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डायबिटीज़ में खाना स्किप न करें, शरीर और दिमाग दोनों के लिए घातक है

नियमित इंटरवल पर खाना ज़रूरी है. जब आप एक टाइम पर खाना खाते हैं. तब उस टाइम आपके हंगर हॉर्मोन बढ़ते हैं.

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क्या आपको डायबिटीज़ है? (फोटो: Freepik)

भारत को डायबिटीज़ कैपिटल ऑफ़ द वर्ल्ड कहा जाता है. ICMR-INDIAB 2023 की एक स्टडी के मुताबिक, भारत में 10 करोड़ से ज़्यादा लोगों को डायबिटीज़ है और 14 करोड़ से ज़्यादा लोग प्री-डायबिटिक है. यानी डायबिटीज़ के रिस्क पर हैं. डायबिटीज़ के मरीज़ों में जितनी बड़ी समस्या हाई शुगर है, उतनी ही बड़ी समस्या लो शुगर भी है. शुगर लो हो जाना भी काफ़ी ख़तरनाक हो सकता है. ऐसा तब होता है जब डायबिटीज़ के मरीज़ खाना स्किप कर देते हैं.

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काम में फंसे हैं. बाहर हैं. लंच नहीं खाया या ब्रेकफास्ट नहीं खा पाएं. जानते हैं ऐसा करने पर शरीर में क्या होता है? डॉक्टर से समझेंगे कि डायबिटीज़ में खाना स्किप करने से क्या होता है. डायबिटीज़ के मरीज़ों को कब-कब खाना चाहिए. शुगर लो होने से क्या दिक्कतें हो सकती हैं. शुगर लो न हो, इसके लिए क्या करना चाहिए.

डायबिटीज़ में खाना स्किप करने से क्या होता है?

ये हमें बताया डॉक्टर मोनिका शर्मा ने. 

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डॉ. मोनिका शर्मा, सीनियर कंसल्टेंट, एंडोक्रिनोलॉजिस्ट, आकाश हेल्थकेयर, नई दिल्ली

नियमित इंटरवल पर खाना ज़रूरी है. जब आप एक टाइम पर खाना खाते हैं. तब उस टाइम आपके हंगर हॉर्मोन बढ़ते हैं. आपको भूख लगती है. ये एक पिरियॉडिक साइकिल होती है. अगर डायबिटीज़ के मरीज़ खाना मिस कर देते हैं. लेकिन दवाइयां या इंसुलिन टाइम पर लिया होता है. तब शुगर ड्रॉप होने का रिस्क है. 

शुगर ड्रॉप होना यानी हाइपोग्लाइसीमिया. ये एक गंभीर समस्या है. हमारी बॉडी को लगातार ग्लूकोज़ सप्लाई की ज़रूरत होती है. अगर ग्लूकोज़ सप्लाई बॉडी को तीन मिनट से ज़्यादा न मिले, तो ब्रेन पर असर पड़ता है.

डायबिटीज़ के मरीज़ों को कब-कब खाना चाहिए?

ये हर इंसान के लिए अलग-अलग होता है. इसलिए अपने डॉक्टर से पर्सनलाइज्ड डाइट प्लान ज़रूर लीजिए. मेडिकल सलाह को ध्यान में रखते हुए तीन बड़े मील्स यानी ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर लेने चाहिए. ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर के बीच 2-3 छोटे मील्स यानी स्नैक्स ले सकते हैं. स्नैक्स में 100-150 कैलोरीज़ होनी चाहिए. मेजर मील्स में 300-450 तक कैलोरीज़ हों. डायबिटीज़ में ये नॉर्मल शेड्यूल होना चाहिए.

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डायबिटीज़ में लो शुगर होना भी अच्छा नहीं है (फोटो: Freepik)

शुगर लो होने से क्या दिक्कतें हो सकती हैं?

शुगर लो होने पर दो तरह के लक्षण दिखते हैं. एक होते हैं ऑटोनोमिक लक्षण. दूसरे हैं न्यूरोग्लाइकोपीनिक लक्षण. यानी शुगर लो होने पर कुछ शारीरिक लक्षण महसूस होते हैं. कुछ लक्षण ब्रेन को भी महसूस होते हैं. ये जानलेवा हो सकते हैं. जैसे आवाज़ चली जाना. बेहोशी हो जाना. चक्कर आ जाना. गिर जाना. भान चला जाना. सीजर्स होना. कोमा में चले जाना. लंबे समय तक हाइपोग्लाइसीमिया होने से ये सब हो सकता है.

शारीरिक लक्षण कम गंभीर होते हैं. ये वार्निंग साइन होते हैं कि शुगर लो हो रही है, खाना खा लो. जैसे हाथ की कंपकपाहट. बहुत तेज भूख लगना. पसीना आना. हाथ-पैरों में कंपन महसूस करना. शरीर में झनझनाहट होना. सुइयां चुभना. दिल की धड़कनें तेज़ हो जाना. पैलपिटेशंस होना. ये सभी शारीरिक लक्षण हो सकते हैं. लेकिन ब्रेन को महसूस होने वाले लक्षण बहुत ख़तरनाक हो सकते हैं. 

शुगर लो न हो, इसके लिए क्या करना चाहिए?

डॉक्टर के बताए गए समय पर दवाइयां, इंसुलिन और खाना लीजिए. बहुत एक्सट्रीम फिजिकल एक्टिविटी नहीं होनी चाहिए. हर थोड़ी देर में खाना खाना चाहिए. शुगर लो होना ख़तरनाक हो सकता है. इसलिए दवाइयों के साथ-साथ अपने खाने-पीने का भी ध्यान रखें. खाना स्किप न करें, वरना शुगर लो हो सकती है.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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