असम की मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा समेत सूबे का सारा सरकारी महकमा परेशान है. परेशानी की वजह भी कोई छोटी मोटी नहीं है. आलम ये है कि असम सरकार ने इस मुसीबत को ‘सख्ती’ से कुचलने में पूरी ताकत लगा दी है.
क्या असम बन रहा है नशे का नया हब? हिमंता सरकार के एक्शन पर क्यों उठे सवाल
Assam's Drug Menace: असम में म्यांमार के रास्ते आने वाले ड्रग्स का खतरा दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है. आलम ये हो गया है कि खुद सूबे के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा को एंटी ड्रग्स मुहिम की कमान संभालनी पड़ रही है.


इस मुसीबत नाम है ‘ड्रग्स’, जिसके चलते पूर्वोत्तर का ये सबसे बड़ा सूबा ‘उड़ता असम’ बनने की कगार पर है! शायद यही वजह है कि ड्रग्स को खिलाफ इस जंग में खुद सीएम हिमंता कूद पड़े हैं और सरेआम नशीली दवाओं पर रोड रोलर चलाते नजर आ रहे हैं.
कैसे हुई मुसीबत की शुरुआत
असल में, ये सब शुरू होता है 'गोल्डन ट्राएंगल' से... 'गोल्डन ट्राएंगल' यानी म्यांमार, लाओस और थाईलैंड का वो इलाका जहां दुनिया की सबसे ज्यादा हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स बनती है. म्यांमार में जब से सैन्य तख्तापलट हुआ और गृहयुद्ध छिड़ा है, वहां की कानून-व्यवस्था का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है.
‘द एशियन ट्रिब्यून’ के मुताबिक इसी अराजकता का फायदा ड्रग माफिया उठा रहे हैं. म्यांमार की ढीली पड़ी सीमाओं से हेरोइन की खेपें मणिपुर और मिजोरम के रास्ते बेरोकटोक भारत में दाखिल हो रही हैं.
असम ही क्यों?
अब सवाल उठता है कि असम को ही क्यों चुना गया? जवाब है प्रदेश की लोकेशन. असम पूरे पूर्वोत्तर का 'ट्रांजिट हब' है. जो भी माल मणिपुर या मिजोरम से आता है, उसे देश के बाकी हिस्सों यानी कोलकाता, दिल्ली या मुंबई तक पहुंचने के लिए असम के 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' से होकर गुजरना पड़ता है.
‘ईस्ट मोजो’ की रिपोर्ट के मुताबिक ड्रग तस्करों के लिए असम सिर्फ एक बाजार भर नहीं रह गया. बल्कि भारत की मुख्य भूमि तक पहुंचने का सबसे बड़ा रास्ता बन गया है. यही वजह है कि असम पुलिस के लिए ये एक बड़ी चुनौती बन गई है.
नशे की लत और असम का यूथ
अब बात करते हैं युवाओं की. असम के चाय बागान इलाकों और सीमावर्ती जिलों में नशा एक महामारी की तरह फैल चुका है. समाचार एजेंसी ANI की कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि युवाओं के हाथ में काम की जगह इंजेक्शन और ड्रग्स की पुड़िया आ रही है.
जानकारों का मानना है कि अगर इसे अभी नहीं रोका गया, तो आने वाली एक पूरी पीढ़ी तबाह हो जाएगी. इसी जनसांख्यिकीय (Demographic) खतरे को भांपते हुए हिमंत बिस्वा सरमा ने पुलिस को खुली छूट दी है. उन्होंने साफ कहा है कि ड्रग्स के खिलाफ कार्रवाई में कोई रहम नहीं दिखाया जाएगा.
सरकारी एक्शन पर सवालिया निशान?
असम सरकार के इस 'सख्त' एक्शन पर सवाल भी उठ रहे हैं. ‘एशियन ट्रिब्यून’ के मुताबिक विपक्ष और मानवाधिकार कार्यकर्ता अक्सर इस बात को उठाते हैं कि इस तरह की सख्त कार्रवाई में एनकाउंटर और पुलिस की ज्यादतियों की खबरें भी सामने आती हैं. क्या कानून की प्रक्रिया का पालन हो रहा है या फिर ये सिर्फ आंकड़ों का खेल है? असम सरकार का तर्क है कि ड्रग्स माफिया इतने ताकतवर हो चुके हैं कि उनके खिलाफ सामान्य कानून काफी नहीं हैं, इसलिए पुलिस को सख्त रुख अपनाना पड़ रहा है.
ड्रग्स का आतंकी कनेक्शन
ये स्थिति सिर्फ अपराध की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की है. ‘नॉरकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो’ की रिपोर्ट कहती है कि जब म्यांमार से ड्रग्स के जरिए पैसा आता है, तो अक्सर उसका इस्तेमाल उग्रवादी संगठनों को हथियार खरीदने के लिए किया जाता है. यानी ये नशा न सिर्फ युवाओं को मार रहा है, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है.
असम पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कुछ समय में भारी मात्रा में हेरोइन, याबा टैबलेट और अन्य नशीले पदार्थों की बरामदगी हुई है, जो इस बात का सबूत है कि तस्करी का जाल कितना गहरा है.
अब आगे क्या होगा
असम का फ्यूचर इस बात पर निर्भर करता है कि वो इस 'ड्रग्स के समंदर' को कैसे रोकता है. क्या हिमंत सरकार का ये मॉडल काम करेगा, या ये सिर्फ एक और चुनावी मुद्दा बनकर रह जाएगा? एक बात तो साफ है, अगर असम नहीं संभला, तो पूरा पूर्वोत्तर एक ऐसे नशे के चक्रव्यूह में फंस जाएगा, जहां से निकलना मुमकिन नहीं होगा.
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