1980 दशक का पंजाब. खालिस्तानी आतंकवाद के असर वाले वो दिन कितने भयानक थे, ये ठीक-ठीक वही जान सकता है, जिसने उन्हें झेला हो. हत्या उन दिनों आम बात हो गई थी. ये दौर काटने के बाद 90 का दौर भी आया, जिस पर दिलजीत दोसांझ की नई फिल्म ‘सतलुज’ आई है.
जब खालिस्तानी आतंकियों के फरमान पर पंजाब में हजारों कुत्ते कत्ल किए गए
1980-90 के दशक में पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद के दौरान सिर्फ इंसान ही नहीं, हजारों कुत्ते भी हिंसा का शिकार बने. आतंकियों का मानना था कि कुत्तों के भौंकने से सुरक्षाबलों या उनकी गतिविधियों का पता चल जाता है, इसलिए उन्हें मारने के फरमान जारी किए गए.


जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी लेकर चलने वाली इस फिल्म में दिखाया गया कि कैसे आतंकवाद के सफाये के नाम पर निर्दोष और मासूम लोगों की हत्या की गई. मरने-मारने के उन दिनों के पीड़ितों की गिनती हम कैसे करते हैं? कितने आतंकी मारे गए? कितने पुलिस वालों की जानें गईं? कितने हिंदू, कितने सिख या कितने मुसलमान मारे गए? इसी तरह से न!
हमारे इंसाफ की लड़ाई में यही गिनतियां काम आती हैं. लेकिन ऐसी गिनतियों में एक निर्दोष प्राणी हमेशा छोड़ दिया जाता है. वही प्राणी जो इंसानों के सबसे ज्यादा करीब माना जाता है. वफादारी जिसके स्वभाव से अपना अर्थ पाती है. जो खतरे को सूंघ तो लेता है लेकिन ये नहीं जानता कि आतंकवादी कौन है और पुलिस कौन? उसे बचाने वाला कौन है? मारने वाला कौन? उसे ये भी नहीं पता कि कैसे वफादारी उसके लिए मौत का फंदा बन जाती है और इंसानी डर कैसे उसके जीने का अधिकार छीन लेता है.
हम पंजाब के उन कुत्तों की बात कर रहे हैं, जो खालिस्तानी आतंकवादियों के फरमान के बाद बेवजह की मौत मारे गए. सिर्फ इसलिए कि उनकी स्वाभाविक भौंकने की आदत इंसानों के डर और दहशत की भावना से तालमेल नहीं बैठा पाई.
इंडिया टुडे से जुड़े धीरेंद्र राय ने एक रिपोर्ट लिखी है. इसमें उन्होंने आतंकवादियों की कुत्तों से दुश्मनी इंसानी क्रूरता को सबसे दर्दनाक चैप्टर में से एक बताया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, जिस समय पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद अपने चरम पर था, तब सिर्फ इंसान नहीं मारे जा रहे थे. गलियों में घूमने वाले हजारों आवारा कुत्तों को भी गोली मारी गई थी. कुछ पालतू कुत्तों को उनके मालिकों ने ही मार दिया. किसी ने जहर दिया. किसी ने गोली मारी. क्योंकि आतंकवादियों ने उन्हें ऐसा ही करने के लिए कहा था.
क्यों करते थे ऐसा?रिपोर्ट के अनुसार, खालिस्तानी आतंकवादी कुत्तों को 'सुरक्षाबलों का अनौपचारिक मुखबिर' मानते थे. रात के अंधेरे में जब सुरक्षाबल गश्त करते थे या आतंकवादी गांवों में छिपने के लिए भागते थे तो कुत्तों का भौंकना उनकी मौजूदगी का पता दे देता था. अपनी पहचान और गतिविधियों को गुप्त रखने के लिए आतंकवादियों ने पंजाब के गांवों में कुत्तों को खत्म करने का अभियान चलाया था. ये मूक जानवर अचानक सिर्फ अपनी वफादारी की सबसे भयानक कीमत चुका रहे थे. दुख की बात ये थी कि कुत्तों के शवों को सम्मानित विदाई के लिए सतलुज नदी भी नहीं मिली.
इंडिया टुडे पत्रिका के लिए 1991 में ‘पंजाब का उग्रवाद’ कवर कर रहे पत्रकार शेखर गुप्ता की 'बंदूक का राज' शीर्षक वाली ग्राउंड रिपोर्ट भी इस त्रासदी की पुष्टि करती है. 15 जून 1991 के अंक में पंजाब के हालात का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा,
आतंक अक्सर सूर्यास्त का पर्याय बन जाता है. भयानक अंधेरे सन्नाटे में साफ महसूस होता है. आतंकवादियों के फरमान पर टेलीविजन बंद हैं. रेडियो और टू-इन-वन डिवाइस शांत हैं क्योंकि ज्यादातर संगीत को घटिया घोषित कर दिया गया है. कुत्ते भी शांत हैं. कुछ को गोली मार दी गई है. कुछ को जहर दे दिया गया है. ज्यादातर उनके ही मालिकों ने ऐसा किया. अगर आतंकवादी कहते हैं कि अपने कुत्तों को मार डालो तो आप उन्हें मार देते हैं. या, अगर सशस्त्र गिरोह आपकी गलियों में घूमते हैं और आपका कुत्ता जरा-सी भी आवाज निकालता है तो वे शायद आपको ही गोली मार दें. कौन जाने वे क्या करेंगे. कोई नहीं जानता.
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खालिस्तानी देते थे फरमानपंजाबी लेखक वारयाम सिंह संधू ने उन दिनों के हालात पर एक लघु कहानी ‘चौथी कूट’ (द फोर्थ डायरेक्शन) लिखी थी. इस पर उन्हें साहित्य अकादमी भी मिला. बाद में इस पर फिल्म भी बनी. इस फिल्म में भी आतंकवाद से प्रभावित पंजाब में कुत्तों के हालात का जिक्र है. ये कहानी काल्पनिक नहीं है. यह वारयाम संधू के भाई के परिवार से जुड़ी एक बेहद दर्दनाक और सच्ची घटना पर आधारित है. उस दौर को याद करते हुए एक इंटरव्यू में वारयाम सिंह संधू ने कहा,
मेरे भाई, उनकी पत्नी और उनके बच्चे अपने दो पालतू कुत्तों से बहुत प्यार करते थे. लेकिन एक दिन खालिस्तानियों की तरफ से एक फरमान आया कि इन कुत्तों को तुरंत मार दिया जाए. काम को 'आसान' बनाने के लिए उन्होंने परिवार के पास साइनाइड की गोलियां छोड़ दीं, जिन्हें दही में मिलाकर कुत्तों को खिलाना था. इंसान और जानवर की जिंदगी के इस क्रूर चुनाव में अंततः जानवर की ही हार हुई.
संधू कहते हैं कि इस घटना से मुझे जो पीड़ा हुई, वह राजनीति और सांप्रदायिक पहचान की लड़ाइयों से कहीं बढ़कर थी. यह मानवता के लुप्त होते जाने का दर्द था.
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