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कैसे हिंदू से ईसाई बने शख्स की मौत के बाद कफन-दफन की लड़ाई ने समाज के बंटवारे की कहानी खोल दी

छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक ईसाई की मौत के बाद उनके अंतिम संस्कार पर विवाद हो गया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो फैसला सुनाने में बेंच भी बंट गई.

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Bastar
सुभाष बघेल के बेटे रमेश और उनके परिवार की तस्वीर.
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सौरभ
29 जनवरी 2025 (Published: 07:56 PM IST)
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छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक बेटा अपने पिता का 21 दिन बाद अंतिम संस्कार कर पाया. पिता को दो गज जमीन और सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई देने के लिए बेटा सुप्रीम कोर्ट तक गया, लेकिन मामला ऐसा था कि देश की सर्वोच्च अदालत भी फैसला सुनाने में बंट गई. अंत में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करते हुए बेटे ने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया. क्या है पूरा मामला एक नज़र डालते हैं?

7 जनवरी, 2025 को बस्तर के दरभा तहसील के तहत आने वाले छिंदावाड़ा गांव में लंबी बीमारी के बाद सुभाष बघेल का निधन हो गया था. वह एक ईसाई पादरी थे. उनका जन्म महार जाति के परिवार में हुआ था, लेकिन परिवार ने धर्म परिवर्तन कर लिया था. उनकी मौत के बाद उनके बेटे रमेश बघेल ने गांव के कब्रिस्तान में पिता का अंतिम संस्कार करने की इच्छा जताई. लेकिन गांव के लोगों ने इस पर ऐतराज जता दिया. लोगों ने कहा कि सुभाष ने धर्म बदल लिया था, इसलिए उनका अंतिम संस्कार गांव में नहीं हो सकता.

दरअसल, गांव में भी बड़ी संख्या में लोग सालों से ईसाई धर्म को मानते हैं और इसी परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार भी गांव के पुराने कब्रिस्तान में करते रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों से गांव के हालात बदल चुके हैं. आदिवासी समाज के लोगों और ईसाई धर्म को मानने वालों में वैमनस्य बढ़ने लगा. बात अब अंतिम संस्कार ना होने देने तक पहुंच गई है.

द लल्लनटॉप से बातचीत में बस्तर के पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने कहा,

"बीते कुछ सालों में आपसी विवाद और लड़ाई-झगड़े के कई केस सामने आए हैं. लेकिन पिछले 2 साल से अंतिम संस्कार को लेकर भी विवाद शुरू हो गए हैं. हालांकि, इससे पहले जितने भी इस तरह के विवाद हुए उनमें आधिकारिक तौर पर केस दर्ज नहीं हुआ. आपसी बातचीत से इन मामलों को सुलझा लिया गया था. यह (सुभाष बघेल का) पहला मामला है जो दर्ज हुआ है."

दरअसल, विवाद की जड़ धर्म परिवर्तन बताया जा रहा है. हिंदू धर्म और आदिवासी समाज के कुछ लोगों ने ईसाई धर्म को स्वीकार किया. छत्तीसगढ़ से धर्म परिवर्तन की खबरें दशकों से आती रही हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि धर्म परिवर्तन करने वालों ने धीरे-धीरे आदिवासी समाज के त्योहारों और कार्यक्रमों में भाग लेना बंद कर दिया. यहां तक कि अब कुछ लोग प्रसाद तक नहीं लेते. ऐसे में आदिवासियों और ईसाइयों के बीच पनपती दूरी खाई में तब्दील होती चली गई. और अब बात कफन-दफन तक आ पहुंची है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अब तो हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कुछ मामले ऐसे भी आए जब ईसाई समाज के कुछ लोगों की ‘कब्र खोद कर शव बाहर निकालने की कोशिश’ भी की गई है.

बीबीसी हिंदी से बात करते हुए छिंदावाड़ा गांव की प्रधान के पति मंगतू ने कहा,

"ईसाई आदिवासी परिवारों ने गांव के लोगों से बातचीत बंद कर दी थी. इसलिए जो हमारे साथ नहीं रह सकता, जो हमारे त्योहारों में शामिल नहीं हो सकता, उसे ग्रामीण कैसे अपने गांव में शव दफ़न करने देंगे. यह फैसला सारे आदिवासी समाज ने मिलकर लिया था."

मंगतू ने कहा कि सभी आदिवासी समाज के लोग और हिंदू समाज के लोगों ने मिलकर लगभग एक साल पहले यह फ़ैसला लिया था. उन्होंने कहा कि पहले यहां ईसाई आदिवासियों को शव दफ़न करने की इजाज़त थी, लेकिन अब नहीं है.

जब गांव के लोगों ने सुभाष बघेल का अंतिम संस्कार गांव में करने से मना कर दिया तो उनके बेटे रमेश पुलिस के पास गए. लेकिन वहां बात ना बनती देख उन्होंने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. लेकिन रमेश की बात हाई कोर्ट ने भी नहीं मानी. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा कि गांव में सुभाष के पार्थिव शरीर को दफनाने से ‘अशांति और वैमनस्यता’ फैल सकती है. अदालत ने रमेश को सलाह दी कि वे अपने पिता का अंतिम संस्कार नजदीकी कब्रिस्तान (कारकापाल गांव) में करें.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में राज्य सरकार ने भी सुझाव दिया कि शव को कारकापाल के ईसाई कब्रिस्तान में दफनाया जाए. इसके लिए सरकार ने सुरक्षा और शव को ले जाने के लिए एंबुलेंस की भी व्यवस्था करने की पेशकश की.

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा केस

हाई कोर्ट का फैसला पक्ष में ना आने के बाद बघेल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. उन्होंने दलील दी कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों को भी उसी गांव के कब्रिस्तान में दफनाया गया था, तो अब उनके पिता को वहां दफनाने में दिक्कत क्यों हो रही है?

पादरी के अंतिम संस्कार को लेकर चल रही खींचतान पर सुप्रीम कोर्ट ने 27 जनवरी को अपना फैसला सुनाया.  जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अपने फैसले में प्रशासन को निर्देश दिया कि पादरी सुभाष बघेल का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव छिंदावाड़ा में उनके निजी कृषि भूमि में करने की अनुमति दी जाए. लेकिन बेंच के दूसरे जज, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा इस फैसले से सहमत नहीं थे. उन्होंने अपने अलग निर्णय में कहा कि पादरी का अंतिम संस्कार कारकापाल के ईसाई कब्रिस्तान में ही किया जाए.

हालांकि पीठ में इस बात पर सहमति नहीं बन पाई कि अपीलकर्ता के पिता का अंतिम संस्कार कहां हो, लेकिन एक बात तय रही- अब और देर नहीं होनी चाहिए. पादरी का शव 7 जनवरी से शवगृह में पड़ा है, और इस मामले में ‘शीघ्र और सम्मानजनक अंतिम संस्कार’ जरूरी है.

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत निर्देश जारी कर दिए हैं. आदेश में कहा गया कि — सुभाष बघेल का अंतिम संस्कार करकापाल गांव के कब्रिस्तान में ही होगा. यह गांव अपीलकर्ता के पैतृक गांव छिंदवाड़ा से 20-25 किलोमीटर दूर है, जहां ईसाइयों के लिए अलग कब्रिस्तान की सुविधा है.

पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद परिवार ने आदेश मान लिया और 27 जनवरी की शाम सुभाष बघेल का अंतिम संस्कार करकापाल के कब्रिस्तान में कर दिया गया.

वीडियो: धर्म परिवर्तन कर Christian बनी महिला ने ST Reservation मांगा, सुप्रीम कोर्ट ने ये कह दिया

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