इंग्लैंड की रहने वाली 25 साल की ओलिविया डॉनेली पिछले 2 सालों से जीभ में छालों से परेशान थीं. छालों में दर्द की वजह से उनके लिए बोलना मुश्किल हो जाता. ओलिविया ने दवा खाई, लेकिन आराम नहीं मिला. फिर वो डॉक्टर के पास गईं. वहां कुछ टेस्ट हुए. रिपोर्ट्स एकदम नॉर्मल आईं. डॉक्टर्स को लगा कि शायद ओलिविया को इम्यून सिस्टम से जुड़ी कोई बीमारी होगी.
2 साल से जीभ पर छाले थे, अब पता चला कैंसर है, महिला को कटवानी होगी 40% जीभ
महिला को डॉक्टर्स ने बताया कि उनकी जीभ पर जो गांठ थी, वो असल में कैंसर का ट्यूमर था. अब उनकी जीभ का 40% हिस्सा निकालकर दोबारा बनाया जाएगा.


मगर इस साल की शुरुआत में उन्हें अपनी जीभ पर एक सख्त गांठ महसूस हुई. ओलिविया ने दोबारा टेस्ट कराए. बायोप्सी कराई. इस बार जांच में निकला कैंसर. The Mirror की रिपोर्ट के मुताबिक, डॉक्टर्स ने उन्हें बताया कि उनकी जीभ पर जो गांठ थी, वो असल में कैंसर का ट्यूमर था. अब उनकी जीभ का 40% हिस्सा निकालकर दोबारा बनाया जाएगा. यही नहीं, उनके लिम्फ नोड्स भी निकालने होंगे, क्योंकि डॉक्टर्स को डर है कि शायद कैंसर वहां तक फैला हुआ हो सकता है.
ओलिविया कहती हैं,
‘मुझे फिर से बोलना सीखना होगा. दोबारा खाना सीखना होगा. ये सब स्वीकार करना बहुत मुश्किल है. कभी मैं ठीक महसूस करती हूं, तो कभी बहुत दुखी हो जाती हूं. लेकिन शायद ये सामान्य प्रक्रिया है.’
ओलिविया अपनी कहानी इसलिए शेयर कर रही हैं, ताकि कम उम्र में होने वाले टंग कैंसर को लेकर लोग जागरूक हो सकें.
इसलिए आज हम भी टंग कैंसर पर ही बात करेंगे. डॉक्टर से जानेंगे कि टंग कैंसर क्यों होता है. इसके मुख्य लक्षण क्या हैं. टंग कैंसर का डायग्नोसिस कैसे किया जाता है. और इसके इलाज और बचाव का तरीका क्या है.
हमें बताया डॉ. श्याम अग्रवाल ने.

टंग कैंसर, हेड एंड नेक कैंसर का ही एक प्रकार है. भारत में हेड एंड नेक कैंसर के मामले सबसे ज़्यादा आते हैं. हर साल देश में करीब 16 से 17 लाख कैंसर के नए मामले आते हैं. इनमें एक-तिहाई से ज़्यादा मामले ओरल कैंसर के होते हैं.
टंग कैंसर का सबसे बड़ा कारण तंबाकू का सेवन है. तंबाकू किसी भी रूप में नुकसान पहुंचा सकता है. चाहे तंबाकू चबाना हो, खैनी रखना हो या मुंह में लंबे समय तक तंबाकू दबाकर रखना हो. तंबाकू का सेवन मुंह और जीभ के कैंसर का ख़तरा काफी बढ़ा देता है.
टंग कैंसर के लक्षणकई लोगों को मुंह में छाले होते हैं, लेकिन वो कुछ ही दिनों में ठीक हो जाते हैं. अक्सर ऐसे छाले कुछ गर्म या तला खाने की वजह से होते हैं. लेकिन टंग कैंसर में जीभ पर एक घाव या अल्सर बनना शुरू होता है. ये घाव धीरे-धीरे बढ़ता जाता है. शुरुआती दौर में घाव में दर्द नहीं होता. लेकिन घाव ठीक भी नहीं होता है. समय बीतने पर घाव में दर्द हो सकता है. घाव से खून भी निकल सकता है.
कैंसर सेल्स लगातार बढ़ते और फैलते रहते हैं. जीभ के लिम्फ नोड्स गर्दन के हिस्से में होते हैं. अगर जीभ के दाईं तरफ कैंसर होता है. तब गर्दन के दाईं तरफ के लिम्फ नोड्स प्रभावित हो सकते हैं. उनकी गांठों का आकार बढ़ने लगता था. जो गांठें पहले महसूस नहीं होती हैं, वो महसूस होने लगती हैं. समय के साथ गांठों का साइज़ काफी ज़्यादा बढ़ जाता है. कैंसर अचानक नहीं बढ़ता, इसे विकसित होने में कई महीने लग सकते हैं.
जब भी टंग कैंसर होगा, तो पहले ज़ुबान पर एक घाव होगा. इस घाव में ब्लीडिंग हो सकती है. फिर ये ठीक न होने वाला अल्सर बन सकता है. गर्दन में भी गांठें महसूस होने लगती हैं.

अगर मुंह का कोई घाव लंबे समय से ठीक नहीं हो रहा. गर्दन में गांठें महसूस हो रही हैं. तब ऐसे में बायोप्सी कराना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि मुंह में घाव होने के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं. कई लोग बायोप्सी कराने से डरते हैं या बचते हैं. लेकिन कैंसर की पुष्टि करने के लिए बायोप्सी ज़रूरी है. बायोप्सी के बिना कैंसर की पुष्टि नहीं की जा सकती.
कैंसर की पुष्टि होने के बाद उसकी स्टेजिंग की जाती है. इसके लिए MRI और दूसरे टेस्ट किए जाते हैं, ताकि पता चल सके कि कैंसर कितना फैला है. छाती का एक्स-रे भी किया जाता है, ये देखने के लिए कि कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा है या नहीं. अगर कैंसर सिर्फ जीभ तक सीमित है, तो ऑपरेशन करके उसे हटाया जा सकता है. जीभ का कितना हिस्सा निकालना है, ये ट्यूमर की जगह और आकार पर निर्भर करता है. अगर ट्यूमर छोटा हो, तो सिर्फ उतना हिस्सा निकाला जाता है.
कई मामलों में गर्दन की गांठें यानी लिम्फ नोड्स भी निकालने पड़ते हैं. शुरुआती स्टेज में सर्जरी से इलाज की संभावना काफी अच्छी होती है. ज़रूरत पड़ने पर आधी जीभ तक निकालनी पड़ सकती है, जिसे हेमीग्लोसेक्टोमी कहते हैं. गर्दन की लिम्फ नोड्स निकालने के लिए रेडिकल नेक डिसेक्शन भी किया जा सकता है. ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि कैंसर गांठों तक फैला है या नहीं, ये पता लगाना ज़रूरी है. कई बार गांठें बाहर से सामान्य दिखती हैं, लेकिन माइक्रोस्कोपिक स्तर पर उनमें कैंसर मौजूद हो सकता है.
सर्जरी के बाद आगे का इलाज ऑपरेशन की रिपोर्ट पर निर्भर करता है. ज़रूरत पड़ने पर मरीज़ को एडजुवेंट रेडियोथेरेपी दी जाती है. अगर कैंसर ऐसी स्टेज में हो, जहां ऑपरेशन संभव न हो, तो कीमोथेरेपी और रेडिएशन साथ में दिए जाते हैं. इसमें आमतौर पर 6 हफ्तों तक रेडिएशन और हर हफ्ते कीमोथेरेपी दी जाती है. इस इलाज से ठीक होने की संभावना 60 से 70% तक होती है.
अगर कैंसर का ऑपरेशन हो जाता है, तो ठीक होने की संभावना काफी बढ़ जाती है. शुरुआती स्टेज में इलाज होने पर 70 से 90 प्रतिशत तक मरीज़ ठीक हो सकते हैं. ठीक होने की संभावना कैंसर की स्टेज और फैलाव पर निर्भर करती है. अगर इलाज न कराया जाए, तो कैंसर लगातार बढ़ता रहता है. गर्दन की गांठों में घाव और ब्लीडिंग भी हो सकती है. आगे चलकर कैंसर फेफड़ों, हड्डियों, लिवर और शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल सकता है. इसे चौथी स्टेज का कैंसर कहा जाता है. चौथी स्टेज में आमतौर पर कीमोथेरेपी दी जाती है. इसके अलावा, इम्यूनोथेरेपी और टारगेट थेरेपी भी इस्तेमाल की जा सकती है. एडवांस स्टेज में भी कुछ मरीज़ों को इन इलाजों से फायदा मिल सकता है. लेकिन चौथी स्टेज में पूरी तरह ठीक होने की संभावना करीब 10 से 20 प्रतिशत तक ही रहती है
सबसे बेहतर यही है कि कैंसर होने ही न दिया जाए. अगर आप तंबाकू, पान-मसाला, जर्दा खाते है. तंबाकू से जुड़ी कोई भी चीज़ खाते हैं, तो उसे तुरंत बंद कर दें. कैंसर के मामले में बचाव ही सबसे बेहतर इलाज माना जाता है.
हर छाला कैंसर नहीं होता. लेकिन अगर जीभ पर कोई ऐसा घाव है, जो काफी वक्त से ठीक नहीं हो रहा, तो उसे नज़रअंदाज़ न करें. डॉक्टर को दिखाने में ही भलाई है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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