव में शव दफनाने के लिए जमीन नहीं दी जाएगी।
  • पिछले कुछ महीनों में इर्राबोर से शुरू होकर सुकमा जिले के चार गांवों ने ईसाईयों के शव दफनाने पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव पास किए हैं, जिसे स्थानीय पंचायत ने PESA कानून मानते हुए लागू किया है।
  • यदि प्रस्ताव लागू रहता है, तो प्रभावित ईसाई परिवारों को शव दफनाने के लिए 13 से 40 किलोमीटर दूर अन्य गांव या मुख्यालय जाना होगा, जिससे उनकी धार्मिक प्रथाओं पर प्रभाव पड़ेगा।

‘गांव में धर्म परिवर्तन, प्रार्थना सभाओं या ऐसी ही किसी अन्य गतिविधि के मकसद से पादरियों और ईसाई मिशनरियों के प्रवेश पर सख्त रोक है.’ ये छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुनपल्ली गांव की एंट्री पर लगे बैनर पर लिखा है. सख्त चेतावनी से भरे ऐसे बैनर आपको छत्तीसगढ़ के कई गांवों की एंट्री पर मिल जाएंगे. लेकिन, ईसाई समुदाय के लिए इससे बड़ी चिंता ये है कि कि उनके ही गांवों में उन्हें शव दफनाने से रोका जा रहा है.

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सुकमा की पुनपल्ली ग्राम सभा ने गांव के ईसाई बन चुके आदिवासियों को शव दफनाने के लिए गांव में जमीन देने से मना कर दिया. पंचायत ने कुल 12 प्रस्ताव पारित किए, जिनमें से एक प्रस्ताव गांव के ईसाई परिवारों को शव दफनाने की जगह ना देने का है.

पुनपल्ली गांव से चुने गए जनपद सदस्य मदकम भीमा ने कहा,

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"इसमें (प्रस्तावों में से एक में) कहा गया है कि गांव में ईसाई धर्म को मानने वाले आदिवासियों को दफनाने के लिए कोई जमीन नहीं देगा."

‘शव दफनाने 40 किमी दूर जाना होगा’

इस गाव में ईसाई धर्म को मानने वाले 75 लोगों के कुल 21 परिवार हैं. अगर ये प्रस्ताव लागू होता है, तो इन परिवारों को शव दफनाने के लिए 13 किलोमीटर दूर धोर्नापाल या 40 किलोमीटर से ज्यादा दूर सुकमा मुख्यालय जाना होगा. मदकम भीमा ने कहा कि सुकमा में पुनपल्ली समेत अब तक कुल चार गांवों ने ऐसे प्रस्ताव पास किए हैं. उन्होंने कहा,

"इसकी शुरुआत कुछ महीने पहले इर्राबोर से हुई और उसके बाद मेरे गांव पुनपल्ली में भी ऐसा ही हुआ. धीरे-धीरे सभी गांवों में ऐसा किया जाएगा."

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जब भीमा से फरमान का कानूनी आधार पर पूछा, तो उन्होंने जवाब में PESA कानून का नाम लिया. बोले, "हम PESA कानून का पालन रहे हैं. हम कोई कानून नहीं तोड़ रहे हैं."

क्या है PESA कानून?

PESA यानी पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 एक राष्ट्रीय कानून है. ये संविधान के भाग IX के पंचायती राज प्रावधानों को पांचवीं अनुसूची (5th Schedule) के तहत आने वाले आदिवासी बहुल अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित करता है. इसका मकसद आदिवासी समुदायों को पारंपरिक ग्राम सभाओं के जरिए स्वशासन का अधिकार देना है.

PESA आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन जैसे स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और नियंत्रण का अधिकार देता है. इसके अलावा, इसका मकसद आदिवासियों के सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं और रीति-रिवाजों का पूरा सम्मान करना और उन्हें बचाए रखना है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से बढ़ा हौसला?

बस्तर जिला ग्रामीण ईसाई सेवा समिति के उपाध्यक्ष नुकेश बघेल ने बताया कि बस्तर इलाके में ये कम से कम 10वां गांव है, जो ऐसा कर रहा है. उन्होंने कहा कि कुछ ग्रुप जनवरी 2025 के दफनाने के अधिकारों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं.

इसमें सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की राय एक-दूसरे से अलग थी. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने रमेश बघेल नामक शख्स को अपने दिवंगत ईसाई पादरी पिता का शव बस्तर जिले के अपने पैतृक गांव में निजी कृषि भूमि पर दफनाने की इजाजत दी थी.

दूसरे जज जस्टिस एससी शर्मा का मानना था कि कानूनी नियम इसकी इजाजत नहीं देते. उन्होंने कहा कि करकापाल में तीन-चार गांवों के ईसाइयों के लिए तय किए गए आम कब्रिस्तान में उन्हें शव दफनाना चाहिए. रमेश बघेल को कड़ी सुरक्षा के बीच करकापाल में ही पिता का शव दफनाना पड़ा.

यह भी पढ़ें: कैसे हिंदू से ईसाई बने शख्स की मौत के बाद कफन-दफन की लड़ाई ने समाज के बंटवारे की कहानी खोल दी

इस साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट का एक और फैसला आया. नुकेश बघेल ने उसका जिक्र करते हुए बताया,

"सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में आदिवासी ईसाइयों के शवों को जबरदस्ती कब्र से बाहर निकालने पर अंतरिम रोक लगाने का आदेश दिया था. इसके बाद से गांव वाले हमें शवों को दफनाने ही नहीं दे रहे हैं."

जिला पंचायत अधिकारी ने क्या कहा?

सुकमा जिले के जिला पंचायत CEO मुकुंद ठाकुर से शव दफनाने से मनाही वाले प्रस्ताव के बारे में पूछा गया. CEO ने कहा कि ये एजेंडा में शामिल नहीं था. उन्होंने आगे कहा कि अगर लिखित शिकायत मिलती है, तो लागू नियमों के अनुसार मामले की कानूनी वैधता की जांच करने के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी.

वीडियो: छत्तीसगढ़ में ईसाई और आदिवासी समुदाय क्यों भिड़ गए?

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