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'खुद को कानून से ऊपर समझ रही UP पुलिस', SC के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फटकारा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर में FIR दर्ज होने से पहले एक व्यक्ति को हिरासत में लेने और गिरफ्तारी की प्रक्रिया में गड़बड़ियों को लेकर यूपी पुलिस को फटकार लगाई है.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस को फटकार लगाई है. (फोटो- India Today)

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  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की गिरफ्तारी और हिरासत प्रक्रिया में कानूनी नियमों के उल्लंघन को अवैध करार देते हुए आरोपियों को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है।
  • 23 अगस्त 2026 को गौतमबुद्ध नगर में दो समूहों के बीच हिंसक झड़प के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज होने से पहले ही दीपक सहित चार अन्य को हिरासत में लिया था, जिससे कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ।
  • हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यशैली पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि दस्तावेजों में कई तारीखों और हस्ताक्षरों की गड़बड़ियों के कारण गिरफ्तारी की वैधता पर सवाल उठे हैं, और आगे सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है. पुलिस के काम करने के तरीके पर नाराजगी जाहिर करते हुए कोर्ट ने कहा कि वो खुद को कानून से ऊपर समझकर काम करती दिख रही है और ये बेहद चिंताजनक है. अदालत ने एफआईआर दर्ज होने से पहले गिरफ्तारी और हिरासत के मामले को अवैध करार दिया और कहा कि अगर आरोपी अन्य मामलो में वांटेड नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए.

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इंडिया टुडे से जुड़े आनंद राज की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कहा कि बार-बार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी अनिवार्य शर्तों का सही तरीके से पालन नहीं किया जाता. दस्तावेज महज औपचारिकता के तौर पर तैयार किए जाते हैं और उनमें ऐसी गलतियां होती हैं जो हिरासत और गिरफ्तारी की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं.

क्या है मामला

ये मामला गौतमबुद्ध नगर का है. 23 अगस्त 2026 को दो समूहों के बीच हिंसक झड़प हुई थी. दीपक और चार अन्य लोगों को बीएनएस की धाराओं 126, 135 और 170 के तहत हिरासत में लिया गया था. रात 9:39 बजे लिखित शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई. इसके बाद इस एफआईआर में दीपक को 24 अगस्त की दोपहर 3 बजे के आसपास औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया गया. हालांकि, घटनाक्रम से साफ था कि एफआईआर दर्ज होने से पहले ही पुलिस उन्हें हिरासत में ले चुकी थी. बाद में उसी हिरासत के दौरान उनकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाई गई.

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हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस ने तय कानूनी प्रक्रिया का भी पालन नहीं किया. इसके अलावा, जांच अधिकारी ने 23 अगस्त की तारीख वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए, जबकि उसमें गिरफ्तारी की तारीख 24 अगस्त लिखी गई थी. व्यक्तिगत तलाशी और जब्ती से संबंधित दस्तावेज में भी 2 जगहों पर अधिकारी के हस्ताक्षर के साथ 23 अगस्त की तारीख दर्ज थी.

जांच अधिकारी ने इन गड़बड़ियों को तारीख लिखने में हुई गलतियां बताया लेकिन हाईकोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ. कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों में 5 जगहों पर तारीखों की गड़बड़ी थी और उन्हें न तो ठीक किया गया और न ही गलती सुधार को प्रमाणित किया गया. बेंच ने निवारक कार्रवाई से संबंधित दस्तावेजों में भी कमियां पाईं. बॉन्ड में राशि का कॉलम खाली था और उस पर यह साफ करने के लिए आवश्यक हस्ताक्षर, तारीख या समय दर्ज नहीं था कि सहायक पुलिस आयुक्त ने बॉन्ड स्वीकार किया था या नहीं. 

इसके अलावा, धारा 130 के तहत 24 अगस्त को जारी दिखाए गए नोटिस पर सहायक पुलिस आयुक्त द्वितीय कमलेश कांत के हस्ताक्षर थे. जबकि नोटिस सहायक पुलिस आयुक्त प्रथम के नाम से जारी बताया गया.

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कोर्ट ने और क्या कहा?

बेंच ने कहा कि पहली नजर में इस बात की मजबूत आशंका है कि संबंधित दस्तावेज बाद में भरा गया. राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि घटना के समय तनावपूर्ण हालात थे और मौके पर भीड़ मौजूद थी. पुलिस ने हालात को और बिगड़ने से रोकने के लिए कार्रवाई की थी. हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ किया कि तनावपूर्ण हालात पुलिस को कानून का पालन करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करते.

बेंच ने कहा कि गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित प्रक्रिया का पालन करना पुलिस का दायित्व है. दंड प्रक्रिया संहिता और बीएनएसएस में किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने से पहले निर्धारित सुरक्षा उपाय संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत मिले मौलिक संरक्षण से जुड़े हैं. इसलिए पुलिस इन प्रावधानों की अनदेखी नहीं कर सकती. कोर्ट ने नागरिक आजादी को लेकर पुलिस के रवैये पर भी चिंता जताई. 

कोर्ट ने कहा कि मामले के तथ्य बताते हैं कि पुलिस आम नागरिकों की स्वतंत्रता को लेकर पर्याप्त संवेदनशील नहीं है और यह विचार किए बिना गिरफ्तारी की ओर बढ़ जाती है कि क्या गिरफ्तारी या हिरासत के बिना भी मामले में आगे की कार्रवाई संभव है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी फटकारा था

इससे पहले सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस पर कड़ी टिप्पणी की थी और ये तक कह दिया था कि इससे अच्छा है कि पूरी यूपी पुलिस ही खत्म कर दें. कोर्ट ने कहा था कि हर मामले में यूपी पुलिस का कोई न कोई एजेंडा होता है. दरअसल, उत्पीड़न के एक मामले में आरोपी को मौके से पकड़ने के बावजूद एफआईआर में आरोपी के नाम की जगह 'अज्ञात' लिखा था.

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