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वर्किंग वाइफ से मांगी मेंटेनेंस, हाईकोर्ट ने कहा, 'बेशर्म हो, पत्नी को 15 लाख हर्जाना दो'

High Court ने कहा कि पत्नी की बॉडी लैंग्वेज और हाव-भाव से पता चलता है कि उसके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार हुआ है और अब वह मानसिक रूप से थकी हुई लगती है. जबकि याचिकाकर्ता पति एक हट्टा-कट्टा, बेशर्म नौजवान है, जिसके मन में कड़ी मेहनत, ईमानदारी और वफादारी के लिए कोई इज्जत नहीं है.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई की (PHOTO-Wikipedia)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलाक के बाद दिए जाने वाले मेंटेनेंस के मामले में एक वकील को कड़ी फटकार लगाई है. वकील अपनी कामकाजी पत्नी से भरण-पोषण की मांग को लेकर कोर्ट आया था. इस मांग के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी. इसके अलावा कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी को 15 लाख रुपये का मुआवजा दे, क्योंकि उसने उसकी सैलरी के आधार पर लिए गए 24 लाख रुपये के लोन का गलत इस्तेमाल करके उसे परेशान किया था. 

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कोर्ट ने यह भी पाया कि वकील ने तथ्यों को छिपाते हुए झूठे हलफनामे दायर किए थे. फिलहाल कपल के तलाक की कार्यवाही कोर्ट में पेंडिंग है और वो अलग-अलग रह रहे हैं.

पत्नी की कमाई पर नजर 

मामले पर ऑर्डर देते हुए जस्टिस विनोज दिवाकर की बेंच ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार भी लगाई है. कोर्ट ने कहा,

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अदालत ने कई मौकों पर याचिकाकर्ता पति और पत्नी से बातचीत की है. याचिकाकर्ता पति को समझाने की पूरी कोशिश की है कि वह पत्नी की कमाई पर नजर रखने के बजाय एक स्वस्थ प्रोफेशनल लाइफ जिए. पत्नी की बॉडी लैंग्वेज और हाव-भाव से पता चलता है कि उसके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार हुआ है और अब वह मानसिक रूप से थकी हुई लगती है. वहीं याचिकाकर्ता पति एक हट्टा-कट्टा, बेशर्म नौजवान है, जिसके मन में कड़ी मेहनत, ईमानदारी और वफादारी के लिए कोई इज्जत नहीं है. पति तुलनात्मक रूप से एक संपन्न परिवार से आता लगता है, जिसके चाचा पहले सांसद थे और मां गांव की पूर्व प्रधान थीं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने आगे कहा कि पत्नी एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से आती है. उसके पिता पुलिस से रिटायर्ड हैं और उसकी मां ने स्वास्थ्य विभाग में ग्रुप-D कर्मचारी के रूप में सेवा की है. अदालत ने टिप्पणी की कि पत्नी को 2019 में अतिरिक्त निजी सचिव के पद पर सरकारी नौकरी मिली और परिणाम घोषित होने के कुछ ही समय बाद उसने याचिकाकर्ता से शादी कर ली. बेंच ने आगे कहा,

याचिकाकर्ता पति एक सक्षम व्यक्ति और पेशे से वकील है. उसने अपनी आर्थिक स्थिति का पूरी तरह और स्पष्ट रूप से खुलासा नहीं किया. दी गई जानकारी में भी संपत्ति और देनदारियों के हलफनामे की कमी है. वो खुद को पूरी तरह से आश्रित के रूप में पेश नहीं कर सकता.

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भ्रमित करने वाले दावे, फर्जी एफिडेविट

बेंच ने आगे कहा कि हाईकोर्ट सिर्फ ‘विंडो शॉपिंग’ करने की जगह नहीं है. याचिकाकर्ता कई बार इस कोर्ट में गलत और गुमराह करने वाले तथ्यों के साथ आया है. उसने अपनी याचिकाओं और आवेदनों के सपोर्ट में झूठे हलफनामे दिए हैं. जरूरी तथ्यों को छिपाने और राहत की मांग करते हुए भी समानांतर कानूनी रास्ते अपनाने का रवैया उसे इस कोर्ट से किसी भी तरह की रियायत पाने का हकदार नहीं बनाता. 

वहीं पत्नी के वकील की दलीलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने यह बात छिपाई कि उसे प्रयागराज की एक फैमिली कोर्ट के आदेश के बाद पत्नी से हर महीने गुजारा-भत्ता के तौर पर 5,000 रुपये मिल रहे थे. बेंच ने कहा कि ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ की धारा 144 के तहत वह गुजारा-भत्ता मांगने का हकदार ही नहीं है. पति ने यह बात भी छिपाई कि उस गुजारा-भत्ते से जुड़ी कार्रवाई को हाईकोर्ट ने रोक दिया था.

पत्नी के नाम पर लोन भी लिया

मामले में पत्नी ने अपने वकील के जरिए यह आरोप लगाया कि उसके पति ने जमीन खरीदने के नाम पर लोन लेने की बात कही थी. फिर 2020 और 2022 में पति ने 11.50 लाख रुपये और 13.56 लाख रुपये का लोन लिया. ये लोन उसने पत्नी की सैलरी पर लिया था. हालांकि, एक लोन चुका दिया गया है, लेकिन दूसरे लोन के लिए पत्नी अभी भी हर महीने 26,020 रुपये की EMI दे रही है. पत्नी के वकील ने कोर्ट में बताया कि पति ने कथित तौर पर लोन की रकम UPI के जरिए अपने अकाउंट में ट्रांसफर कर ली. उसे शराब पीने और अपनी ऐशो-आराम की जिंदगी पर खर्च कर दिया.

कोर्ट ने क्या आदेश दिए हैं?

इस मामले में कोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी. साथ ही कोर्ट ने पत्नी को 15 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने का भी आदेश दिया. इसके अलावा कोर्ट ने पति की चल और अचल संपत्तियों की जांच के लिए एक कमेटी बनाने का आदेश दिया. बेंच ने प्रयागराज के फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज को निर्देश दिया कि वो पत्नी द्वारा हिंदू मैरिज एक्ट के तहत दायर वैवाहिक मामले की कार्यवाही में तेजी लाएं. बेंच ने उसी कोर्ट को यह भी निर्देश दिया कि एक जांच कराई जाए, ताकि पति के खिलाफ झूठे हलफनामे दायर करने और तथ्यों को छिपाने के मामले में जांच की जा सके.

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