आपको पता है, साउथ कोरिया की आबादी कितनी है? वही देश, जिसका जेन ज़ी में बड़ा क्रेज़ है. वहां की कुल आबादी है करीब 5 करोड़. अब जितने लोग साउथ कोरिया में रहते हैं, उससे दोगुने मरीज़ भारत में डायबिटीज़ के हैं. ICMR और इंडिया डायबिटीज़ की स्टडी के मुताबिक, 2023 में हमारे देश में डायबिटीज़ के मामले 10 करोड़ पार कर चुके थे. ये नंबर लगातार बढ़ रहा है. और कंपैरिज़न सिर्फ ये बताने के लिए था कि हमारे देश की डायबिटीज़ कितनी बड़ी समस्या बन चुकी है. इसके बावजूद कई लोग डायबिटीज़ को बहुत सीरियसली नहीं लेते.
हाई ब्लड शुगर शरीर की नसें हमेशा के लिए खराब कर देगा, हल्के में न लें
डायबिटीज़ से नसें खराब होने के लक्षण क्या हैं. इसका इलाज और बचाव क्या है. क्या खराब हुई नसें फिर से ठीक हो सकती हैं या नुकसान परमानेंट होता है.


उन्हें लगता है, ‘खून में थोड़ी शुगर ही तो बड़ी है. ज़्यादा से ज़्यादा क्या हो जाएगा.’ पर यही लापरवाही भारी पड़ सकती है, क्योंकि लंबे वक्त तक हाई शुगर लेवल नसों को नुकसान पहुंचाता है. भयंकर नुकसान. इसे डायबिटिक न्यूरोपैथी कहते हैं. आज हम इसी पर बात करेंगे. डॉक्टर से जानेंगे कि डायबिटीज़ से नसें क्यों खराब होती हैं. किन-किन अंगों की नसों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है. डायबिटीज़ से नसें खराब होने के लक्षण क्या हैं. इसका इलाज और बचाव क्या है. क्या खराब हुई नसें फिर से ठीक हो सकती हैं या नुकसान परमानेंट होता है.
डायबिटीज़ से नसें क्यों ख़राब होती हैं?ये हमें बताया डॉक्टर प्रवीण गुप्ता ने.

जब लंबे समय तक ब्लड शुगर कंट्रोल में नहीं रहती, तो खून में ग्लूकोज़ का लेवल बढ़ा रहता है. ज़्यादा ग्लूकोज़ नसों और उनकी बारीक खून की नलियों को नुकसान पहुंचाने लगता है. इससे नसों तक पोषण सही से नहीं पहुंच पाता. नई नसों की ग्रोथ की क्षमता भी कम हो जाती है. जिसकी वजह से नसें धीरे-धीरे ख़राब होने लगती हैं.
किन-किन अंगों की नसों पर सबसे ज़्यादा असर?सबसे पहले हाथों और पैरों की लंबी नसें प्रभावित होती हैं, खासकर पैरों के तलवों और हथेलियों की नसें. समय के साथ ये समस्या पैरों और हाथों से ऊपर की ओर बढ़ने लगती है. डायबिटीज़ का असर आंखों की नसों पर पड़ सकता है. कमर और चेहरे की नसें भी ख़राब हो सकती हैं.
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- डायबिटीज़ से नसें ख़राब होने पर मरीज़ को पैरालिसिस हो सकता है.
- मांसपेशियों में कमज़ोरी आ सकती है.
- चलने-फिरने में दिक्कत हो सकती है.
- हाथ-पैरों में सुन्नपन महसूस हो सकता है.
- सुइयां चुभने जैसा एहसास हो सकता है.
- हाथ-पैरों, खासकर पैरों में तेज़ दर्द हो सकता है.
- डायबिटिक न्यूरोपैथी की वजह से होने वाला दर्द अक्सर रात में ज़्यादा बढ़ जाता है.
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इलाज और बचावडायबिटिक न्यूरोपैथी से बचने के लिए ब्लड शुगर कंट्रोल में रखें. इससे नसों को होने वाले नुकसान का ख़तरा कम होता है. रोज़ एक्सरसाइज़ करना भी बहुत ज़रूरी है. डॉक्टर की सलाह पर ऐसी दवाएं लें, जो नसों को पोषण देने और उन्हें सुरक्षित रखने में मदद करती हैं. ज़रूरत पड़ने पर विटामिन B12 जैसे विटामिन सप्लीमेंट्स भी दिए जाते हैं, जो नसों की सेहत के लिए ज़रूरी होते हैं. इन दवाओं से मरीज़ के लक्षणों में काफी राहत मिल सकती है. लेकिन कई मामलों में नसों को हो चुका नुकसान पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता. इसलिए कई लोगों में डायबिटिक न्यूरोपैथी लंबे समय तक रहने वाली समस्या बन जाती है.
हालांकि, समय रहते ब्लड शुगर कंट्रोल करके इस स्थिति से काफी हद तक बचा जा सकता है. इसलिए रोज़ एक्सरसाइज़ करें. बैलेंस्ड और हेल्दी डाइट लें. डॉक्टर के बताए अनुसार दवा लें. इससे न सिर्फ लक्षणों में राहत मिलती है, बल्कि लंबे समय तक नसों को भी ठीक रखा जा सकता है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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