बिहार में सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले छात्रों का गुस्सा एक बार फिर सड़कों पर है. पटना में 25 अगस्त को छात्रों के प्रदर्शन ने उस वक्त बड़ा रूप ले लिया, जब गांधी मैदान से मुख्यमंत्री आवास और राजभवन की तरफ बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रोकने की कोशिश की. हालात बिगड़े तो पुलिस ने वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया.
BPSC छात्रों का गुस्सा क्यों नहीं थम रहा? परीक्षा विवाद से सड़क तक पहुंची पूरी कहानी
बिहार में BPSC और TRE-4 को लेकर छात्रों का आंदोलन क्यों तेज हो गया है? 70वीं BPSC परीक्षा पर विवाद, TRE-4 के परीक्षा पैटर्न, निगेटिव मार्किंग, डोमिसाइल की मांग, BPSC के जवाब, सरकार की पहल, पुलिस कार्रवाई और बिहार में सरकारी नौकरी के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा की पूरी कहानी समझिए.

लेकिन कहानी सिर्फ एक दिन के प्रदर्शन की नहीं है. इसके पीछे BPSC की 70वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा को लेकर पुराना विवाद है और साथ ही शिक्षक भर्ती परीक्षा TRE-4 के नियमों को लेकर नई नाराजगी भी जुड़ गई है. यानी बिहार के छात्रों का गुस्सा अब किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं रह गया है.
विवाद शुरू कैसे हुआ?
70वीं BPSC परीक्षा को लेकर विवाद दिसंबर 2024 में उस समय तेज हुआ, जब पटना के बापू परीक्षा परिसर में प्रश्नपत्र बांटने में देरी और परीक्षा प्रक्रिया को लेकर हंगामा हुआ. इस केंद्र की परीक्षा बाद में रद्द कर दी गई और दोबारा परीक्षा कराई गई. इसके बाद छात्रों के एक हिस्से ने आरोप लगाया कि अलग-अलग परिस्थितियों में परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों के साथ समान व्यवहार नहीं हुआ.
यही विवाद आगे बढ़ते-बढ़ते परीक्षा रद्द करने की मांग तक पहुंच गया. 2026 में भी प्रदर्शनकारी 70वीं BPSC परीक्षा को रद्द करने की मांग उठा रहे हैं.
यहां एक जरूरी बात समझनी होगी. छात्रों के आरोप और किसी आरोप का आधिकारिक रूप से साबित होना दो अलग बातें हैं. पेपर लीक या व्यापक अनियमितता के दावे को रिपोर्ट करते समय इन्हें आरोप के तौर पर ही देखना जरूरी है.
फिर TRE-4 इसमें कैसे जुड़ गया?
मौजूदा आंदोलन का दूसरा बड़ा हिस्सा बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा TRE-4 है. BPSC के आधिकारिक परीक्षा कैलेंडर के मुताबिक TRE-4 में 46,595 पद हैं और परीक्षा 22 से 27 सितंबर 2026 के बीच प्रस्तावित है.
छात्र परीक्षा के पैटर्न और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े कई बदलावों का विरोध कर रहे हैं. उनकी मांगों में एक चरण की परीक्षा, निगेटिव मार्किंग हटाना और बिहार के अभ्यर्थियों के लिए 100 फीसदी डोमिसाइल आधारित भर्ती जैसी बातें शामिल हैं.
BPSC का पक्ष इससे अलग है. आयोग ने साफ किया है कि उसकी ऑब्जेक्टिव परीक्षाओं में निगेटिव मार्किंग हटाने की मांग स्वीकार नहीं की जाएगी और आगे परीक्षाएं कम से कम दो चरणों में कराने की नीति रहेगी.
यानी छात्रों को लगता है कि परीक्षा व्यवस्था उनके लिए और कठिन बनाई जा रही है, जबकि आयोग का तर्क परीक्षा को व्यवस्थित और निष्पक्ष तरीके से कराने का है.
BPSC अधिकारी के बयान ने आग और बढ़ा दी
विवाद के बीच BPSC परीक्षा नियंत्रक राजेश कुमार सिंह की एक टिप्पणी ने भी छात्रों की नाराजगी बढ़ा दी. मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने "हाथी चले बाजार, कुत्ता भौंके हजार" कहावत का इस्तेमाल किया. बाद में इस बयान को लेकर तीखी राजनीतिक और छात्र प्रतिक्रिया सामने आई.
इसके बाद मामला सिर्फ परीक्षा के नियमों का नहीं रहा. छात्रों को लगा कि उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा. दूसरी तरफ आयोग और सरकार का कहना है कि छात्रों की कई समस्याओं पर कार्रवाई की जा रही है.
सरकार क्या कह रही है?
बिहार सरकार ने छात्रों की शिकायतों को सुनने के लिए हर महीने विद्यार्थी सहयोग शिविर आयोजित करने और शिकायतों के समाधान की व्यवस्था करने की घोषणा की है. सरकार की तरफ से 1100 हेल्पलाइन की भी जानकारी दी गई है.
लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हुआ. यही बताता है कि छात्रों के बीच भरोसे की समस्या केवल किसी एक घोषणा से दूर नहीं हो रही.
पुलिस कार्रवाई पर क्यों मचा बवाल?
25 अगस्त को प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव के बाद वॉटर कैनन का इस्तेमाल हुआ और कुछ छात्रों को हिरासत में लिया गया. रिपोर्टों के मुताबिक पुलिसकर्मी भी घायल हुए. बाद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पुलिस कार्रवाई को लेकर बिहार सरकार पर निशाना साधा और छात्रों की शिकायतों पर बातचीत की मांग की.
यहीं से BPSC विवाद चुनावी राजनीति से भी जुड़ने लगा है. बिहार में विधानसभा चुनावी माहौल के बीच रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं का सवाल सीधे युवा मतदाताओं से जुड़ा हुआ है.
सरकारी नौकरी के लिए इतना बड़ा संघर्ष क्यों?
बिहार में सरकारी नौकरी सिर्फ नौकरी नहीं है. बड़ी आबादी के लिए ये स्थिर आय, सामाजिक सम्मान और परिवार की आर्थिक सुरक्षा का रास्ता है. इसलिए जब किसी परीक्षा की तारीख, पैटर्न, परिणाम या भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठता है तो उसका असर हजारों परिवारों तक जाता है.
आंकड़े भी युवाओं के रोजगार संकट की तस्वीर दिखाते हैं. केंद्र सरकार के PLFS 2025 के मुताबिक बिहार में 15 से 29 साल के युवाओं की बेरोजगारी दर 12.1 फीसदी थी. शहरी बिहार में इसी आयु वर्ग की दर 31.3 फीसदी दर्ज की गई.
ऐसे माहौल में सरकारी भर्ती परीक्षा सिर्फ एक प्रतियोगी परीक्षा नहीं रहती. वो युवाओं के लिए भविष्य का बड़ा दांव बन जाती है.
असली सवाल अब क्या है?
BPSC छात्रों का मौजूदा आंदोलन इसलिए बड़ा है क्योंकि इसमें तीन अलग-अलग सवाल एक जगह आ गए हैं. परीक्षा की विश्वसनीयता, भर्ती प्रक्रिया के नियम और रोजगार की चिंता.
सरकार के सामने चुनौती सिर्फ परीक्षा कराना नहीं है. चुनौती ये भरोसा कायम करना है कि परीक्षा निष्पक्ष होगी, नियम पहले से स्पष्ट होंगे और शिकायत होने पर उम्मीदवारों को सुना जाएगा.
और छात्रों के सामने भी एक बड़ा सवाल है. आंदोलन की ताकत तभी लंबे समय तक असरदार होगी, जब उनकी मांगें स्पष्ट, तथ्य आधारित और परीक्षा व्यवस्था में व्यावहारिक सुधार से जुड़ी हों.
फिलहाल इतना साफ है कि बिहार में BPSC का विवाद केवल एक परीक्षा का विवाद नहीं रह गया है. ये रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और युवाओं के भरोसे का सवाल बन चुका है. आने वाले दिनों में TRE-4 और 70वीं BPSC से जुड़े फैसले तय करेंगे कि ये गुस्सा बातचीत की मेज तक पहुंचता है या बिहार की चुनावी राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बनता है.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: BPSC प्रोटेस्ट के बीच छात्रों और सरकार की बातचीत में क्या निकला?












