भारत ने अपनी तीनों सेनाओं की सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए करीब 1.10 लाख करोड़ रुपये की रक्षा खरीद को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी है. 7 सितंबर 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई Defence Acquisition Council यानी रक्षा अधिग्रहण परिषद की बैठक में अलग-अलग खरीद प्रस्तावों को Acceptance of Necessity यानी AoN की मंजूरी दी गई.
सेना के लिए एक लाख करोड़ रुपये के हथियार: आर्मी-नेवी-एयरफोर्स को क्या मिलेगा? चीन-पाकिस्तान के सामने कितना कारगर?
भारत ने सेना, नौसेना और वायुसेना की क्षमता बढ़ाने के लिए करीब 1.10 लाख करोड़ रुपये के रक्षा खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी है. CBRN रिकॉनिसेंस वाहन, Advanced Light Helicopters, Arudhra Radar, Marine Gas Turbine, जैमर और दूसरे सैन्य सिस्टम क्या हैं. China-Pakistan के लिहाज से इस मंजूरी की क्या अहमियत है?

सरकार के मुताबिक कुल स्वीकृत प्रस्तावों में करीब 98 फीसदी खरीद भारतीय उद्योग से की जाएगी. यानी मामला सिर्फ नए हथियार खरीदने का नहीं है. इसके साथ घरेलू रक्षा उत्पादन और आत्मनिर्भरता को भी बड़ा धक्का देने की कोशिश है.
लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है. 1.10 लाख करोड़ रुपये का मतलब ये नहीं है कि सरकार ने एक ही दिन में इतनी रकम के अंतिम खरीद अनुबंध पर हस्ताक्षर कर दिए. AoN खरीद प्रक्रिया में जरूरत की शुरुआती प्रशासनिक मंजूरी है. इसके बाद निविदा, तकनीकी मूल्यांकन, बातचीत और अंतिम अनुबंध जैसी प्रक्रियाएं होती हैं.
सेना को क्या मिलेगा?
भारतीय थल सेना के लिए जिन प्रणालियों को मंजूरी मिली है, उनमें कैमिकल, बायोलॉजिकल, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लिर यानी CBRN रिकॉनिसेंस वाहन, हाई मोबिलिटी व्हीकल (High Mobility Vehicles), स्वचालित बारूदी सुरंग बिछाने वाली गाड़ियां (Self-Propelled Mechanical Mine Layers), हल्के हेलीकॉप्टर (Advanced Light Helicopters), टैंकों के आगे बिछी हुई बारूदी सुरंग का पता लगाने वाले Trawl Tanks और सर्वत्र ब्रिज सिस्टम (Sarvatra Bridge System) शामिल हैं.
इनमें CBRN वाहन खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं. मान लीजिए किसी इलाके में रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल या परमाणु सामग्री से संदूषण हो गया. ऐसे इलाके में सैनिकों को सीधे भेजना बेहद जोखिम भरा हो सकता है. CBRN रिकॉनिसेंस वाहन ऐसे क्षेत्रों में संदूषण की पहचान, निगरानी और प्रभावित इलाके को चिन्हित करने में मदद करेंगे.
हाई मोबिलिटी व्हीकल का काम कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में सैनिकों और सैन्य सामान की आवाजाही को आसान बनाना है. पहाड़ों और दूसरे चुनौतीपूर्ण इलाकों में सिर्फ हथियार होना काफी नहीं होता. उन्हें सही समय पर सही जगह पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है.
बारूदी सुरंगों और नदियों के पार जाने की तैयारी
युद्ध में दुश्मन की तरफ से बिछाई गई बारूदी सुरंगें सैनिकों और सैन्य वाहनों की गति रोक सकती हैं. इसी वजह से बारूदी सुरंग बिछाने वाली गाड़ियां और ट्रॉल टैंक जैसे सिस्टम महत्वपूर्ण हैं.
सर्वत्र ब्रिज सिस्टम का इस्तेमाल भी सैन्य अभियानों के दौरान अलग-अलग तरह के इलाकों में लड़ाकू संरचनाओं को रास्ता देने के लिए किया जाएगा. जब किसी नदी, नाले या दूसरे अवरोध को पार करना हो, तो ऐसे पुल सैनिकों और वाहनों की आवाजाही में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.
यानी सेना की इस खरीद को सिर्फ मिसाइल या बंदूक की खरीद के तौर पर देखना अधूरा होगा. इसमें युद्ध के दौरान सैनिकों की आवाजाही, रसद, रास्ता तैयार करने और कठिन इलाके में अभियान चलाने की पूरी क्षमता मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है.
Advanced Light Helicopter क्यों अहम है?
Advanced Light Helicopter यानी ALH ऐसे इलाकों में उपयोगी है जहां सड़क या दूसरे जमीनी रास्तों से पहुंचना मुश्किल होता है. पहाड़ी इलाकों में सैनिकों, सामान और जरूरी सहायता को तेजी से पहुंचाने के लिए हेलिकॉप्टर बेहद अहम होते हैं.
सरकार के मुताबिक ALH का इस्तेमाल सेना और वायुसेना दोनों की ओर से अलग-अलग इलाकों और अभियान परिस्थितियों में जटिल मिशन के लिए किया जाएगा.
भारत के लिए इसका महत्व चीन से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC के संदर्भ में भी समझा जा सकता है. ऊंचाई वाले इलाकों में सैन्य तैनाती अपने आप में बड़ी रसद चुनौती है. इसलिए ज्यादा सक्षम हेलिकॉप्टर बेड़े का मतलब सिर्फ युद्ध क्षमता बढ़ना नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सैन्य रसद मजबूत होना भी है.
नौसेना के लिए अरुद्र रडार और मरीन गैस टरबाइन
भारतीय नौसेना के लिए अरुद्र रडार (Arudra Radar) की खरीद को मंजूरी मिली है. ये रडार विभिन्न नौसेना के हवाई अड्डे (Naval Air Stations) पर मौजूद पुराने ‘एयर रूट सर्विलांस रडार’ (Air Route Surveillance Radars) की जगह लगाए जाएंगे. आसान भाषा में कहें तो इनका काम हवाई निगरानी क्षमता को मजबूत करना है.
दूसरी बड़ी मंजूरी मरीन गैस टबाइन (Marine Gas Turbine) यानी MGT की डिजाइन, विकास और उसके बाद खरीद के लिए है. मरीन गैस टबाइन युद्धपोत की प्रणोदन प्रणाली का हिस्सा होती है. सरकार के मुताबिक स्वदेशी क्षमता विकसित होने से नौसेना की विदेशी विक्रेताओं पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी.
ये हिस्सा इसलिए खास है क्योंकि किसी युद्धपोत की ताकत सिर्फ उसके हथियारों से तय नहीं होती. जहाज कितनी तेजी से चल सकता है, कितनी विश्वसनीयता से लंबे समय तक अभियान कर सकता है और उसके रखरखाव में विदेशी निर्भरता कितनी है, ये भी युद्ध क्षमता का हिस्सा है.
वायुसेना को सिर्फ विमान नहीं, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता भी
भारतीय वायुसेना के लिए लड़ाकू विमानों, परिवहन विमानों और हेलिकॉप्टरों की युद्ध क्षमता बढ़ाने से जुड़े कई प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है. इसके अलावा ‘जमीन पर लगे बहुउद्देशीय जैमर’ (Ground-Based Multi-Purpose Jammer) यानी GBMPJ भी महत्वपूर्ण है.
जैमर का काम दुश्मन के रडार को प्रभावित करना होता है. युद्ध अब सिर्फ मिसाइल और विमान की ताकत का खेल नहीं है. कौन पहले दूसरे की निगरानी व्यवस्था को बाधित करता है और किसकी संचार तथा इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियां ज्यादा सुरक्षित रहती हैं, इसका भी बड़ा असर पड़ता है.
सरकार के मुताबिक GBMPJ दुश्मन के रडार के खिलाफ प्रभावी जैमिंग क्षमता उपलब्ध कराएगा. इसके साथ ‘रक्षा बलों का सुरक्षित एक्सेस कार्ड’ (Defence Forces Secure Access Card) यानी DEFSAC प्रणाली भी लाई जाएगी, जो मौजूदा कागजी पहचान पत्र, पास और परमिट की जगह रेडियो फ्रीक्वेंसी पहचान आधारित स्मार्ट कार्ड व्यवस्था लाएगी.
चीन और चीन के सामने इसका क्या मतलब?
भारत के सामने एक साथ दो अलग तरह की सैन्य चुनौतियां हैं. चीन के साथ लंबी और कठिन पहाड़ी सीमा है, जबकि पाकिस्तान के साथ पश्चिमी मोर्चे पर अलग तरह की सुरक्षा चुनौती बनी रहती है.
इस खरीद पैकेज में पहाड़ी इलाकों के लिए हाई मोबिलिटी व्हीकल और हेलिकॉप्टर, निगरानी के लिए रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के लिए जैमर, बारूदी सुरंगों से निपटने वाली प्रणालियां और सैन्य आवाजाही के लिए पुल प्रणाली शामिल हैं. इसलिए इसका असर किसी एक हथियार तक सीमित नहीं है.
चीन के संदर्भ में निगरानी, पहाड़ी इलाकों में सैन्य रसद और तेज आवाजाही महत्वपूर्ण हैं. पाकिस्तान के संदर्भ में भी बेहतर गतिशीलता, निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता सैन्य तैयारी को मजबूत कर सकती है. हालांकि सिर्फ इस एक खरीद से ये निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि भारत किसी खास युद्ध की तैयारी कर रहा है. ये ज्यादा व्यापक सैन्य आधुनिकीकरण का हिस्सा है.
सबसे बड़ा बदलाव शायद 98 फीसदी वाला आंकड़ा है
इस पूरी खबर का सबसे बड़ा आर्थिक और रणनीतिक पहलू 98 फीसदी का आंकड़ा है. रक्षा मंत्रालय के मुताबिक स्वीकृत AoN में लगभग 98 फीसदी खरीद भारतीय उद्योग से की जाएगी.
इसका मतलब ये है कि सरकार रक्षा जरूरतों को पूरा करने के साथ घरेलू कंपनियों, सरकारी रक्षा उपक्रमों और भारतीय तकनीकी क्षमता को भी आगे बढ़ाना चाहती है.
हालांकि 98 फीसदी भारतीय उद्योग से खरीद का मतलब ये नहीं है कि हर पुर्जा या हर तकनीक पूरी तरह भारत में विकसित होगी. किसी भी बड़े रक्षा तंत्र में अलग-अलग स्तरों पर विदेशी तकनीक, घटक या सहयोग की जरूरत हो सकती है. इसलिए असली कसौटी आने वाले वर्षों में होगी कि मंजूर किए गए प्रोजेक्ट कितनी तेजी से अनुबंध में बदलते हैं, उत्पादन कब शुरू होता है और सेनाओं को प्रणालियां समय पर कब मिलती हैं.
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तो 1.1 लाख करोड़ रुपये की असली कहानी क्या है?
इसे सिर्फ बड़ी रकम वाली रक्षा खरीद कहना आसान है. लेकिन तस्वीर थोड़ी बड़ी है. एक तरफ सेना के लिए CBRN सुरक्षा, गतिशीलता, हेलिकॉप्टर, माइन लेयर और पुल जैसी क्षमताएं बढ़ाई जा रही हैं. दूसरी तरफ नौसेना के लिए रडार और मरीन गैस टरबाइन जैसे सिस्टम हैं. वायुसेना के लिए विमान क्षमता के साथ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध को मजबूत किया जा रहा है.
और इन सबके ऊपर 98 फीसदी भारतीय उद्योग से खरीद का लक्ष्य है. यानी संदेश साफ है. भारत अपनी सेनाओं को सिर्फ ज्यादा हथियारों से लैस करने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि निगरानी, गतिशीलता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, सैन्य रसद और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को एक साथ मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. अब असली परीक्षा मंजूरी के बाद शुरू होगी. क्योंकि रक्षा क्षेत्र में कागज पर मंजूर हुआ सिस्टम तभी रणनीतिक ताकत बनता है, जब वो समय पर बनकर सीमा और समुद्र में तैनात भी हो.
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