देश के हेल्थ मिनिस्टर जे.पी.नड्डा अस्पताल से डिस्चार्ज हो चुके हैं. 13 अगस्त 2026 को बेचैनी की शिकायत के बाद उन्हें एम्स, दिल्ली में एडमिट किया गया था. जहां उनके कुछ टेस्ट हुए. इसके बाद पहले उनकी कोरोनरी एंजियोग्राफी हुई. फिर 17 अगस्त को एंजियोप्लास्टी की गई.
जेपी नड्डा की एंजियोप्लास्टी हुई, क्यों और कैसे होता है प्रोसीजर?
AIIMS, दिल्ली की तरफ से जारी बयान के मुताबिक, बेचैनी की शिकायत के बाद नड्डा को एडमिट किया गया था. जहां पहले उनकी कोरोनरी एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की गई.

एम्स की तरफ से जारी बयान के मुताबिक, इन मेडिकल प्रोसीजर्स के बाद उन्हें ऑब्ज़र्वेशन में रखा गया. फिर 19 अगस्त को उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया.
कोरोनरी एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी, दोनों ही दिल से जुड़े मेडिकल प्रोसीजर हैं. लेकिन ये किए क्यों जाते हैं, और होते कैसे हैं, ये सवाल हमने पूछा मेट्रो ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स के डायरेक्टर और कैथ लैब्स के ग्रुप हेड, सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट, डॉक्टर समीर गुप्ता से.
कोरोनरी एंजियोग्राफी क्या है?
कोरोनरी एंजियोग्राफी एक खास तरह का टेस्ट है. इसमें कोरोनरी आर्टरीज़ यानी दिल तक खून पहुंचाने वाली धमनियों की जांच की जाती है. इस टेस्ट से पता चलता है कि दिल की धमनियों में कोई ब्लॉकेज या सिकुड़न तो नहीं है.
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कोरोनरी एंजियोग्राफी कैसे होती है?
कोरोनरी एंजियोग्राफी में कैथेटर नाम की एक पतली ट्यूब का इस्तेमाल किया जाता है. इस कैथेटर को आमतौर पर हाथ की कलाई या जांघ की धमनी से अंदर ले जाकर, दिल की धमनियों तक पहुंचाया जाता है. जब एक्स-रे की मदद से कैथेटर सही जगह पर पहुंच जाता है. तब इसी के ज़रिए दिल की धमनियों में कॉन्ट्रास्ट डाई डाली जाती है. फिर एक्स-रे से तस्वीरें ली जाती हैं.
अगर दिल की धमनियों में कहीं ब्लॉकेज होता है, तो डाई उस जगह से आगे नहीं जा पाती. इससे डॉक्टर्स को पता चल जाता है कि ब्लॉकेज कहां हैं, वो कितना गंभीर है, और उसका असर कितनी धमनियों पर पड़ रहा है.
अगर एंजियोग्राफी से किसी धमनी में गंभीर ब्लॉकेज का पता चलता है. आमतौर पर, 70% से ज़्यादा ब्लॉकेज का, तब डॉक्टर उसे खोलने का फैसला लेते हैं. इस खोलने की प्रक्रिया को ही एंजियोप्लास्टी कहते हैं. यानी कोरोनरी एंजियोग्राफी जांच है, और एंजियोप्लास्टी इलाज.

एंजियोप्लास्टी क्या है?
अगर दिल की कोई धमनी पूरी तरह बंद हो, या प्लाक जमने की वजह से वो बहुत ज़्यादा संकरी हो गई हो. तब एंजियोप्लास्टी की जाती है, ताकि दिल तक खून ठीक से पहुंचता रहे.
एंजियोप्लास्टी कैसे की जाती है?
एंजियोप्लास्टी करने में आधा-एक घंटा लगता है. इसमें भी कैथेटर का इस्तेमाल किया जाता है. इस कैथेटर के सिरे पर एक बिना फूला हुआ लगाया जाता है. ये नॉर्मल वाला गुब्बारा नहीं है. अब कैथेटर को दिल की ब्लॉक हुई धमनी तक पहुंचाया जाता है. जब गुब्बारा ब्लॉकेज वाली जगह पर पहुंच जाता है. तब उसे फुलाया जाता है. इससे प्लाक, धमनी की दीवारों की तरफ दब जाता है, और खून बहने का रास्ता चौड़ा हो जाता है.
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अब धमनी दोबारा न सिकुड़े, उसमें ब्लॉकेज न हो. इसके लिए उस जगह पर एक स्टेंट डाला जा सकता है. स्टेंट एक पतला और जालीदार ट्यूब होता है, जो धमनी को खुला रखने में मदद करता है. एक बार स्टेंट पड़ जाए, फिर गुब्बारे और ट्यूब को बाहर निकाल लिया जाता है.
एंजियोप्लास्टी होने के एक-दो दिन के भीतर मरीज़ को डिस्चार्ज कर दिया जाता है. हालांकि अगर हार्ट अटैक आने के बाद एंजियोप्लास्टी हुई है, तो मरीज़ को ज़्यादा दिन तक हॉस्पिटल में रहना पड़ सकता है. जब एंजियोप्लास्टी के बाद दिल तक पर्याप्त ऑक्सीज़न पहुंचती है. तब सीने का दर्द और बेचैनी जैसी दिक्कतों में आराम मिलता है. हार्ट अटैक का रिस्क भी घटता है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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