सरिता 37 साल की हैं. प्रयागराज में रहती हैं. पिछले कुछ महीनों से उन्हें पीरियड्स के दौरान खूब ब्लीडिंग हो रही थी. पेट के निचले हिस्से में भारीपन रहता था. कई बार दर्द भी होता था. जब दिक्कत बढ़ने लगी, तो उन्होंने डॉक्टर को दिखाया. जांच में पता चला कि सरिता की बच्चेदानी में गांठें हो गई हैं. ये गांठें बहुत बड़ी नहीं थीं. इसलिए उन्हें दवा दी गई. अब सरिता पहले से बेहतर महसूस कर रही हैं.
बच्चेदानी में गांठें बनने पर ये लक्षण दिखते हैं, इग्नोर न करें वर्ना सर्जरी की नौबत आ सकती है
बच्चेदानी में गांठें होने का कोई सटीक कारण नहीं है. लेकिन, अक्सर ये हॉर्मोन्स की वजह से बढ़ते हैं. ये ज़्यादातर रीप्रोडक्टिव एज ग्रुप की महिलाओं में पाए जाते हैं.
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बच्चेदानी में होने वाली गांठ को रसौली भी कहते हैं. इंग्लिश में इसे ‘यूटेराइन फ्राइब्रॉयड’ कहा जाता है. ये महिलाओं में होने वाली एक आम समस्या है. पर अक्सर इस पर खुलकर बात नहीं होती. महिलाएं भी लक्षणों को इग्नोर करती रहती हैं. फिर जब परेशानी बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है तब डॉक्टर को दिखाया जाता है. और ऐसे में आखिरी रास्ता सर्जरी ही बचता है. कई बार तो बच्चेदानी तक निकालनी पड़ती है. इसलिए ज़रूरी है कि इसके बारे में आपको पूरी जानकारी हो.
इसलिए, डॉक्टर से समझेंगे कि ये क्यों होती है. गांठ बच्चेदानी के किस हिस्से में हो सकती है. बच्चेदानी में गांठ होने पर कौन-से लक्षण दिखेंगे. इसका इलाज कैसे किया जाता है. ये भी जानेंगे कि बच्चेदानी में गांठ या रसौली क्या कैंसर बन सकती है.
बच्चेदानी में गांठ या रसौली होने के कारण
ये हमें बताया डॉक्टर रश्मि रेखा बोरा ने.

रसौली को मेडिकल भाषा में यूटेराइन फाइब्रॉयड्स या लियोमायोमा कहते हैं. ये फाइब्रॉयड्स यूटेरस (बच्चेदानी) की मांसपेशियों में होते हैं. अगर फाइब्रॉयड मांसपेशियों के अंदर ही रहे, तो इसे इंट्राम्यूरल फाइब्रॉइड कहते हैं. अगर फाइब्रॉयड बच्चेदानी की बाहरी तरफ आए, तो इसे सेरोसल फाइब्रॉइड कहते हैं. अगर ये बच्चेदानी के अंदर की झिल्ली की तरफ आता है, तो इसे सबम्यूकोसल फाइब्रॉइड कहते हैं.
फाइब्रॉयड्स होने का कोई सटीक कारण नहीं है. लेकिन, अक्सर ये हॉर्मोन्स की वजह से बढ़ते हैं. ये ज़्यादातर रिप्रोडक्टिव एज ग्रुप की महिलाओं में पाए जाते हैं.
बच्चेदानी में गांठ के लक्षण
कई बार फाइब्रॉयड्स छोटे होते हैं, जिनमें कोई लक्षण दिखाई नहीं देते. अगर सबम्यूकोसल फाइब्रॉइड्स हैं, तो पीरियड्स के दौरान बहुत ज़्यादा या लंबे वक्त तक ब्लीडिंग होती है. पेट के निचले हिस्से में भारीपन या दर्द महसूस होता है. ये दर्द कई बार कमर की तरफ बढ़ जाता है. बार-बार पेशाब आने जैसा लगता है. कई महिलाओं को प्रेग्नेंसी में तकलीफ़ हो सकती है.

बच्चेदानी में गांठ का इलाज
अगर गांठें छोटी हों, तो इनका दवाइयों से इलाज किया जा सकता है. इलाज करते समय देखा जाता है कि महिला की उम्र क्या है और क्या उनका परिवार पूरा हो गया है. कई बार सिर्फ रसौली (गांठ) ही निकाली जाती है. कभी-कभी बच्चेदानी भी निकालनी पड़ सकती है, ये महिला की उम्र पर निर्भर करता है. सिर्फ रसौली निकालने की सर्जरी को मायोमेक्टॉमी कहते हैं. जब गांठ के साथ बच्चेदानी भी निकाल दी जाती हैं, तो इसे हिस्टेरेक्टॉमी कहते हैं.
शुरुआत में दवाइयों से कोशिश की जाती है, अगर वो काम न करें तो सर्जरी की जाती है. सर्जरी कई तरह से की जा सकती है, जैसे लैप्रोस्कोपिक सर्जरी जो दूरबीन से होती है. रोबोटिक सर्जरी और ओपन सर्जरी भी की जा सकती है.
बच्चेदानी में गांठ या रसौली क्या कैंसर बन सकती है?
ज़्यादातर रसौलियां (गांठें) आमतौर पर कैंसर नहीं होता. लेकिन, अगर ये रसौलियां बहुत तेज़ी से बढ़ रही हैं या कम समय में बहुत बड़ी हो जाएं. तब ऐसे में यूटेराइन लियोमायोसारकोमा नाम का कैंसर हो सकता है. हालांकि सामान्य फाइब्रॉयड कभी कैंसर नहीं बनते. पर अगर रसौली जल्दी-जल्दी बढ़ रही है, तो डॉक्टर से मिलें और जांच कराएं.
आमतौर पर बच्चेदानी की गांठ या रसौली कैंसर वाली नहीं होती. लेकिन अगर आपकी बच्चेदानी में ये गांठें हैं, तो वक्त-वक्त पर डॉक्टर से मिलते रहें. ताकि पता चल सके, कि कहीं इनका साइज़ तो नहीं बढ़ रहा.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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