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क्या आपका डॉक्टर भी AI से पूछकर दवा लिखता है? ये रिपोर्ट टेंशन बढ़ा देगी

AI Use In Healthcare: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मौजूदा दौर की सच्चाई है और इसका इस्तेमाल आज हर क्षेत्र में हो रहा है. खास बात यह है कि भारत में डॉक्टर और मेडिकल पेशे से जुड़े लोग भी AI का इस्तेमाल कर रहे हैं.

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चैटजीपीटी जैसे LLM टूल्स का इस्तेमाल कर रहे 48% डॉक्टर्स

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  • भारत में लगभग 48% डॉक्टर और 71% नर्सें सामान्य AI टूल्स जैसे ChatGPT का क्लिनिकल कामों में इस्तेमाल कर रही हैं, जबकि केवल 26% डॉक्टर मेडिकल AI प्लेटफॉर्म का नियमित उपयोग करते हैं।
  • AI चैटबॉट्स का व्यापक उपयोग ऐसा है जो मेडिकल जरूरतों के अनुसार विकसित नहीं किए गए हैं, और इसके बावजूद गैर-विशेषीकृत AI टूल्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, जिससे विशेषज्ञों ने सुरक्षा संबंधी चिंता जताई है।
  • AI के गलत इस्तेमाल से होने वाली चिकित्सा त्रुटियों की पूरी जिम्मेदारी डॉक्टरों पर रहेगी, और मरीज-डॉक्टर की व्यक्तिगत बातचीत को इलाज के लिए जरूरी बताया गया है, जिससे कानूनी जवाबदेही के मुद्दे उठते हैं।

क्या भारत में डॉक्टर तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर निर्भर होते जा रहे हैं? वे इसका इस्तेमाल मेडिकल स्टडी से लेकर क्लीनिकल नोट्स बनाने और पेशेंट को जागरूक करने तक में कर रहे हैं. यहां तक कि इलाज के प्रोसेस में AI का इस्तेमाल किया जा रहा है. मेडिकल फील्ड के एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये ट्रेंड टेंशन बढ़ाने वाला है.

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बहुत से क्लिनिक्स में आम बीमारियों से जुड़ी जेनरिक दवाइयां लिखने के लिए भी एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल हो रहा है. दिलचस्प बात यह है कि इन चैटबॉट्स को मेडिकल जरूरतों और नॉलेज के साथ डेवलेप ही नहीं किया गया है. इसके बावजूद इनका इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है. इस ट्रेंड पर हेल्थ एक्सपर्ट्स ने चिंता जताई है.

AI चैटबॉट्स का हो रहा धड़ल्ले से इस्तेमाल

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साइंटिफिक पब्लिशर Elsevier के नए ग्लोबल सर्वे में पता चला है कि भविष्य में भारतीय क्लिनिक्स में एआई का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होने वाला है. ज्यादातर क्लिनिक्स में मेडिकल दस्तावेजों और स्टडी मटेरियल से तैयार किए गए एआई प्लेटफॉर्म्स के बजाय लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) का इस्तेमाल हो रहा है. 

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डॉक्टर और नर्स दोनों कर रहे AI का इस्तेमाल

क्लिनिशियन ऑफ द फ्यूचर 2026 रिपोर्ट (Clinician of the Future 2026 report) के अनुसार, सर्वे में शामिल 48% डॉक्टर और क्लिनिशियन ने स्वीकार किया है कि वे अपने काम में AI का इस्तेमाल करते हैं. रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 54% डॉक्टर्स ने अक्सर या हमेशा सामान्य AI टूल्स (जैसे ChatGPT वगैरह) इस्तेमाल करने की बात मानी है. सिर्फ 26% डॉक्टर्स ने ही माना कि वे मेडिकल काम के लिए बने AI प्लेटफॉर्म का नियमित इस्तेमाल करते हैं.

डॉक्टर ही नहीं, मेडिकल पेशे से जुड़े दूसरे लोग भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल में पीछे नहीं हैं. 71% नर्सों ने भी माना कि वे सामान्य AI टूल्स पर भरोसा करती हैं. सर्वे में 46% नर्सों ने यह भी कहा कि वह अपने कामकाज के लिए खास सिस्टम (मेडिकल से जुड़े चैटबॉट्स वगैरह) भी इस्तेमाल कर रही हैं.

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हेल्थकेयर एक्सपर्ट्स ने जताई चिंता

हेल्थकेयर एक्सपर्ट्स का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक के साथ मेडिकल प्रोफेशन के लोग सहजता से जुड़ रहे हैं. हालांकि, मरीजों की सुरक्षा के लिहाज़ से यह ट्रेंड खतरनाक भी साबित हो सकता है. Elsevier के लीड क्लिनिकल एक्जीक्यूटिव डॉक्टर राहुल गोयल भारत, UK, यूरोप और पश्चिम एशिया में काम कर चुके हैं. उन्होंने TOI से बात करते हुए इस पैटर्न पर चिंता जताई.

डॉ. राहुल ने कहा, 

'बहुत से मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े लोग अब क्लिनिकल कामों के लिए ChatGPT या Claude जैसे सामान्य LLM टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये टूल्स किसी भी तरह से मेडिकल फैसले लेने के लिए कभी बनाए ही नहीं गए थे. ये सच है कि इन LLM टूल्स से किसी भी सवाल का जवाब चुटकी में मिल जाता है. लेकिन यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि आत्मविश्वास के साथ दिया जाने वाला हर जवाब हमेशा सही नहीं होता है.'

AI से मिली सभी जानकारी सटीक और तथ्यपरक नहीं

डॉ. राहुल गोयल ने कहा कि सामान्य चैटबॉट्स (जैसे ChatGPT वगैरा) इंटरनेट पर मौजूद हर तरह की जानकारी का इस्तेमाल कर सकता है. इसमें गैर-विश्वसनीय स्रोत और फर्जी रिव्यू जैसी चीजें भी शामिल हो सकती हैं. राहुल गोयल आगे कहते हैं, 

'ClinicalKey AI जैसे टूल्स को ट्रेंड किया गया है. इन टूल्स को ट्रेनिंग देने के लिए मेडिकल नॉलेज, मेडिसिन से जुड़ी किताबों, जर्नल्स, क्लिनिकल गाइडलाइंस और टेक्निकल ट्रेनिंग वगैरह का इस्तेमाल हुआ है. अगर किसी मामले में पर्याप्त कॉन्टेंट और तथ्यपरक साक्ष्य नहीं होते हैं, तो स्पष्ट रूप से इसकी जानकारी देते हैं. ये ट्रेंड एआई मनगढंत या अपुष्ट जानकारी नहीं देते हैं.'

डॉक्टर राहुल गोयल ने कहा कि मरीज और डॉक्टर के आमने-सामने बैठकर बात करना महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा, 'मरीज जब डॉक्टर के पास बैठकर अपनी बीमारी के बारे में विस्तार से बताते हैं, तो उसका असर अलग होता है. इसके आधार पर डॉक्टर इलाज करते हैं. एआई चैटबॉट्स और मरीज-डॉक्टर की बातचीत के आधार पर इलाज के बीच का अंतर बहुत महत्वपूर्ण है.' 

उन्होंने यह भी कहा कि अगर एआई कोई गलत जानकारी देता है और इसकी वजह से मरीज को मुश्किल हुई, तो कानूनी तौर पर सारी जिम्मेदारी डॉक्टर की बनती है. एआई के ऊपर कभी भी इस तरह की जवाबदेही नहीं बन सकती. डॉक्टर राहुल ने कहा कि इसे “liability sink” (जवाबदेही का क्रम) कहा जाता है. एआई से मिली गलत सलाह को बिना सुधार किए इस्तेमाल करने पर जवाबदेही डॉक्टर की ही बनती है.

यह सर्वे एक ऐसे समय में सामने आया है जब AI तेजी से दुनिया भर के अस्पतालों में इस्तेमाल होने लगा है. Elsevier की 118 देशों के 2,757 क्लिनिशियंस पर किए सर्वे में यह भी सामने आया है कि वैश्विक स्तर पर 49% क्लिनिशियन अपने काम में AI का इस्तेमाल कर रहे हैं. 80% मेडिकल प्रोफेशनल्स का मानना है कि आने वाले 10 साल में स्वास्थ्य सेवाओं में AI का इस्तेमाल बहुत बड़े पैमाने पर होगा. 

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