भारत के सीनियर एडवोकेट और पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने चेतावनी दी है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से चलने वाली वैश्विक नियम आधारित व्यवस्था कमजोर होती जा रही है. उनका मानना है कि वैश्विक संघर्षों में अब अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानूनों की जगह ताकत की राजनीति हावी होती दिख रही है.
'शक्तिशाली देश अब अंतरराष्ट्रीय कानूनों को नहीं मानते', हरीश साल्वे ने वर्ल्ड ऑर्डर का सच बता दिया
Harish Salve ने चेतावनी देते हुए कहा कि लोकतंत्र और नियम आधारित व्यवस्था बहुत नाजुक मूल्य हैं. इन्हें बनाए रखने के लिए समझदारी और संतुलित नेतृत्व की जरूरत होती है. अगर दुनिया स्थायी रूप से ताकत की राजनीति की ओर बढ़ती है तो अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के लिए शांति बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा.
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इंडिया टुडे से बात करते हुए हरीश साल्वे ने कहा कि हाल में हुए युद्धों और भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनावों से ये संकेत मिले हैं कि शक्तिशाली देशों पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों का प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है. साल्वे बताते हैं,
“मुझे नहीं लगता आज सार्वजनिक अंतरराष्ट्रीय कानून कुछ खास देशों के लिए सच में कुछ मायने रखते हैं. यह अब अकादमिक बहस तक सिमट कर रह गया है. देशों के लिए इसकी अहमियत घटती जा रही है. वो इसे मानने को तैयार नहीं हैं.”
नियम आधारित व्यवस्था को किनारे किया जा रहा
हरीश साल्वे ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूनाइटेड नेशन्स चार्टर पर आधारित एक ढांचा बनाया गया था. इसका उद्देश्य किसी भी देश को बिना वजह ताकत के इस्तेमाल से रोकना था. इस चार्टर के मुताबिक कोई भी देश केवल आत्मरक्षा में या फिर यूनाइटेड नेशन्स सिक्योरिटी काउंसिल की मंजूरी के साथ ही सैन्य कार्रवाई कर सकता है. उन्होंने कहा,
“इन नियमों को अब लगातार नजरअंदाज किया जा रहा हैं. नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था की बात तो हर कोई करता है लेकिन आज इसे किनारे लगा दिया गया है. अब दुनिया में नियम आधारित नहीं, बल्कि ताकत के आधार पर व्यवस्था चल रही है.”
हरीश साल्वे ने अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था को नाजुक बताते हुए कहा कि इनका पालन काफी हद तक जिम्मेदार नेतृत्व पर निर्भर करता है. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा,
“लोकतंत्र और नियम आधारित व्यवस्था बहुत नाजुक मूल्य हैं. इन्हें बनाए रखने के लिए समझदारी और संतुलित नेतृत्व की जरूरत होती है. अगर दुनिया स्थायी रूप से ताकत की राजनीति की ओर बढ़ती है तो अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के लिए शांति बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा. अगर हम सभी नियमों को किनारे रख दें और कहें कि जिसकी ताकत, उसकी ही बात सही है तो फिर समाधान का रास्ता कहां बचेगा?”
हरीश साल्वे ने कहा कि सरकारों पर सबसे प्रभावी नियंत्रण अदालतों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से नहीं, बल्कि खुद नागरिकों से आता है. लोकतंत्र में जनता की ताकत, जनमत की ताकत, जनमत की शक्ति और समझदारी का कोई विकल्प नहीं है. उन्होंने जोर देकर कहा,
वैश्विक स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि दुनिया दोबारा नियमों का सम्मान करना शुरू करे न कि सैन्य ताकत को अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आधार बनने दे.
वकील जिसने कुलभूषण जाधव की फांसी रूकवा दी
हरीश साल्वे ने अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में पाकिस्तान की जेल में कैद भारतीय कुलभूषण जाधव के मामले की पैरवी की थी. उनकी पैरवी के चलते आखिरी सुनवाई तक जाधव के मृत्युदंड पर रोक लग गई थी. साल्वे ने केवल एक रुपये की फीस लेकर यह मुकदमा लड़ा था. हरीश साल्वे की गिनती देश के सबसे महंगे वकीलों में होती है. अपने 42 साल के करियर में वह कोर्ट में कई कॉरपोरेट घरानों का पक्ष रख चुके हैं.
साल 1992 में साल्वे दिल्ली हाई कोर्ट की तरफ से सीनियर एडवोकेट बनाए गए थे. इसके बाद उन्होंने अंबानी, महिंद्रा और टाटा जैसे बड़े कॉरपोरेट घरानों का केस लड़ा. मशहूर केजी बेसिन गैस केस में अंबानी बंधुओं के बीच हुए विवाद में उन्होंने बड़े भाई मुकेश अंबानी का पक्ष रखा. हरीश साल्वे ने वोडाफोन को 14 हजार 200 करोड़ रुपये के कथित टैक्स चोरी के केस में जीत दिलाई, जिसके बाद से उनको लगभग 'अजेय' माना जाने लगा.
साल्वे ने अपने तर्कों और दांव पेच से सुप्रीम कोर्ट को बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला पलटने पर मजबूर कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय टैक्स प्रशासन को कंपनी के विदेश में किए गए लेन-देन पर टैक्स लेने का अधिकार नहीं है. साल 1999 में एनडीए सरकार के समय साल्वे को भारत का सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया था. उस वक्त उनकी उम्र 43 साल थी. साल 2002 तक वह इस पद पर रहे.
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