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नागालैंड, मणिपुर और अरुणाचल के कई इलाके 'अशांत क्षेत्र' घोषित, क्या मतलब है इसका?

केंद्र सरकार ने नागालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों को ‘अशांत क्षेत्र’ बताते हुए AFSPA की अवधि 1 अक्टूबर 2026 से अगले छह महीने के लिए बढ़ा दी है.

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पूर्वोत्तर के कई इलाकों में अफस्पा की मियाद बढ़ा दी गई है. (Courtesy: India today)

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  • केंद्र सरकार ने नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के कुछ इलाकों में AFSPA कानून को 6 महीने के लिए बढ़ाने का फैसला किया है जो 1 अक्टूबर से लागू होगा।
  • पूर्वोत्तर के राज्यों में कानून-व्यवस्था की समीक्षा के बाद केंद्र ने इन राज्यों के कुछ क्षेत्रों को 'अशांत क्षेत्र' घोषित करते हुए AFSPA को लागू रखना जरूरी माना।
  • AFSPA बढ़ाए जाने से सुरक्षाबलों को तलाशी, गिरफ्तारी और बल प्रयोग के अधिकार मिलेंगे, वहीं अगर हालात सुधरते हैं तो इसे 6 महीने से पहले वापस लिया जा सकता है।

भारत के पूर्वोत्तर इलाके का नाम सुनते ही सबसे पहले जेहन में क्या चीज आती है? अलग-अलग लोगों के लिए इसका जवाब अलग-अलग हो सकता है. लेकिन पिछले कई दशकों से देश के इस किनारे पर मौजूद राज्यों से एक शब्द चिपक गया है- AFSPA. पूरा नाम ‘सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम’. ये वो कानून है, जो अशांत इलाकों में सशस्त्र बलों को खास अधिकार देता है. इन अधिकारों में क्या है उस पर चर्चा कर लेंगे, लेकिन पहले ये बता दें कि आज AFSPA पर बात क्यों की जा रही है.

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दरअसल, केंद्र सरकार ने नॉर्थ-ईस्ट के तीन राज्यों नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के कुछ इलाकों को ‘डिस्टर्ब्ड एरिया’ (अशांत क्षेत्र) बताते हुए वहां AFSPA कानून को 6 महीने के लिए बढ़ा दिया है. ‘बढ़ाने’ से मतलब साफ है कि यहां पहले से ही AFSPA लागू है. TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने बताया कि हाल ही में इन तीनों राज्यों में कानून-व्यवस्था के हालत की समीक्षा की गई थी, जिसके बाद ये फैसला लिया गया. इस फैसले में कहा गया कि तीनों राज्यों के कुछ इलाकों में AFSPA कानून 1 अक्टूबर से 6 महीने तक लागू रहेगा. फैसले में ये भी इशारा किया गया है कि अगर हालात सामान्य होते हैं तो इसे 6 महीने से पहले भी वापस लिया जा सकता है.

सरकार ने अपने फैसले में AFSPA कानून की धारा-3 का हवाला दिया है. कानून का ये हिस्सा केंद्र सरकार को देश के किसी भी इलाके को ‘अशांत क्षेत्र’ (disturbed area) घोषित करने की ताकत देती है.

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किन इलाकों को बताया गया 'अशांत क्षेत्र'

सबसे पहले मणिपुर की बात करते हैं, जहां अगले साल (2027) चुनाव भी होने वाले हैं. 

हाल के दिनों में अशांति को लेकर पूर्वोत्तर का सबसे ज्यादा चर्चित प्रदेश यही है. हालांकि, गृह मंत्रालय ने यहां के सभी इलाकों में AFSPA की मियाद नहीं बढ़ाई है. किन इलाकों में बढ़ाई है, ये बताने से ज्यादा आसान ये बताना है कि किन इलाकों को इस ‘विस्तार’ से बाहर रखा गया है. क्योंकि वो संख्या में कम है. मणिपुर के पांच जिलों के 13 पुलिस थानों के दायरे में आने वाले इलाकों को AFSPA कानून से बाहर रखा गया है. इनमें इंफाल वेस्ट जिले के इंफाल, लैंफेल, सिटी, सिंगजामेई, पटसोई और वांगोई पुलिस स्टेशन के इलाके शामिल हैं.

इंफाल पूर्व जिले में पोरमपाट, हेइंगांग और इरिलबुंग पुलिस स्टेशन के इलाके इससे बाहर हैं. थौबल जिले का थौबल पुलिस स्टेशन, बिष्णुपुर जिले के बिष्णुपुर और नंबोल पुलिस स्टेशन और काकचिंग जिले का काकचिंग पुलिस स्टेशन भी इस दायरे से बाहर रखा गया है.

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नागालैंड चलते हैं

नागालैंड के 9 जिलों में AFSPA कानून की अवधि बढ़ाई गई है. इनमें दीमापुर, निउलैंड, चुमौकेदिमा, मोन, किफिरे, नोकलाक, फेक, पेरेन और मेलुरी जिलों को AFSPA की धारा-3 के तहत ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित किया गया है. इसके अलावा प्रदेश के 5 अन्य जिलों कोहिमा, मोकोकचुंग, लोंगलेंग, वोखा और जुन्हेबोटो के 21 पुलिस थानों के अधिकार क्षेत्र वाले इलाकों में भी AFSPA लागू रहेगा.

अब बात चीन के साथ सीमा विवाद में उलझे रहने वाले अरुणाचल प्रदेश की. 

प्रदेश के तिरप, चांगलांग और लोंगडिंग जिलों में AFSPA की अवधि बढ़ाई गई है. इसके अलावा, असम की सीमा से लगे नामसाई जिले के नामसाई, महादेवपुर और चौखाम पुलिस स्टेशनों के अधिकार क्षेत्र वाले इलाकों में भी यह कानून लागू रहेगा.

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कहां-कहां है AFSPA?

बता दें कि पूर्वोत्तर के राज्यों में मिजोरम, मेघालय और त्रिपुरा से AFSPA पूरी तरह हटा लिया गया है. लेकिन, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नागालैंड के अलावा असम के कुछ इलाकों में बी AFSPA अभी लागू है.

सुरक्षाबलों को क्या विशेष अधिकार?

जिन इलाकों में AFSPA कानून लगता है, वहां काफी चीजें सशस्त्र बलों के ही कंट्रोल में आ जाती हैं. अगर फोर्स को लगता है कि कोई व्यक्ति कानून-व्यवस्था के खिलाफ काम कर रहा है तो वो तीन तरह के बड़े कदम उठा सकती है. बिना वॉरंट के तलाशी लेना. बिना वॉरंट के अरेस्ट करना और स्थिति बिगड़ने पर किसी से खतरा महसूस होने पर बल प्रयोग करना, गन फायर तक करना.

AFSPA के ये वही प्रोविजन हैं, जिनके विरोध में लगातार तमाम मानवाधिकार संगठन आवाज़ उठाते रहे हैं. इरोम शर्मिला का नाम तो आपने सुना ही होगा. ये वही एक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने 2000 से लेकर 2016 तक यानी 16 साल तक इसी AFSPA को हटाए जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की थी.

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