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पेशाब के इस इंफेक्शन को हल्के में न लें, किडनी तक पहुंचा तो ये बीमारी ICU में पहुंचा देगी

आज डॉक्टर से जानेंगे, पायलोनेफ्राइटिस इंफेक्शन क्या होता है. इसके क्या लक्षण हैं. कौन लोग इसके ज़्यादा रिस्क पर हैं. साथ ही जानेंगे, इससे बचाव और इलाज.

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पेशाब को देर तक रोकने से UTI का रिस्क बढ़ जाता है

पेशाब का इंफेक्शन यानी UTI. एक बहुत ही आम समस्या. आम है, इसलिए बहुत सारे लोग इसे सीरियसली नहीं लेते. पेशाब में जलन जैसे लक्षणों को इग्नोर कर देते हैं. डॉक्टर को नहीं दिखाते. कभी शर्म के चलते. कभी ये सोचकर कि अपने आप ठीक हो जाएगा. लेकिन UTI पर ध्यान नहीं देना बहुत ख़तरनाक हो सकता है. इससे पायलोनेफ्राइटिस भी हो सकता है. ये एक सीरियस किडनी इंफेक्शन है.

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आज डॉक्टर से जानेंगे, पायलोनेफ्राइटिस क्या होता है. इसके क्या लक्षण हैं. कौन लोग इसके ज़्यादा रिस्क पर हैं. साथ ही जानेंगे, इससे बचाव और इलाज.

पायलोनेफ्राइटिस क्या होता है?

ये हमें बताया डॉक्टर भानु मिश्रा ने. 

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डॉ. भानु मिश्रा, कंसल्टेंट, नेफ्रोलॉजिस्ट, फ़ोर्टिस हॉस्पिटल, नई दिल्ली

पायलोनेफ्राइटिस एक यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन है. UTI को लोग छोटी बीमारी के रूप में देखते हैं. पायलोनेफ्राइटिस UTI का रौद्र रूप है. पायलोनेफ्राइटिस का मतलब होता है, किडनी का डायरेक्ट इंफेक्शन.

पायलोनेफ्राइटिस के लक्षण

-ये एक तरह का सीवियर सेप्सिस है

-जिसमें खून के अंदर बैक्टीरियल इंफेक्शन बहुत तेज़ी से फैलता है

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-इससे आपका पल्स रेट बढ़ सकता है, बीपी लो हो सकता है

-कई मरीज़ों को ICU में भर्ती होना पड़ता है

इलाज

ऐसी सिचुएशन में इंजेक्टेबल एंटीबायोटिक्स की ज़रूरत होती है. डायबिटिक, ओबीज़ लोगों और महिलाओं में पायलोनेफ्राइटिस ज़्यादा गंभीर रूप ले सकता है. इसे एम्फिसेमेटस पायलोनेफ्राइटिस कहते हैं. यानी गैस फॉर्मिंग ऑर्गनिज़्म, जो किडनियों के अंदर बनते हैं. यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन को हल्के में नहीं लेना चाहिए. पायलोनेफ्राइटिस पर ख़ासतौर से ध्यान देना ज़रूरी है.

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बार-बार यूरिन इंफेक्शन को हल्के में न लें (फोटो: Freepik)

कौन लोग ज़्यादा रिस्क पर?

-जिन्हें स्टोन हैं

-ओबेसिटी या डायबिटीज़ है

-बार-बार यूरिन इंफेक्शन हो रहा है

-ब्लैडर का इंफेक्शन हो रहा है

-छोटे इंफेक्शन हो रहे हैं

-प्रोस्टेट की बीमारी है

-इन पेशेंट्स में पायलोनेफ्राइटिस होने का रिस्क ज़्यादा है

-ऐसे पेशेंट्स को इंजेक्टेबल एंटीबायोटिक्स दिए जाते हैं

इस बीमारी में एंटीबायोटिक्स लंबे समय तक चलते हैं. बीमारी की गंभीरता को देखते हुए एंटीबायोटिक्स 14-21 दिनों के लिए दिए जाते हैं. पेशेंट के ठीक हो जाने के बाद भी कोर्स पूरा करना ज़रूरी है. एंटीबायोटिक्स का कोर्स खत्म हो जाने के बाद 12-16 हफ़्ते प्रोफिलैक्सिस चलते हैं. यानी बचाव के लिए दवा दी जाती है, ताकि इंफेक्शन दोबारा न हो. इसलिए नेफ्रोलॉजिस्ट से ज़रूर मिलें. रिस्क फैक्टर्स को समझकर उन्हें जड़ से हटाने की कोशिश करें.

बचाव

-लंबे समय तक यूरिन ना रोकें

-इंफेक्शन को पकड़ने के लिए यूरिन का रुटीन माइक्रोस्कोपी टेस्ट करवाएं

-कल्चर सेंसिटिविटी का टेस्ट भी बहुत ज़रूरी है

-डॉक्टर की सलाह से एंटीबायोटिक्स लेना शुरू करें

-दवा कितनी मात्रा में लेना है और कितने समय तक लेना है, ये डॉक्टर आपको बताएंगे

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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