8 मार्च 2026. तेहरान की सबसे ताकतवर कुर्सी खाली थी. कुछ ही घंटों में 56 साल के मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei) को ईरान का तीसरा सुप्रीम लीडर घोषित कर दिया गया. अपने पिता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के महज दस दिन बाद. मोजतबा ने कभी चुनाव नहीं लड़ा, न कोई बड़ा सरकारी पद संभाला और शायद ही कभी जनता के सामने खुलकर बोले. लेकिन यह फैसला अचानक नहीं लिया गया. इसकी कहानी शुरू होती है 40 साल पहले ईरान-इराक जंग से, जब मोजतबा की उम्र करीब 17 साल थी.
इराक जंग से शुरू हुआ सफर सबसे ताकतवर कुर्सी तक कैसे पहुंचा? कहानी मोजतबा के सुप्रीम लीडर बनने की
Mojtaba Khamenei ने कभी चुनाव नहीं लड़ा, न कोई बड़ा सरकारी पद संभाला और न ही कभी जनता के सामने खुलकर बोले. मोजतबा के सुप्रीम लीडर बनने की कहानी शुरू होती है 40 साल पहले ईरान-इराक जंग से, जब उनकी उम्र करीब 17 साल थी. उनके इस सफर में चार किरदार ऐसे भी हैं, जिनकी वजह से आज वो Iran के सबसे ताकतवर पद तक पहुंचे हैं.


साल 1986. मोजतबा खामेनेई ने ईरान-इराक जंग में अपनी मर्जी से सेना जॉइन करने का फैसला लिया. उनके पिता अयातुल्लाह खामेनेई, उस वक्त ईरान के राष्ट्रपति थे और सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के करीबी सहयोगी थे. जंग पिछले 6 सालों से चल रही थी. लाखों लोग पहले ही मारे जा चुके थे.
NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, मोजतबा को 27वीं मोहम्मद रसूलुल्लाह डिवीज़न की हबीब इब्न मज़ाहिर बटालियन में तैनात किया गया था. यह इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की एक टुकड़ी थी, जिसे पश्चिमी मोर्चे पर तैनात किया गया था.
मोजतबा ने कम उम्र में ही जंग में हिस्सा लिया था और संघर्ष के दौरान दूसरे लड़ाकों के साथ मोर्चे पर दिखाई दिए थे. ईरानी मीडिया आउटलेट्स ने हाल ही में कुछ फुटेज जारी किए, जिसमें उन्हें युद्ध के दौरान सैनिकों के साथ लड़ाकू वर्दी पहने हुए दिखाया गया है. मोजतबा ने कुछ समय के लिए ही सर्विस दी.
ईरान वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, 'फाउंडेशन फॉर द ऑप्रेस्ड एंड वेटरन्स ऑफ द इस्लामिक रिवोल्यूशन' के पूर्व प्रमुख मोहसेन रफीकदौस्त ने अपने संस्मरणों में दावा किया है कि ईरान-इराक युद्ध के दौरान मोजतबा खामेनेई कई अन्य अधिकारियों के बच्चों के साथ एक हफ्ते के लिए ‘लापता’ हो गए थे. बाद में उन्होंने बताया कि वे ईरान और इराक के बीच कहीं फंस गए थे. उन्होंने लिखा,
“मैं सुप्रीम लीडर से मिलने गया और उन्होंने कहा, 'आइए हम प्रार्थना करें कि अगर उनके साथ कुछ अनहोनी होती है, तो वे शहीद हों और ईश्वर की कृपा से वे पकड़े न जाएं.' हालांकि, हमारी सेनाएं आगे बढ़ीं और उन्हें बचा लिया गया. यह वही हमला था जिसके परिणामस्वरूप मेहरान आज़ाद हुआ.”
यह कहानी जितनी मोजतबा के बारे में है, उतनी ही उन लोगों के बारे में भी है जिनके साथ उन्होंने लड़ाई लड़ी थी. उस सैन्य डिवीजन के चार लोगों ने आगे चलकर इस्लामिक गणराज्य की सेना को इस तरह से आकार दिया, जो मोजतबा को 9 करोड़ लोगों वाले देश की सबसे ताकतवर कुर्सी तक ले आया.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के डॉक्टोरल रिसर्चर डैनियल हर्जबर्ग ने NDTV को बताया, “मोजतबा की सत्ता सार्वजनिक वैधता या धार्मिक कद के बजाय सुरक्षा गठजोड़ पर कहीं ज्यादा टिकी है.” ईरान की सत्ता के अंदर कई ऐसे लोग थे, जिनका रिश्ता मोजतबा खामेनेई से बहुत पहले से जुड़ा हुआ था. इन्हीं रिश्तों ने बाद में उनकी ताकत बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई.
हुसैन ताइबरिपोर्ट के मुताबिक, हुसैन ताइब 1982 में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) में शामिल हुए थे. ईरान-इराक जंग के दौरान उन्होंने अपना भाई खो दिया था. जंग खत्म होने के बाद उनका करियर लगभग खत्म हो गया था, क्योंकि उन पर उस समय के राष्ट्रपति अकबर हाशमी रफसंजानी के बच्चों के खिलाफ झूठे केस बनाने का आरोप लगा और उन्हें खुफिया मंत्रालय से निकाल दिया गया. लेकिन खामेनेई परिवार से रिश्तों के कारण वे बच गए.

बाद में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई ने उन्हें अपने दफ्तर में जगह दी. ताएब 2007 से 2009 तक बासिज मिलिशिया के कमांडर रहे और 2009 से 2022 तक IRGC के इंटेलिजेंस संगठन के पहले प्रमुख बने.
हुसैन नेजातइसके बाद हुसैन नेजात का नाम आता है. वे ईरान-इराक जंग के दौरान IRGC में काउंटर-इंटेलिजेंस अधिकारी थे. 2000 से 2010 तक उन्होंने ‘वली ए अम्र’ कोर की कमान संभाली, जो सुप्रीम लीडर की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार यूनिट है. बाद में वे IRGC इंटेलिजेंस संगठन में ताएब के डिप्टी बने और फिर तेहरान की आंतरिक सुरक्षा देखने वाले सरल्लाह हेडक्वार्टर के डिप्टी कमांडर बनाए गए.

2022 में महसा अमिनी विरोध प्रदर्शनों को दबाने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई, जिसकी वजह से अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ समेत कई देशों ने उन पर प्रतिबंध लगाए.
कासिम सुलेमानीकासिम सुलेमानी ईरान के सबसे ताकतवर सैन्य नेताओं में गिने जाते थे. वे IRGC की कुद्स फोर्स के कमांडर थे, जो मिडिल ईस्ट में ईरान के सहयोगी सशस्त्र समूहों का नेटवर्क चलाती है, जिसे ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ कहा जाता है. 3 जनवरी 2020 को बगदाद एयरपोर्ट पर अमेरिकी ड्रोन हमले में उनकी मौत हो गई.

हुसैन हमदानी भी IRGC के शुरुआती नेताओं में थे. उन्होंने ईरान-इराक युद्ध में लड़ाई लड़ी और बाद में सीरिया के गृहयुद्ध में बशर अल-असद सरकार की मदद के लिए भेजे गए ईरानी बलों की कमान संभाली. अक्टूबर 2015 में अलेप्पो के पास एक हमले में उनकी मौत हो गई.

इन चारों लोगों को एक चीज जोड़ती थी. वो थी मोजतबा खामेनेई से उनका पुराना रिश्ता.
‘पॉवर ब्रोकर’ के तौर पर काम करते थे मोजतबा
1990 के दशक के आखिर में, मोजतबा का कद बढ़ने लगा. खामेनेई के इन शुरुआती सालों में भी मोजतबा हमेशा अपने पिता के साथ ही नजर आते थे. 2005 से, ऐसी रिपोर्टें सामने आने लगीं कि मोजतबा राष्ट्रपति चुनावों में एक 'पावर ब्रोकर' के तौर पर अहम भूमिका निभा रहे हैं. ईरानी संसद के पूर्व स्पीकर और उस समय राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रहे मेहदी करौबी ने आरोप लगाया कि 2005 में मोजतबा ने महमूद अहमदीनेजाद को जबरदस्त समर्थन दिया, जिसके चलते अहमदीनेजाद की जीत हुई और वे राष्ट्रपति बने.
मोजतबा की यह दखलंदाजी ईरानी व्यवस्था के अलग-अलग तबकों को रास नहीं आई, जिसके चलते करौबी और अन्य लोगों ने इसका जोरदार विरोध किया. 2009 के चुनावों में भी यह दखलंदाजी जारी रही. रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोजतबा ने ही अहमदीनेजाद को दोबारा राष्ट्रपति चुनाव जिताने की पूरी रणनीति तैयार की थी, और यहां तक कि उन्होंने पैरामिलिट्री फोर्स ‘बसीज’ को आदेश दिया था कि वे 'ग्रीन मूवमेंट' के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें.
बताते चलें कि ग्रीन मूवमेंट ईरान में 2009 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद शुरू हुआ एक बड़ा, शांतिपूर्ण सुधारवादी आंदोलन था, जो महमूद अहमदीनेजाद की विवादित जीत के खिलाफ उभरा था. प्रदर्शनकारियों ने धांधली का आरोप लगाते हुए "मेरा वोट कहां है?" के नारे के साथ बड़े पैमाने पर विरोध किया, जिसे बाद में सरकार ने कुचल दिया. ईरान वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए, “मर जाओ, मोजतबा, तुम कभी लीडरशिप नहीं देख पाओगे.”
मोजतबा को अपने सहयोगियों, जैसे हुसैन तायब के साथ मिलकर काम करते हुए देखा गया, ताकि 'सुप्रीम लीडर के ऑफिस' की तरफ से उठने वाली असहमति की आवाजों को कुचला जा सके. अपने पिता के दफ्तर में काम करते हुए, ऐसे भी सबूत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि मोजतबा के पास ईरान के काफी बड़े आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण था.
पर्दे के पीछे से करते थे कंट्रोल
2019 में, अमेरिका ने मोजतबा पर प्रतिबंध लगा दिए. इसकी वजह यह थी कि "उन्होंने सुप्रीम लीडर का आधिकारिक तौर पर प्रतिनिधित्व किया, जबकि उन्हें कभी भी किसी सरकारी पद के लिए न तो चुना गया था और न ही नियुक्त किया गया था, सिवाय अपने पिता के दफ्तर में काम करने के."
अहम बात यह है कि अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने खुलासा किया कि सुप्रीम लीडर ने ‘अपने नेतृत्व की कुछ जिम्मेदारियां’ मोजतबा को सौंप दी हैं. इसके अलावा, वह IRGC की कुद्स फोर्स और बसीज रेजिस्टेंस फोर्स के कमांडर के साथ मिलकर काम करते हैं, जिससे उन्हें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी साख हासिल हो गई है.
इससे यह पता चलता है कि मोजतबा अपने पिता के बेहद करीबी सहयोगी थे. यहां तक दावा किया गया है कि वह सुप्रीम लीडर के दफ्तर में ‘दूसरे सबसे अहम व्यक्ति’ हैं. अमेरिकी कूटनीतिक हलकों में उन्हें पर्दे के पीछे की ताकत बताया गया, जो अपने पिता तक पहुंच को नियंत्रित करते थे और सत्ता के अंदर नियुक्तियों पर असर डालते थे.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि औपचारिक पद न होना ही उनकी ताकत बन गया. वे अपने पिता के ‘गेटकीपर’ की तरह काम करते थे और तय करते थे कि कौन सुप्रीम लीडर तक पहुंच सकता है.
8 मार्च को जब मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बनाया गया, तो इसमें एक बड़ा विरोधाभास भी दिखा. इस्लामिक गणराज्य की स्थापना 1979 की क्रांति के बाद हुई थी, जिसने राजशाही को खत्म किया था. लेकिन अब सत्ता फिर से एक तरह के वंशानुगत उत्तराधिकार की तरफ जाती दिख रही है. डैनियल हर्जबर्ग ने बताया कि अयातुल्ला खुमैनी ने खुद लिखा था कि 'इस्लाम राजशाही और खानदानी उत्तराधिकार को गलत और अमान्य घोषित करता है' और खानदानी शासन को 'खतरनाक, बुरी व्यवस्था' बताया.
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अब आगे क्या?कुछ जानकारों का कहना है कि मोजतबा में ईरान के मोहम्मद बिन सलमान (सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस) बनने की उम्मीद है, खासकर देश को मॉडरेट और मॉडर्न बनाने की. लेकिन यह मोजतबा के रिकॉर्ड को गलत समझना है. वे जीवन भर खोमेनिस्ट विचारधारा में पले-बढ़े हैं. मोजतबा कट्टरपंथी बन चुके हैं.

मोजतबा की वेस्टर्न देशों से भी ज्यादा जान-पहचान नहीं है, हालांकि ऐसी इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स हैं कि उन्होंने नपुंसकता के इलाज के लिए लंदन के एक हॉस्पिटल में समय बिताया था. आरोप है कि वे कई क्राइम और गलत कामों के पीछे रहे हैं और करप्शन में भी शामिल रहे हैं.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि मोजतबा खामेनेई के सामने बड़ी चुनौतियां हैं. जैसे युद्ध का खतरा, जनता में असंतोष, और आर्थिक संकट. इसलिए यह अभी साफ नहीं है कि उनका शासन लंबे समय तक स्थिर रह पाएगा या नहीं.
वीडियो: ईरान ने अपना नया सुप्रीम लीडर चुन लिया है, कौन हैं मोजतबा ख़ामेनेई?
















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