The Lallantop

‘गुंडा ऐक्ट को परेशान करने का हथियार मत बनाइए’, यूपी सरकार को हाईकोर्ट की नसीहत

गोंडा के एक मामले में हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट और डिविजनल कमिश्नर के आदेश रद्द कर दिए. कोर्ट ने कहा कि बरी हो चुके मामले और बिना मुकदमे वाली बीट रिपोर्ट के आधार पर किसी को ‘गुंडा’ घोषित नहीं किया जा सकता.

Advertisement
post-main-image
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुंडा एक्ट पर टिप्पणी की है (PHOTO- High Court)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के 'गुंडा एक्ट' के गलत इस्तेमाल को लेकर योगी आदित्यनाथ सरकार की आलोचना करते हुए कई मामलों में इस कानून के दुरुपयोग की पुष्टि की।
  • यह मामला गोंडा के जिला मजिस्ट्रेट के आदेश से जुड़ा है जिसमें जाहिद अली को पुराने मामलों के आधार पर 'गुंडा' घोषित कर जिलाबदर किया गया था, जबकि एक केस में उन्हें पहले ही बरी किया जा चुका था।
  • हाईकोर्ट ने DM और कमिश्नर के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि गलत जानकारी और नैचुरल जस्टिस के उल्लंघन के कारण अली की याचिका को स्वीकार किया गया, जिससे आदेशों की वैधता समाप्त हो गई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में 'गुंडा ऐक्ट' के ‘गलत इस्तेमाल’ को लेकर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की कड़ी आलोचना की है. कोर्ट ने कहा कि उसके सामने कई ऐसे मामले आ रहे हैं. ऐसा लगता है कि यूपी सरकार इस कानून का इस्तेमाल कर लोगों को परेशान कर रही है. कोर्ट ने कहा कि यूपी सरकार इस कानून का इस्तेमाल हथियार के तौर पर करने को आमादा है.

Advertisement

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने कहा कि ‘गुंडा ऐक्ट’ एक बहुत शक्तिशाली कानून है. इसे बहुत सावधानी के साथ, केवल स्पष्ट मामलों में ही लागू किया जाना चाहिए. दरअसल, कोर्ट गोंडा के जिला मजिस्ट्रेट के एक आदेश से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही थी. आदेश में जाहिद अली नाम के एक व्यक्ति को ‘गुंडा’ घोषित कर 6 महीने के लिए जिलाबदर (जिले से बाहर) कर दिया गया था.

'गुंडा घोषित करने का आधार ही गलत'

हाईकोर्ट ने डिविजनल कमिश्नर का आदेश रद्द कर दियास जिसमें DM के फैसले को सही ठहराया गया था. दरअसल गोंडा के DM ने 11 मई को गुंडा ऐक्ट की धारा 3(1) के तहत एक आदेश जारी किया था. यह आदेश दो आपराधिक मामलों और एक बीट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट के आधार पर दिया गया था. इनमें से एक आपराधिक मामला 2010 का और दूसरा 2020 का था. हाईकोर्ट ने पाया कि 2010 वाले मामले में गोंडा के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने 26 अगस्त 2017 को ही मिस्टर अली को बरी कर दिया था. कोर्ट ने कहा,

Advertisement

जिस मामले में किसी व्यक्ति को पहले ही बरी किया जा चुका हो, बाद में उसे किसी व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता.

‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने यह भी कहा कि 2020 के आपराधिक मामले और अली को गुंडा घोषित करने वाले 2026 के आदेश के बीच लगभग छह साल का अंतर था. कोर्ट ने कहा कि इन दोनों के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं दिखाया जा सका. हाईकोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट में उस मामले का जिक्र किए जाने पर भी आपत्ति जताई जिसमें अली पहले ही बरी हो चुके थे. कोर्ट ने कहा कि इससे पता चलता है कि DM के सामने याचिकाकर्ता की गलत तस्वीर पेश की गई थी. कोर्ट ने कहा,

2020 के सिर्फ एक आपराधिक मामले में शामिल होने से यह साबित नहीं होता कि मिस्टर अली आदतन अपराधी थे या वे आदतन अपराध करते थे या अपराध के लिए उकसाते थे.

Advertisement

(यह भी पढ़ें: हाई कोर्ट ने नोएडा डीएम को लगाई फटकार, कहा- ‘तानाशाह की तरह काम कर रहे, आपको जनता...’)

बीट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट को आधार मानने से इंकार

बेंच ने बीट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट को आधार मानने से इनकार कर दिया. इस जानकारी के आधार पर कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया. न ही अली को इस बारे में अपनी बात रखने का मौका दिया गया. कोर्ट ने कहा कि ऐसी जानकारी के आधार पर कार्रवाई करना नैचुरल जस्टिस के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा. कोर्ट ने यह भी पाया कि कमिश्नर ने अली के खिलाफ बरी हो चुके मामले को भी पेंडिंग मामला मान लिया था. ये यह दिखाता है कि उन्होंने अपने अधिकार का सही इस्तेमाल नहीं किया. यह मानते हुए कि DM और कमिश्नर के आदेश कानूनी रूप से सही नहीं थे. हाईकोर्ट ने उन्हें रद्द कर दिया और अली की याचिका को मंजूरी दे दी.

वीडियो: अब देवरिया के एसपी आईपीएस अभिजीत शंकर को इलाहबाद हाईकोर्ट की फटकार

Advertisement