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पैकेटबंद चीज़ों को ख़राब होने से बचाने वाले प्रिज़र्वेटिव्स शरीर में जाकर ये कर रहे!

प्रिज़र्वेटिव्स खाने-पीने की जिस भी चीज़ में डाले जाते हैं, वो जल्दी ख़राब नहीं होती. महीनों चलती है. पर खाने को खराब होने से बचाने वाले यही प्रिज़र्वेटिव्स आपकी सेहत के दुश्मन हैं.

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चिप्स जैसी चीज़ें बनाने में जो-जो डाला जाता है, वो बड़ा नुकसानदेह है

बिस्किट. नमकीन. चिप्स. चॉकलेट. नूडल्स. इन सब में क्या कॉमन है? टेस्टी, जंक फ़ूड होने के अलावा?

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ये सभी चीज़ें जल्दी ख़राब नहीं होतीं. महीनों चलती हैं. किसी चिप्स या नूडल्स के पैकेट को पलटकर देखिए. मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट में कम से कम 5-6 महीनों का फ़र्क होगा.

दुकान के शेल्फ पर महीनों ये पैकेट रखे रहते हैं. न खाना ख़राब होता है, न ही स्वाद बदलता है. वहीं, घर पर बना खाना तो अगले दिन ही खाने लायक नहीं रहता. तो ऐसा क्यों होता है?

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पैकेटबंद खाने में प्रिज़र्वेटिव्स डाले जाते हैं (फोटो: Freepik)

जवाब है प्रिज़र्वेटिव्स. ये प्रिज़र्वेटिव्स खाने-पीने की जिस भी चीज़ में डाले जाते हैं, वो जल्दी ख़राब नहीं होती. महीनों चलती है. पर खाने को खराब होने से बचाने वाले यही प्रिज़र्वेटिव्स आपकी सेहत के दुश्मन हैं. शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं. कैंसर और डायबिटीज़ जैसी बीमारियों का रिस्क बढ़ाते हैं.

आज डॉक्टर से जानिए कि प्रिज़र्वेटिव क्या होते हैं. ये किस चीज़ से बने होते हैं. पैक्ड फ़ूड में इनका इस्तेमाल क्यों किया जाता है. प्रिज़र्वेटिव्स के इस्तेमाल से कैंसर का रिस्क क्यों बढ़ता है. और, प्रिज़र्वेटिव्स से होने वाले नुकसान से खुद को कैसे बचाएं. 

प्रिज़र्वेटिव क्या होते हैं?

ये हमें बताया डॉक्टर मनीष सिंघल ने.

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डॉ. मनीष सिंघल, वाइस चेयरमैन, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, यशोदा मेडिसिटी

प्रिज़र्वेटिव्स ऐसे पदार्थ हैं, जो अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फ़ूड्स में मिलाए जाते हैं. यानी पैकेट या डिब्बाबंद वो चीज़ें, जो लंबे समय तक शेल्फ़ पर रखी जाती है. प्रिज़र्वेटिव्स का काम खाने की शेल्फ़ लाइफ को बढ़ाना होता है. जिससे वो खाना जल्दी ख़राब न हो और उसे लंबे समय तक स्टोर किया जा सके.

खाने की चीज़ों में प्रिज़र्वेटिव का इस्तेमाल क्यों किया जाता है?

प्रिज़र्वेटिव ज़्यादातर कमर्शियल पैकेट वाले खाने में मिलाए जाते हैं. जैसे आलू के चिप्स और नूडल्स वगैरा. इनका मुख्य काम खाने की शेल्फ़ लाइफ़ को बढ़ाना है ताकि अगर वो सालभर भी बाहर रखी रहें, तब भी ख़राब न हों. लेकिन, ऐसी चीज़ें खाने से ये प्रिज़र्वेटिव्स शरीर में पहुंच जाते हैं. ये खाने में मौजूद पोषक तत्वों की क्वालिटी पर असर डालते हैं. इससे आगे जाकर कैंसर जैसी बीमारी होने का चांस बढ़ सकता है.

प्रिज़र्वेटिव से कैंसर का रिस्क क्यों?

प्रिज़र्वेटिव्स को कम मात्रा में लेना आमतौर पर नुकसान नहीं करता. लेकिन जब बिस्कुट, नूडल्स और चिप्स जैसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फ़ूड बार-बार खाए जाते हैं. तब ये प्रिज़र्वेटिव्स हमारे पाचन तंत्र और शरीर में जमा होने लगते हैं. कुछ प्रिज़र्वेटिव्स खाने में मौजूद न्यूट्रिएंट्स के साथ मिलकर केमिकल रिएक्शन पैदा करते हैं. इससे वो पोषक तत्व भी हमारे लिए नुकसानदेह हो जाता है. आगे चलकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का रिस्क बढ़ जाता है. इसे एक रिसर्च ने साबित भी कर दिया है.

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ज़्यादा प्रिज़र्वेटिव्स खाने से कैंसर होने का ख़तरा बढ़ जाता है (फोटो: Freepik)

प्रिज़र्वेटिव के नुकसान से कैसे बचें?

प्रोसेस्ड फूड्स और अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स में फ़ूड प्रिज़र्वेटिव इस्तेमाल किए जाते हैं. इन्हें बहुत ज़्यादा खाने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है. फ्रांस में लाखों लोगों पर एक स्टडी की गई है, जिसे ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ने छापा है. इसमें पाया गया कि अगर किसी फ़ूड प्रिज़र्वेटिव में पोटेशियम सोर्बेट नाम का केमिकल है. जो आपको पैकेट में कहीं न कहीं लिखा दिख जाएगा. ऐसा प्रोडक्ट खाने से कैंसर का रिस्क 12% बढ़ जाता है. ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क तो करीब 23-24% तक बढ़ जाता है. 

इसी तरह, कई फ़ूड प्रिज़र्वेटिव में पोटैशियम नाइट्रेट डाला जाता है. इसके ज़्यादा सेवन से कैंसर का ख़तरा 12 से 15% तक बढ़ जाता है. खाने के कई पैकेट्स में सोडियम नाइट्रेट लिखा होता है. इसके ज़्यादा इस्तेमाल से प्रोस्टेट कैंसर का रिस्क 32% तक बढ़ जाता है. सारे कैंसर को मिला लें, तो रिस्क 12% तक होता है. ये चिंता की बात है. 

हम अक्सर जल्दी के चक्कर में ज़्यादा फ़ूड प्रिज़र्वेटिव खा सकते हैं. कई लोग सिर्फ बाहर का खाना ही खाते हैं, वो घर पर खाना नहीं पकाते. इससे उनके शरीर में ज़्यादा फू़ड प्रिज़र्वेटिव पहुंच जाते हैं, जो नुकसानदेह है. फ़ूड प्रिज़र्वेटिव खाने की मनाही नहीं है, पर इन्हें संभलकर खाएं. घर पर तैयार ताज़े खाने से अच्छा और कुछ नहीं है. 

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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