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हाई कोर्ट ने नोएडा डीएम को लगाई फटकार, कहा- 'तानाशाह की तरह काम कर रहे, आपको जनता...'

नोएडा डीएम मेधा रूपम को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है. कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर नौकरशाही और पुलिस के लोग ऐसे ही काम करते रहे, तो जनता उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य की तरह दमन करने वाले के तौर पर ही देखेगी.

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नोएडा की DM मेधा रूपम (बाएं) को हाई कोर्ट ने फटकार लगाई. (X @MedhaRoopam)

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  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम तथा पुलिस अधिकारियों की NSA हिरासत मामले में कार्यवाही की कड़ी जांच करते हुए उक्त हिरासत को रद्द कर दिया तथा 5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया।
  • अप्रैल 2026 में मजदूरों के प्रदर्शन के सिलसिले में दिल्ली की छात्रा आकृति चौधरी को NSA के तहत हिरासत में लिया गया था, जिस पर कोर्ट ने पर्याप्त सबूत न होने का हवाला देते हुए कार्रवाई में खामियां पाई।
  • कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों को संविधान के प्रति निष्ठावान रहने और मनमाने अधिकार प्रयोग से बचने की हिदायत दी, साथ ही कहा कि गलत प्रशासन तानाशाही जैसे शासन व्यवस्था का कारण बन सकता है।

गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की जिलाधिकारी (DM) मेधा रूपम को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है. कोर्ट की टिप्पणी अब पूरे उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक सिस्टम पर सवाल खड़े कर रही है. कोर्ट ने साफ कहा है कि IAS और IPS अफसरों की निष्ठा राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं, बल्कि संविधान के प्रति होनी चाहिए. अगर अफसर इसी तरह मनमाने तरीके से अपनी ताकत का इस्तेमाल करते रहे, तो यूपी एक दिन ‘Orwellian Dystopia’ यानी तानाशाही वाले राज्य में बदल सकता है.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ स्टूडेंट और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की NSA हिरासत के मामले में आई है. 2 सितंबर को हाई कोर्ट ने आकृति की NSA के तहत हिरासत रद्द कर दी थी. अब कोर्ट का 15 पेज का ड‍िटेल ऑर्डर सामने आया है. इस आदेश में नोएडा की DM और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं.

क्या है पूरा मामला?

अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों ने वेतन बढ़ाने और बेहतर कामकाजी कंडीशन की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था. इसी प्रदर्शन से जुड़े मामलों में दिल्ली यूनिवर्सिटी की 25 साल की हिस्ट्री ग्रेजुएट आकृति चौधरी को गिरफ्तार किया गया. बाद में उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया गया.

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आकृति ने इस कार्रवाई को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. 2 सितंबर को जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने NSA के तहत उनकी हिरासत को रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि हिरासत के लिए जिस सामग्री का इस्तेमाल किया गया, उसमें पर्याप्त आधार नहीं था और कार्रवाई में कानून की गंभीर खामियां थीं. कोर्ट ने आकृति को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया. कोर्ट ने मुआवजे की रकम डीएम मेधा रूपम की सैलरी से देने की बात कही थी.

हाई कोर्ट की कड़ी फटकार

लेकिन अब सामने आए ड‍िटेल ऑर्डर में कोर्ट ने इससे भी आगे जाकर प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने कहा कि अफसरों को इतनी शक्तियां इसलिए दी जाती हैं क्योंकि उनके ऊपर लोगों के संवैधानिक और कानूनी अधिकार, गरिमा, सम्मान और कल्याण की रक्षा करने की जिम्मेदारी होती है.

लेकिन इसी के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा,

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अफसरों की वफादारी संविधान के प्रति होनी चाहिए, राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं.

कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अफ़सरशाही और पुलिस संविधान के प्रति अपनी निष्ठा भूलते हैं, तो जनता उन्हें ब्रिटिश हुकूमत की तरह दमनकारी व्यवस्था ही मानेगी. इससे आम लोगों में व्यवस्था के ख़िलाफ़ जन आक्रोश और अशांति फैलती है.

यूपी में तानाशाही का खतरा?

कोर्ट ने इससे भी कड़ी टिप्पणी की. बेंच ने कहा कि अगर प्रशासन में गलत काम करने वाले अफसर इसी तरह काम करते रहे, तो जल्द ही यूपी एक ‘Orwellian Dystopia’ यानी डर और सरकारी निगरानी वाली तानाशाही व्यवस्था में बदल सकता है. यानी ऐसा समाज, जहां लोगों की आजादी और अधिकारों पर भी सत्ता की सख्ती हावी हो जाए.

अब सवाल है कि आकृति चौधरी के मामले में कोर्ट इतना नाराज क्यों हुआ? कोर्ट के मुताबिक, आकृति एक महिला स्टूडेंट एक्टिविस्ट थीं. उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था. रिकॉर्ड में ऐसा कोई भरोसेमंद सबूत नहीं मिला, जिससे ये साबित हो कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी.

पुलिस ने उन पर भीड़ को उकसाने और हिंसा में भूमिका निभाने के आरोप लगाए थे. लेकिन कोर्ट के सामने ऐसा कोई मैसेज, ऑडियो, वीडियो या दूसरी ठोस सामग्री पेश नहीं की गई, जिससे ये आरोप साबित होते हों. कोर्ट ने पुलिस की कहानी को ‘concocted’ यानी गढ़ी हुई कहानी तक कहा.

आकृति की गिरफ्तारी के समय को लेकर भी बड़ा सवाल उठा. कोर्ट के मुताबिक आकृति को 11 अप्रैल की शाम करीब 5:30 बजे नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से हिरासत में लिया गया था. जबकि पुलिस रिकॉर्ड में उनकी गिरफ्तारी 12 अप्रैल की दिखाई गई.

कोर्ट ने नोटिस और जनरल डायरी की एंट्री को लेकर भी सवाल उठाए. हाई कोर्ट की बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड को देखने से ऐसा लगता है कि पहले आकृति को हिरासत में लिया गया और बाद में कागजी कार्रवाई की गई. कोर्ट ने ये भी कहा कि जब पुलिस की रिपोर्ट में भरोसेमंद सबूत नहीं हों, तो NSA जैसे सख्त कानून को लागू करने से पहले DM की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है.

मेधा रूपम के आचरण की आलोचना

लेकिन कोर्ट के मुताबिक इस मामले में ऐसा नहीं हुआ. आकृति की NSA हिरासत का आदेश गौतमबुद्धनगर की DM मेधा रूपम ने जारी किया था. कोर्ट ने उनके आचरण की कड़ी आलोचना की. बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड से ऐसा लगता है कि DM मेधा रूपम, आकृति को ‘एक उदाहरण’ के तौर पर दिखाना चाहती थीं. डीएम सार्वजनिक जगहों पर मजदूरों के समर्थन में आवाज उठाने से रोकने की कोशिश कर रही थीं.

इसी वजह से कोर्ट ने सिर्फ NSA हिरासत रद्द करके मामला खत्म नहीं किया. अदालत ने 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया और कहा कि इसकी वसूली गौतमबुद्धनगर की DM समेत जिम्मेदार अधिकारियों की सैलरी से की जाए. आदेश में जिम्मेदारी तय करने की बात SHO तक से कही गई है. साथ ही, संबंधित अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में कोर्ट की नाराजगी दर्ज करने का भी निर्देश दिया गया है.

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यहां एक अहम बात समझना जरूरी है. NSA के तहत हिरासत रद्द होने का मतलब ये नहीं है कि आकृति तुरंत जेल से बाहर आ गईं. उनके खिलाफ प्रदर्शन से जुड़े दूसरे आपराधिक मामले भी हैं और उन मामलों में उन्हें अभी जमानत नहीं मिली है. इसलिए NSA आदेश रद्द होने के बावजूद वह न्यायिक हिरासत में बनी हुई हैं.

नौकरशाही और पुलिस को चेतावनी

इस पूरे मामले में हाई कोर्ट ने एक तरफ आकृति चौधरी की NSA हिरासत को गलत ठहराया, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक अधिकारियों को भी साफ संदेश दिया है कि कानून लागू करने की ताकत बड़ी हो सकती है, लेकिन उस ताकत की सीमा संविधान तय करता है. शायद यही वजह है कि कोर्ट की ये टिप्पणी सिर्फ आकृति चौधरी केस तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि यूपी की पूरी नौकरशाही और पुलिस के लिए एक बड़ी चेतावनी के तौर पर देखी जा रही है.

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